दुनिया में अलग-अलग समुदायों के अंतिम संस्कार के तरीके अलग होते हैं. कहीं शव को दफनाया जाता है, कहीं जलाया जाता है और कहीं समुद्र में प्रवाहित किया जाता है. लेकिन दक्षिण अमेरिका की यनोमामी जनजाति की अंतिम संस्कार परंपरा ऐसी है, जिसे सुनकर शायद आपको यकीन करना मुश्किल हो जाए.
ब्राजील और वेनेजुएला के अमेजन क्षेत्र में रहने वाली इस आदिवासी जनजाति में मृत व्यक्ति के शव को जलाने के बाद उसकी बची हुई हड्डियों और राख को एक खास तरीके से संभाला जाता है. अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान इन अवशेषों को पीसकर राख में मिलाया जाता है और फिर उसे केले से बने एक पारंपरिक भोजन में मिलाकर समुदाय के लोग ग्रहण करते हैं.
बाहर से देखने पर यह परंपरा बेहद अजीब लग सकती है, लेकिन यनोमामी लोगों के लिए इसका संबंध अपने प्रियजन की मौत, आत्मा और अंतिम विदाई से है.
शव को जलाने के बाद क्या करते हैं?
द गार्जियन नाइजीरिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यनोमामी समाज में अंतिम संस्कार को सिर्फ मृत शरीर को खत्म करने की प्रक्रिया नहीं माना जाता. यह मृत व्यक्ति की आत्मा को विदाई देने से जुड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है.
मृत व्यक्ति के शव को जलाया जाता है. इसके बाद बची हुई हड्डियों की राख को इकट्ठा किया जाता है. उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, इस राख का एक हिस्सा अंतिम संस्कार से जुड़े सामुदायिक समारोहों में केले के सूप में मिलाकर ग्रहण किया जाता है.
आखिर राख को खाने की जरूरत क्यों पड़ती है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कोई समुदाय ऐसा क्यों करता है? यनोमामी लोगों की मान्यताओं में मौत के बाद शरीर को पीछे छोड़ देना काफी नहीं माना जाता. उनके लिए अंतिम संस्कार का मकसद मृत व्यक्ति की आत्मा को जीवित लोगों की दुनिया से अलग करके उसकी आगे की यात्रा सुनिश्चित करना है.
सर्वाइल इंटरनेशनल के मुताबिक, यनोमामी लोगों के लिए मृत व्यक्ति के शरीर और उसकी चीजों को संभालकर रखना भी सामान्य परंपरा नहीं है. अंतिम संस्कार के बाद मृत व्यक्ति की भौतिक चीजों को नष्ट कर दिया जाता है और उसका नाम तक दोबारा लेने से बचा जाता है.
यानी उनके लिए अंतिम विदाई का मतलब सिर्फ शरीर को खत्म करना नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति से जुड़ी भौतिक चीजों को भी पीछे छोड़ देना है.
केले के सूप में मिलाकर खाते हैं राख
अंतिम संस्कार से जुड़ा एक सामुदायिक समारोह भी होता है, जिसे रीहू कहा जाता है. इस दौरान समुदाय के लोग एक साथ जुटते हैं. मृत व्यक्ति की राख का कुछ हिस्सा केले के सूप में मिलाया जाता है और समारोह में शामिल लोग उसे ग्रहण करते हैं. इसे मृत व्यक्ति को अपने समुदाय के भीतर अंतिम रूप से समाहित करने और उसकी आत्मा को आगे जाने देने से जुड़ी मान्यता के रूप में समझा जाता है.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसे रोजमर्रा के खाने या किसी सामान्य भोजन की तरह नहीं देखा जाता. यह अंतिम संस्कार और शोक से जुड़ी एक खास सांस्कृतिक रस्म है.
चेहरे पर राख लगाकर जताते हैं शोक
इस परंपरा में शोक जताने के भी अलग तरीके बताए गए हैं. अंतिम संस्कार के दौरान लोग रोते हैं, गाते हैं और सामूहिक तौर पर मृत व्यक्ति को विदाई देते हैं.
मृतक के शरीर को जलाना इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. यनोमामी लोगों की मान्यता में शव को बिना पारंपरिक अंतिम संस्कार के छोड़ देना बेहद गंभीर बात मानी जाती है.
उनके लिए मृतकों का उचित तरीके से अंतिम संस्कार करना इतना महत्वपूर्ण है कि युद्ध या हिंसा की स्थिति में भी अपने लोगों के शव वापस लाने की कोशिश की जाती रही है.
दुश्मन के हाथों मौत हो तो मामला और अलग
अगर किसी व्यक्ति की मौत दुश्मन के हाथों हुई हो तो अंतिम संस्कार और बदले की प्रक्रिया अलग होती थी. यदि कोई दुश्म किसी रिश्तेदार या गांव के सदस्य की हत्या कर देता है, तो केवल महिलाएं ही राख ग्रहण करती हैं और उसके बाद दोषियों से बदला लिया जाता है. यह समारोह उसी रात किया जाता है. जब ग्रामीण दुश्मनों के इलाके पर आक्रमण करके बदला लेने वाले होते हैं.
उनकी मान्यता में मृत व्यक्ति की चीजों को संभालकर रखने के बजाय उन्हें खत्म करना और अंतिम संस्कार की रस्म पूरी करना जीवित और मृत लोगों की दुनिया के बीच एक अंतिम दूरी बनाने का तरीका है.