उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में राम भक्त राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले को लेकर आहत हैं. इस बीच जांच के दौरान तेजी से नए-नए खुलासे हो रहे और बयान सामने आ रहे हैं. इसी कड़ी में राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक के बाद चढ़ावा चोरी मामले को लेकर गोविंद देव गिरी ने कई सवालों के जवाब दिए. उन्होंने कहा कि ट्रस्ट का आंतरिक विश्वास है कि चंपत राय इस मामले में किसी भी तरह से शामिल नहीं हैं और उनकी नीयत पर कोई सवाल नहीं उठता.
आजतक संवाददाता कुमार अभिषेक ने राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी से खास बातचीत की है.
सवाल: सोमवार को जो बैठक हुई उसके बाद जो नतीजा निकला, उसमें दोनों लोग अब ट्रस्ट से बाहर हैं. इस पूरी बैठक में एक चीज दिखी कि चंपत राय को पूरी तरह क्लीन चिट दी गई और यही एसआईटी की रिपोर्ट में भी दिख रहा है. क्या कहेंगे आप?
गोविंद देव गिरी: यह हमारा आंतरिक विश्वास है कि इस संपूर्ण कार्य को जिन्होंने पहले दिन से खड़ा किया है और जिन्होंने इसके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है, उनके निर्दोष होने का हम लोगों को विश्वास है.
सवाल: लेकिन निर्दोष आप कैसे मानते हैं, जब उनके नाक के नीचे इतनी बड़ी चोरी हुई? ₹79 लाख से ज़्यादा कैश पकड़ा गया. आप उनको क्या मानते हैं? क्या उनको लापरवाह मानते हैं? उनकी नाक के नीचे ये चोरी हुई.
गोविंद देव गिरी: ऐसा है, मैंने जब निर्दोष कहा है तो उसका अर्थ यह है कि उनके किसी प्रकार के ऐसे इरादे नहीं थे. वे इसमें लिप्त नहीं हैं. उनके द्वारा करप्शन का किसी भी प्रकार का कोई भी कार्य होना संभव नहीं है.
दोष अगर है तो उनकी असावधानी का है. अनेक लोगों पर उनका विश्वास, बहुत सारे काम अपने ऊपर ले लेना और इसके कारण जो कार्य-पद्धति की कमियां रहीं, वे स्वभाव के दोष हैं. उनके अंतःकरण की शुद्धता को लेकर हम निश्चित हैं.
सवाल: तो आप मानते हैं कि उनका अहंकार कहीं न कहीं हावी रहा है? क्योंकि कहा जाता है कि वो अक्खड़ और ज़िद्दी किस्म के रहे, किसी की नहीं सुनी और यही भारी पड़ा.
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गोविंद देव गिरी: इसको अहंकार कहना मैं ठीक नहीं मानता. निश्चित रूप से वे ज़िद्दी हैं. वे अपनी ही बात सुनते हैं, ऐसा भी नहीं है. अनेक मामलों में उन्होंने लोगों की बात सुनी है और अनेक मामलों में नहीं भी सुनी. ऐसा रहा है.
सवाल: तो अब क्या वो पूरी तरह बाहर हैं? दोबारा उनकी एंट्री नहीं होगी?
गोविंद देव गिरी: आज की स्थिति में तो ऐसा ही है.
सवाल: एसआईटी की रिपोर्ट में अनिल मिश्रा को बहुत ज़िम्मेदार ठहराया गया है. उनके नाम हैं, लेकिन चंपत राय का नाम नहीं है. तो क्या आपको लगता है कि अनिल मिश्रा दोषी हैं?
गोविंद देव गिरी: दोषी हैं या नहीं, यह एसआईटी निश्चित करेगी. यह मुझे नहीं बतलाना है. एसआईटी जिसको दोषी करार करेगी, वही दोषी है. मैं क्यों बताऊं कि वो दोषी हैं अथवा नहीं?
सवाल: लेकिन आप कहते हैं कि चंपत राय भोले हैं. तो क्या वो इतने भोले रहे कि सब कुछ हो गया? करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट पहुंची है. ट्रस्ट की साख को धक्का लगा है. मैं चंपत राय के बारे में पूछ रहा हूं. करोड़ों लोगों की आस्था पर चोट पहुंची है, ट्रस्ट को धक्का लगा है. आपको लगता है कि वो इतने भोले हैं कि ये सब चीज़ें होती गईं और कुछ नहीं हुआ?
गोविंद देव गिरी: भोला शब्द आपने इस्तेमाल किया है. भोले का अर्थ यह होता है कि जिस कठोरता के साथ अपने लोगों को दूर करना चाहिए, उनकी निगरानी रखनी चाहिए, वो वे नहीं कर पाए. यह असावधानी है. इसी को मैं भोलापन कहता हूं.
सवाल: एसआईटी की जांच में 45 दिनों का सीसीटीवी रिकॉर्ड मिला. उसमें 70 चोरियां सामने आईं. कहा जा रहा है कि पुराने फुटेज ओवरराइट होकर डिलीट हो गए. अब एसआईटी की जांच के बाद आपको लगता है कि ट्रस्ट पर लोगों का भरोसा फिर जागेगा?
गोविंद देव गिरी: निश्चित रूप से जागेगा. क्योंकि भूल तो हर स्थान पर होती है. महत्वपूर्ण यह है कि भूलों को सुधारने का प्रमाणिक प्रयास किया जाता है या नहीं. आज लोगों के मन में जो आशंका पैदा हुई है, वह हुई है, लेकिन हम इसे अच्छे काम करके दूर करेंगे और लोगों का विश्वास निश्चित रूप से बना रहेगा. बहुत बड़ी मात्रा में अविश्वास निर्माण करने का प्रयास किया गया और इतना बड़ा हौवा खड़ा कर दिया गया. हम लोग इस संकट को भी पार कर जाएँगे, ऐसा हमारा विश्वास है.
सावल: ट्रस्ट अब आगे कैसे काम करेगा? क्या इसमें सीईओ होंगे? किस तरीके से आपने सोचा है कि आगे ट्रस्ट का संचालन होगा?
गोविंद देव गिरी: आरंभ से ही हम लोगों का यह सोचना रहा है कि ऐसे काम को देखने के लिए यहां एक सीईओ होना चाहिए, जो प्रशासनिक और ब्यूरोक्रेटिक अनुशासन को कठोरता के साथ लागू कर सके. ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता रही है. हम उसे लाएंगे. इसके लिए हमने एक समिति बनाई है. वह समिति हमारे सामने तीन लोगों के नाम रखेगी और उनमें से हम चयन करेंगे.
सवाल: एक सवाल और आता है. आप कोषाध्यक्ष थे. आपको लगता है कि इस पूरे मामले में आपकी भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदारी बनती है?
गोविंद देव गिरी: निश्चित रूप से बनती है. लेकिन हुंडी के बारे में जो कुछ हुआ, वहां जो घपला हुआ, उसमें मेरी ज़िम्मेदारी नहीं रही. क्योंकि मैंने शुरू से ही उधर ध्यान नहीं दिया. वह मेरा कार्यक्षेत्र भी नहीं था.
मेरा क्षेत्र था अकाउंट में जमा धन की निगरानी रखना और जो व्यय होता है उसका ध्यान रखना. मैं यहां रहता भी नहीं हूं.
हुंडी का काम और दैनिक संचालन स्थानीय न्यासी देखते थे. उसके साथ मेरा कोई संबंध नहीं था. उसका जो एसओपी बना, वह भी अनिल मिश्रा ने बनाया था, मैंने नहीं बनाया था. मुझे भी वह इसी महीने देखने को मिला.
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सवाल: लेकिन आपको लगता है कि कोषाध्यक्ष के नाते आपसे भी चूक हुई? आपने उन कामों पर नजर नहीं रखी, जो लोग कोष से जुड़े काम देख रहे थे?
गोविंद देव गिरी: अपने साथी जब काम कर रहे हों और वह उनकी जिम्मेदारी हो, तो सामान्य रूप से उन पर विश्वास किया जाता है. उस दृष्टि से अगर देखें तो निगरानी और अधिक हो सकती थी. इसलिए एक सीमा तक ज़िम्मेदारी तो बनती ही है.