आजमगढ़ का एक घर... जहां कभी बच्चों की आवाजें आती थीं. लोग आते-जाते थे. परिवार के लोग साथ बैठते थे. लेकिन अब उसी घर के दरवाजे पर पुलिस का ताला लगा है. घर के अंदर जाने की इजाजत नहीं है. जो लोग उस घर में रहते थे, वो अब अपने गांव से दूर रिश्तेदार के यहां रह रहे हैं.
ये कहानी आजमगढ़ के शंभूपुर गांव की है. एक ऐसी घटना के बाद, जिसमें एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत हो गई. अब परिवार में दो महिलाएं और छह बच्चियां बची हैं. ये सभी सुलतानपुर के महमूदपुर गांव में रिश्तेदारों के यहां रहने को मजबूर हैं. इन बच्चियों के सामने अब पढ़ाई से लेकर पेट पालने तक के सवाल हैं. महिलाओं के सामने जिंदगी दोबारा खड़ी करने की चुनौती है. और पूरे परिवार के मन में एक डर बैठा हुआ है.
कुछ दिन पहले शंभूपुर गांव में एक घर में पूजा-पाठ चल रहा था. परिवार के मुताबिक, गृह शांति के लिए पुरोहितों को बुलाया गया था. इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे इलाके को हिला दिया. पुलिस की जांच के मुताबिक, अरविंद सिंह पर अपनी पत्नी और घर में पूजा कराने आए दो पुरोहितों की हत्या का आरोप लगा. आरोप यह भी है कि उसने अपने एक बेटे की भी हत्या कर दी.
इसके बाद पुलिस कार्रवाई में अरविंद सिंह की भी मौत हो गई. यानी एक ही परिवार और उससे जुड़ी इस घटना में कुल पांच लोगों की जान चली गई. अब उसी घर में पुलिस का ताला लगा है. पुलिस मामले की जांच कर रही है. इसलिए घर के कमरों को सील किया गया है. परिवार के जो लोग बचे हैं, वो वहां नहीं रह रहे. लेकिन सिर्फ पुलिस का ताला ही वजह नहीं है. परिवार कहता है कि उन्हें डर भी लग रहा है.
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अब जरा उस परिवार की तरफ लौटिए, जो इस घटना के बाद बचा है. दो महिलाएं हैं, अब जिनके पति नहीं हैं, छह बच्चियां हैं, जिनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है. लेकिन जिस घर में उन्हें रहना था, वहां जाना मुश्किल है. इसलिए ये लोग सुलतानपुर के गांव पहुंच गए हैं. यहां रिश्तेदार के घर फिलहाल उनका ठिकाना है. रिश्तेदारों के यहां रहना किसी भी परिवार के लिए कुछ दिन की बात हो सकती है. लेकिन इन लोगों के सामने सवाल लंबा है. कब तक रहेंगे? बच्चियों की पढ़ाई कैसे चलेगी? घर का खर्च कैसे चलेगा? और एक सवाल- वापस अपने गांव जाएंगे तो क्या सुरक्षित रहेंगे?
इस डर की कहानी आज की नहीं है
परिवार के लोग कहते हैं कि शंभूपुर में डर की कहानी कई साल पुरानी है. साल 2018 में सुनील सिंह उर्फ गुड्डू सिंह की हत्या कर दी गई थी. परिवार के मुताबिक, गुड्डू सिंह को उनके पट्टीदारों ने एक निमंत्रण में जाने के दौरान मार दिया था. इस मामले में आरोपी जेल गए. लेकिन परिवार का कहना है कि बाद में आरोपी जमानत पर बाहर आ गए.
गुड्डू सिंह की बेटी वर्षा अब अपने चाचा अरविंद सिंह की मौत को इसी पुराने डर से जोड़कर देखती हैं. वर्षा का सवाल है कि आखिर उनके चाचा इतने डर में क्यों जी रहे थे? उनके मुताबिक, अरविंद ने घर से बाहर निकलना कम कर दिया था. परिवार के बच्चों को भी स्कूल भेजने में डर लगता था. मतलब डर धीरे-धीरे घर के अंदर घुस चुका था. और अब वही डर इतना बड़ा हो गया है कि पूरा परिवार गांव छोड़कर रिश्तेदारों के यहां रहने को मजबूर है.

'हम बच्चों को स्कूल तक नहीं भेजते थे'
वर्षा जब अपनी बात बताती हैं तो कहानी सिर्फ छह मौतों की नहीं रह जाती. वो बताती हैं कि परिवार पहले से डर के माहौल में जी रहा था. बच्चों को स्कूल भेजने तक में डर लगता था. वर्षा का कहना है कि अगर परिवार को पहले न्याय और सुरक्षा का भरोसा मिला होता, तो शायद हालात यहां तक नहीं पहुंचते. हालांकि पुराने मामले और मौजूदा घटना के बीच क्या सीधा संबंध है, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है. लेकिन परिवार की नजर में दोनों घटनाएं अलग नहीं हैं. उन्हें लगता है कि पुराने जख्म भरे नहीं और उसके बाद एक और ऐसी घटना हो गई, जिसने पूरा परिवार बिखेर दिया.
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वर्षा से जब इस पूरे मामले को लेकर बात की गई तो वो हर बात खुलकर नहीं कह पाईं. डर की वजह से कई बातें कैमरे के सामने बताने से बचती रहीं. सोचिए, जिस परिवार ने इतना कुछ झेला हो, उसके लिए अपने ही गांव के बारे में बात करना भी कितना मुश्किल होगा. एक तरफ सामने छह बच्चियों का भविष्य है. दूसरी तरफ अपने परिवार के लोगों की मौत का सदमा. और तीसरी तरफ सुरक्षा का डर.
परिवार अब सरकार की तरफ देख रहा है. रिश्तेदार रजनीश कहते हैं कि वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलना चाहते हैं. परिवार ने अपनी मांगों को लेकर एक पत्र भी तैयार किया है. उनकी मांग है कि परिवार चाहता है कि मामले में न्याय हो. महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो. और उन छह बच्चियों के भविष्य के लिए कोई रास्ता निकले. क्योंकि उनके सामने जिंदगी अभी बहुत लंबी है. उनकी पढ़ाई है. उनका पालन-पोषण है. और एक ऐसा भविष्य है, जिसे लेकर परिवार के पास फिलहाल कोई साफ जवाब नहीं है.
शंभूपुर का वो घर अभी बंद है. दरवाजे पर पुलिस का ताला है. अंदर उस परिवार की जिंदगी की चीजें हैं. बाहर एक पूरा गांव है, जहां इस घटना की चर्चा है. और सुलतानपुर में एक रिश्तेदार के घर छह बच्चियां और दो महिलाएं हैं, जो अपने अगले दिन का इंतजार कर रही हैं. छह मौतों के बाद बची जिंदगी को संभालना शायद सबसे मुश्किल होगा. इन महिलाओं और बच्चियों के लिए अब यही सबसे बड़ी लड़ाई है. एक तरफ उन्हें उस घटना का दर्द सहना है, जिसे वो शायद कभी भूल नहीं पाएंगी. दूसरी तरफ उन्हें अपनी जिंदगी आगे बढ़ानी है. पर सवाल वही है- कैसे? घर पर ताला लगा है. गांव में डर है. सामने भविष्य है.