बसपा से निष्कासित नेता अशोक सिद्धार्थ ने आखिरकार राजनीति से संन्यास ले लिया है. गुरुवार सुबह उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा पोस्ट लिखकर कहा, "मेरे लिए आपका नेतृत्व सर्वोपरि है. मेरे रिश्ते, परिवार, सब कुछ इसके सामने तुच्छ हैं. अशोक सिद्धार्थ बसपा के पूर्व राज्यसभा सांसद हैं और बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के भतीजे आकाश आनंद के ससुर हैं.
मायावती ने बुधवार को कहा था कि अगर अशोक सिद्धार्थ पूरी तरह से राजनीति से संन्यास ले लेते हैं, तो यह पार्टी में आकाश आनंद के राजनीतिक करियर के लिए अच्छा होगा और वह पार्टी में स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे. इसके बाद ही मायावती आकाश आनंद को फिर से जिम्मेदारी सौंप सकती हैं. मायावती की इसी शर्त के बाद अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान किया.
अशोक सिद्धार्थ को राजनीति में मायावती ही लेकर आईं. उन्होंने अशोक सिद्धार्थ को एमएलसी से लेकर राज्यसभा सदस्य तक बनाया और उनकी बेटी की शादी अपने भतीजे आकाश आनंद से कराई. इसके बावजूद मायावती की नजर में अशोक सिद्धार्थ क्यों खटकने लगे, जिसके चलते उनके साथ-साथ आकाश आनंद को भी एक बार फिर से बसपा से बाहर का रास्ता देखना पड़ा?
मायावती के साथ अशोक सिद्धार्थ के रिश्ते
अशोक सिद्धार्थ का जन्म 5 फरवरी 1965 को हुआ. वह फर्रुखाबाद के कायमगंज के रहने वाले हैं. अशोक सिद्धार्थ बसपा सुप्रीमो के बेहद करीबी और खास माने जाते रहे हैं. वह बसपा के पुराने नेता हैं और उनके पिता बसपा संस्थापक कांशीराम के सहयोगी रहे थे. बसपा में रहते हुए उनका कद लगातार बढ़ा मायावती ने उन्हें एमएलसी से लेकर राज्यसभा सांसद तक बनाया और संगठन में बड़ी राजनीतिक अहमियत दी.
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग मंडलों की जिम्मेदारी मायावती ने उन्हें सौंपी. इसके अलावा यूपी से बाहर कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा तक बसपा को मजबूत करने के लिए अशोक सिद्धार्थ को लगाया गया. अशोक सिद्धार्थ की बेटी के साथ अपने भतीजे आकाश आनंद की शादी कराई, इस लिहाज से अशोक सिद्धार्थ बसपा प्रमुख मायावती के समधी लगते हैं. हालांकि, शादी के बाद अशोक सिद्धार्थ की गतिविधियों को लेकर सवाल उठने लगे, जिससे मायावती की नाराजगी बढ़ती चली गई.
आकाश आनंद के ससुर होने का सियासी रुतबा
मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को अपना सियासी उत्तराधिकारी घोषित किया था. आकाश आनंद के ससुर होने के नाते अशोक सिद्धार्थ का रुतबा पार्टी से लेकर समाज तक में बढ़ा. आरोप है कि अशोक सिद्धार्थ ने आकाश आनंद के ससुर और मायावती के समधी होने का रुतबा बसपा के तमाम नेताओं पर दिखाना शुरू कर दिया था.
बसपा में उनकी सियासी अहमियत तब और बढ़ गई जब 2023 में उनकी बेटी प्रज्ञा सिद्धार्थ की शादी आकाश आनंद से हुई. मायावती के परिवार में बेटी की शादी होने के बाद पार्टी के भीतर उनका प्रभाव काफी बढ़ गया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अशोक सिद्धार्थ अपना अलग सियासी माहौल बना रहे थे, जिसकी शिकायत कई नेताओं ने मायावती से की थी. अशोक सिद्धार्थ यह जताने में जुटे थे कि बसपा का सियासी भविष्य आकाश आनंद ही हैं. इस बात की सूचना जब मायावती को मिली तो वह नाराज हुईं और उन्हें कई बार चेतावनी भी दी गई, लेकिन स्थिति में बदलाव नहीं आया. इसके बाद 2024 में अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकाल दिया गया था. हालांकि, माफी मांगने के बाद मायावती ने उन्हें पुन: पार्टी में शामिल कर लिया था, लेकिन हाल ही में उन्हें फिर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
आकाश आनंद को गुमराह करने का आरोप
मायावती का आरोप रहा है कि अशोक सिद्धार्थ ने आकाश आनंद को सियासी तौर पर गुमराह कर रखा है. उन्हें लगता था कि आकाश आनंद अपनी बुआ से ज्यादा अशोक सिद्धार्थ की बात मानते हैं और उनके मार्गदर्शन में चलते हैं. हालांकि, आकाश आनंद ने साफ तौर पर कहा था कि वह मायावती के ही मार्गदर्शन में काम करते हैं.
मायावती चाहती हैं कि आकाश आनंद पार्टी की विरासत को संभालें, लेकिन अपनी शर्तों और बसपा की मूल विचारधारा के दायरे में रहकर. अशोक सिद्धार्थ द्वारा आकाश आनंद को दिए जा रहे आक्रामक राजनीतिक ढर्रे और फैसलों को मायावती ने अपनी रणनीति के खिलाफ माना.
आकाश आनंद के आक्रामक चुनाव प्रचार और भाषणों की शैली के पीछे भी अशोक सिद्धार्थ का प्रभाव देखा जा रहा थाय मायावती को यह कभी बर्दाश्त नहीं रहता कि उनकी बिना अनुमति के पार्टी में कोई फैसला हो..ऐसे में मायावती ने कई बार स्पष्ट शब्दों में कहा कि अशोक सिद्धार्थ ने ही आकाश आनंद को बरगला रखा है. मायावती ने बुधवार को एक पोस्ट करके कहा कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संयास ले लेते हैं तो आकाश आनंद को दोबारा से अहमियत दे सकती है.
हालांकि, अशोक सिद्धार्थ ने अपनी सफाई में कहा कि उनकी आकाश से लंबे समय से बातचीत नहीं हुई है और वह कई महीनों से उनसे मिले भी नहीं हैं. उन्होंने कहा, "आकाश आनंद मेरे दामाद से पहले आपके भतीजे हैं और आनंद भाईसाहब के बेटे हैं. उनके अंदर आपका खून बहता है और उन्होंने जीवन के दो दशक आपकी छत्रछाया में बिताए हैं. मेरे जैसा मामूली कार्यकर्ता भला उन्हें क्या गुमराह कर पाएगा।.
बसपा में 'समानांतर व्यवस्था' चलाने का आरोप
बसपा नेताओं के मुताबिक अशोक सिद्धार्थ पर सबसे बड़ा आरोप यह था कि वह आकाश आनंद के आसपास एक ऐसा दायरा बना रहे थे, जिससे पार्टी के पुराने, वफादार और वरिष्ठ कैडर की पहुंच उन तक बंद हो रही थी. उन पर आरोप लगा कि वह पार्टी के पारंपरिक सांगठनिक ढांचे से अलग अपनी एक 'समानांतर व्यवस्था' खड़ी करने की कोशिश कर रहे थे.
अशोक सिद्धार्थ पर बसपा में अपना एक समानांतर गुट बनाने का आरोप भी लगा, जिसके चलते उन पर राजनीतिक गाज गिरी. इसके अलावा उनके द्वारा उठाए जा रहे कदमों से पार्टी के कई राज्य और जिला स्तरीय वरिष्ठ नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे. मायावती को यह फीडबैक मिला कि अशोक सिद्धार्थ की वजह से बसपा के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और नए तथा पुराने अनुभवी नेताओं के बीच दूरी पैदा हो रही है.
बसपा पर मायावती का एकछत्र नियंत्रण
आकाश आनंद के सियासी उभार के साथ अशोक सिद्धार्थ एक समानांतर पावर सेंटर के रूप में उभर रहे थे, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी. मायावती ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी में दो सत्ता केंद्र नहीं हो सकते. बसपा में मायावती ही अंतिम निर्णयकर्ता हैं.
जब मायावती को लगा कि अशोक सिद्धार्थ का प्रभाव संगठन के तय ढर्रे और अनुशासन को प्रभावित कर रहा है, तो उन्होंने पार्टी को किसी भी संभावित बिखराव या गुटबाजी से बचाने के लिए सख्त रुख अपनाया और अशोक सिद्धार्थ को किनारे कर दिया. मायावती की नजर में अशोक सिद्धार्थ इसलिए खटक रहे थे क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि कहीं वह संगठन पर अपना नियंत्रण न जमा लें.
बसपा का एक गुट मायावती को लगातार यही फीडबैक दे रहा था. इसीलिए अशोक सिद्धार्थ ने अपनी सफाई में यह भी कहा कि पार्टी के कुछ लोग उनके खिलाफ साजिश कर रहे हैं. अशोक सिद्धार्थ ने कहा, 'मैं कांशीराम जी की कसम खाता हूं कि मैंने कभी पार्टी हित के खिलाफ कोई काम नहीं किया और आपके खिलाफ जाने का तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता.'