उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक ऐसा ट्रक पहुंचा, जिसे देखकर लोग हैरान रह गए. ट्रक में 308 पहिए लगे थे और उस पर करीब 200 टन वजन की एक विशाल मशीन रखी थी. मशीन बेल्जियम से भारत आई है. पहले इसे समुद्र के रास्ते ओडिशा के पोर्ट तक लाया गया, फिर वहां से सड़क के रास्ते लखीमपुर पहुंचाया गया.
इस मशीन के सफर की शुरुआत करीब छह महीने पहले हुई थी. अब इसे लखीमपुर के कुंभी में लगने वाले एक बड़े बायोप्लास्टिक प्लांट में लगाया जाएगा. आखिर इस मशीन में ऐसा क्या खास है? इसे इतनी दूर से क्यों मंगाया गया? और इसका गन्ने से प्लास्टिक बनाने से क्या कनेक्शन है? लखीमपुर खीरी में 308 पहियों वाले ट्रक पर पहुंची मशीन कोई सामान्य मशीन नहीं है. इसे बेल्जियम से भारत लाया गया है और अब कुंभी में लगने वाले बायोप्लास्टिक प्लांट में इंस्टाल किया जाना है.
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इस मशीन की मदद से गन्ने से ऐसा मटेरियल बनाने की प्लानिंग है, जिससे प्लास्टिक जैसे कई प्रोडक्ट तैयार किए जा सकेंगे. यानी जिस गन्ने को हम अब तक मुख्य रूप से चीनी से जोड़कर देखते आए हैं, उसी से प्लास्टिक बनाने की कोशिश होने जा रही है. कैसे? आइए, समझते हैं.
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हम सब जानते हैं कि गन्ने से चीनी बनती है. लेकिन गन्ने का इस्तेमाल सिर्फ चीनी बनाने तक सीमित नहीं है. गन्ने में मौजूद शर्करा की मदद से एक खास तरह का मटेरियल भी बनाया जा सकता है, जिसे PLA कहते हैं. इसका पूरा नाम पॉलीलैक्टिक एसिड है. PLA एक तरह का बायोप्लास्टिक है. इसका इस्तेमाल कुछ तरह की पैकेजिंग, कटलरी और कपड़े के फाइबर जैसे उत्पाद बनाने में किया जा सकता है.

इसे ऐसे समझिए. गन्ने से चीनी निकाली जाएगी. उस चीनी की मदद से पहले लैक्टिक एसिड नाम का पदार्थ बनाया जाएगा. फिर उसे एक खास मशीन में रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाएगा. इस प्रक्रिया के बाद PLA बनाने का रास्ता तैयार होता है. यानी गन्ने से सीधे प्लास्टिक नहीं निकलेगा. गन्ने से मिली शर्करा को कई चरणों से गुजारकर एक ऐसा मटेरियल बनाया जाएगा, जिससे आगे चलकर प्लास्टिक जैसी चीजें तैयार हो सकेंगी.
200 टन की मशीन आखिर करेगी क्या?
लखीमपुर पहुंची मशीन का नाम साइक्लाइजेशन रिएक्टर है. नाम थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इसका काम आसान तरीके से समझा जा सकता है. जैसे किसी रसोई में अलग-अलग चीजों को सही तापमान और तरीके से पकाकर एक नई चीज बनाई जाती है, वैसे ही फैक्ट्री में कुछ पदार्थों को खास परिस्थितियों में मिलाकर और रासायनिक प्रक्रिया से गुजारकर नया मटेरियल तैयार किया जाता है.
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इस मशीन में लैक्टिक एसिड को जरूरी रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाएगा. इसमें कैटेलिस्ट नाम का पदार्थ भी इस्तेमाल किया जाता है, जो प्रोसेस होने में हेल्प करता है. इस प्रक्रिया से PLA बनाने का प्रोसेस पूरा होगा. इसलिए यह मशीन प्लांट के लिए अहम है. इसे इंस्टाल करने के बाद बाकी जरूरी तैयारियां और टेस्ट भी करने होंगे.
इस मशीन का वजन करीब 200 टन है. इतनी भारी मशीन को सामान्य ट्रक पर लाना संभव नहीं था. इसलिए इसे ले जाने के लिए करीब 308 पहियों वाले विशाल ट्रांसपोर्टर का इस्तेमाल किया गया. मशीन पहले बेल्जियम से समुद्री रास्ते के जरिए ओडिशा के पोर्ट तक पहुंची. इसके बाद सड़क के रास्ते इसे लखीमपुर लाया गया. इतनी भारी मशीन को सड़क पर ले जाने के लिए विशेष ट्रांसपोर्टर और जरूरी सुरक्षा इंतजामों की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि इसे लेकर चलने वाला ट्रक लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया.

कुंभी में लगने वाले इस प्लांट की अनुमानित लागत करीब 3080 करोड़ है. प्लांट प्रबंधन के मुताबिक, यहां हर साल करीब 80000 टन PLA बनाने का टारगेट है. प्रबंधन का कहना है कि गन्ने से मिलने वाले कच्चे माल से लेकर PLA तैयार करने तक की प्रक्रिया एक ही परिसर में करने की योजना है. इसी आधार पर इसे भारत का पहला इंटीग्रेटेड प्लांट बताया जा रहा है. प्लांट प्रबंधन ने नवंबर में इसे शुरू करने की उम्मीद जताई है. हालांकि, मशीन लगाने, टेस्ट करने और दूसरी तैयारियां पूरी होने के बाद ही उत्पादन शुरू हो सकेगा.
पॉलिथीन की समस्या खत्म हो जाएगी?
अब सबसे जरूरी सवाल. अगर गन्ने से बायोप्लास्टिक बनाया जाएगा, तो क्या इससे पॉलिथीन की समस्या खत्म हो जाएगी? दरअसल, पारंपरिक प्लास्टिक के कई प्रकार पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं.
PLA जैसे मैटेरियल कुछ इस्तेमालों में ऑप्शन बन सकते हैं, लेकिन इनका फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि इन्हें कहां इस्तेमाल किया जा रहा है और इस्तेमाल के बाद इनका निपटान कैसे होता है. एक जरूरी बात और. बायोप्लास्टिक का मतलब यह नहीं कि वह हर जगह अपने आप जल्दी मिट्टी में मिल जाएगा. PLA को सही तरीके से डिकंपोज होने के लिए खास परिस्थितियों की जरूरत पड़ सकती है.
लखीमपुर को क्या फायदा होगा?
लखीमपुर खीरी में गन्ने की खेती और चीनी मिलें पहले से मौजूद हैं. ऐसे में गन्ने से एक नया औद्योगिक उत्पाद बनाने का प्रोजेक्ट जिले में उद्योग बढ़ाने का मौका बन सकता है. इससे फैक्ट्री से जुड़े काम, सामान की ढुलाई और दूसरी सेवाओं में रोजगार पैदा हो सकते हैं. फिलहाल, 308 पहियों वाला ट्रक और उस पर रखी 200 टन की मशीन चर्चा में है. लेकिन असली बात तब सामने आएगी, जब प्लांट में उत्पादन शुरू होगा.