आजमगढ़ के शंभूपुर गांव में मंगलवार की शाम एक घर के अंदर गोलियों की आवाज गूंजी. कुछ देर पहले तक जिस घर में पूजा-पाठ चल रहा था, वहां अचानक चीख-पुकार मच गई. एक महिला की हत्या हो चुकी थी. पूजा कराने आए दो पुरोहित भी गोली का शिकार हो चुके थे. और फिर उसी घर का एक कमरा बंद हो गया, जिसके अंदर तीन छोटे बच्चे और हथियार लेकर बैठा अरविंद सिंह था. बाहर पुलिस थी. रिश्तेदार थे. गांव के लोग थे.
अंदर बच्चे थे और अरविंद के हाथ में रिवॉल्वर थी. करीब 7 घंटे तक पुलिस उसे समझाने की कोशिश करती रही. परिवार के लोगों के जरिए भी उसे मनाने की कोशिश हुई. लेकिन वह बाहर आने को तैयार नहीं हुआ. फिर अचानक कमरे के अंदर से गोली चली. इसके बाद पुलिस ने स्टन ग्रेनेड और टियर गैस का इस्तेमाल किया, दरवाजा तोड़ा और अंदर दाखिल हुई.

पुलिस के मुताबिक, अरविंद ने टीम पर भी फायरिंग की. जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ और बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई. उसके 8 साल के बेटे शौर्य को भी गोली लगी थी, जिसकी इलाज के दौरान मौत हो गई. सवाल यह नहीं है कि मंगलवार को उस घर में क्या हुआ. सवाल यह भी है कि आखिर उस घर में ऐसा क्या चल रहा था, जिसकी वजह से तीन दिनों से महामृत्युंजय जाप कराया जा रहा था? इस कहानी की जड़ें परिवार के मुताबिक साल 2018 तक क्यों जाती हैं?
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परिवार की तरफ से सामने आई जानकारी के मुताबिक, अरविंद सिंह के लिए ही घर में महामृत्युंजय जाप कराया जा रहा था. उसकी पत्नी बबीता सिंह तीन पुरोहितों के साथ पूजा करा रही थीं. परिजनों का कहना है कि परिवार में यह धारणा बन गई थी कि अरविंद के ऊपर किसी तरह का 'साया' है. परिजनों के हवाले से अनुष्ठान को इसी आशंका से जोड़ा गया है. यानी जिस शख्स के लिए पूजा हो रही थी, वही कुछ देर बाद उस पूजा का सबसे बड़ा विरोधी बन गया.
मंगलवार शाम करीब 5:30 बजे अरविंद घर पहुंचा. घर में पूजा चल रही थी. उसने पुरोहितों से आधार कार्ड मांगना शुरू किया. बात बढ़ी. पत्नी बबीता ने पुरोहितों के साथ कथित तौर पर हो रहे व्यवहार का विरोध किया. यहीं से विवाद ने खतरनाक मोड़ ले लिया. परिवार के बयान के मुताबिक, अरविंद ने पहले पत्नी बबीता को गोली मारी. इसके बाद वहां मौजूद पुरोहितों में से एक भाग निकला, जबकि दो पुरोहितों को भी गोली मार दी गई. कुछ ही पलों में पूजा का घर वारदात की जगह बन चुका था.

फिर तीन बच्चे एक कमरे में कैद हो गए
पत्नी और दो पुरोहितों की हत्या के बाद अरविंद अपने तीन बच्चों को लेकर एक कमरे में चला गया. बच्चों में 8 साल का बेटा शौर्य, 5 साल की बेटी परी और करीब 6 महीने की एक बच्ची थी. अरविंद ने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. अब पुलिस के सामने सिर्फ आरोपी को पकड़ने की चुनौती नहीं थी. कमरे के अंदर तीन बच्चे थे.
पुलिस ने अरविंद को सरेंडर करने के लिए कहा. परिवार के लोगों से भी उससे बात कराई गई. लेकिन पुलिस के मुताबिक, अरविंद बच्चों को अपनी 'शील्ड' बताते हुए बाहर आने से इनकार करता रहा. करीब 7 घंटे तक यह स्थिति बनी रही. अधिकारी इंतजार करते रहे कि शायद बातचीत से बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके. फिर अंदर से गोली चलने की आवाज आई.

पुलिस के मुताबिक, इसके बाद ऑपरेशन को आगे बढ़ाना जरूरी हो गया. स्टन ग्रेनेड और टियर गैस का इस्तेमाल किया गया. दरवाजा तोड़ा गया और पुलिस टीम अंदर पहुंची. पुलिस का कहना है कि अंदर अरविंद ने लगातार फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी फायरिंग हुई. अंदर पहुंचने पर उसका बेटा शौर्य गोली लगने से घायल मिला. दो बेटियां भी कमरे में थीं. पुलिस के मुताबिक, बच्चियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया. अरविंद को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. लेकिन तब तक इस परिवार के पांच लोग अपनी जान गंवा चुके थे.
अब लौटते हैं साल 2018 में
आजमगढ़ की इस कहानी को समझने के लिए परिवार के मुताबिक हमें करीब आठ साल पीछे जाना होगा. 12 अक्टूबर 2018 को अरविंद के बड़े भाई सुनील सिंह की हत्या कर दी गई थी. परिवार के मुताबिक, इस घटना के बाद अरविंद काफी बदल गया था. बड़े भाई की हत्या का मामला अभी अदालत में चल रहा है.
परिवार की तरफ से यह भी बताया गया है कि साल 2015 में बबीता ने पड़ोस के दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया था. परिवार के मुताबिक, इस मामले में दोनों को 20-20 साल की सजा हुई थी. इसी मामले की सुनवाई के दौरान सुनील सिंह की हत्या हुई थी. इन पुराने मामलों का मौजूदा वारदात से सीधा संबंध क्या था, यह जांच का विषय है. लेकिन परिवार का कहना है कि भाई की हत्या के बाद अरविंद के व्यवहार में बड़ा बदलाव आया.
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वह लोगों से कम मिलने लगा. अकेला रहने लगा. उसके करीबियों के मुताबिक, वह पूजा-पाठ को लेकर भी चिढ़ने लगा था. सोमवार को भी घर में पूजा को लेकर विवाद हुआ था और पुलिस को 112 नंबर पर सूचना दी गई थी. बाद में मामला शांत करा दिया गया था. अगले ही दिन उसी घर में गोलियां चलीं.
जिस रिवॉल्वर से वारदात हुई, वह भी भाई से जुड़ी थी
इस कहानी का एक और अहम सिरा उस रिवॉल्वर से जुड़ा है, जिससे कथित तौर पर अरविंद ने फायरिंग की. परिवार के मुताबिक, यह हथियार उसके बड़े भाई सुनील सिंह का था. भाई की हत्या के बाद यह रिवॉल्वर अरविंद को ट्रांसफर हुई थी. यानी 2018 में जिस परिवार ने एक भाई को खोया, उसी परिवार में वर्षों बाद उसी भाई से जुड़ा हथियार एक ऐसी वारदात में इस्तेमाल हुआ, जिसमें अरविंद की पत्नी और दो पुरोहितों की जान चली गई.

'आत्मा का साया' से शुरू हुई पूजा, लेकिन कहानी गोलियों तक पहुंच गई. परिवार के मुताबिक, जिस घर में तीन दिन से महामृत्युंजय जाप चल रहा था, वहां मकसद अरविंद के ऊपर बताए जा रहे 'साये' को दूर करना था. पुरोहित पूजा करा रहे थे. पत्नी उसमें शामिल थी. लेकिन अरविंद के घर लौटने के बाद आधार कार्ड मांगने से शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि कुछ ही देर में पत्नी और दो पुरोहितों की हत्या हो गई.
फिर बच्चे बंधक बने. फिर 7 घंटे की पुलिस कार्रवाई चली. फिर कमरे के अंदर गोली चली. और आखिर में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अरविंद की मौत हो गई. आज शंभूपुर गांव में उस घर के बाहर सन्नाटा है. लेकिन इस घटना के पीछे की कहानी अभी कई सवाल छोड़ गई है.
2018 में भाई सुनील सिंह की हत्या के बाद परिवार में क्या हुआ था? उस पुराने मामले और अरविंद के व्यवहार में क्या संबंध था? घर में अनुष्ठान कराने का फैसला किस वजह से लिया गया था? पुरोहितों से विवाद आखिर इतना क्यों बढ़ा? और जिस रिवॉल्वर से मंगलवार को गोलियां चलीं, उसके लाइसेंस और ट्रांसफर की पूरी कहानी क्या है? इन सवालों के जवाब जांच के साथ सामने आएंगे. फिलहाल इतना साफ है कि एक घर में शांति के लिए कराया जा रहा अनुष्ठान कुछ ही देर में ऐसे सनसनीखेज कांड में बदल गया, जिसने एक ही परिवार के कई लोगों की जिंदगी खत्म कर दी.