जब छोटी बहन आंखों के सामने स्विमिंग पूल में डूबने लगे तो आम तौर पर कोई भी भाई उसे बचाने के लिए तुरंत पानी में कूद जाता. लेकिन बेल्जियम के 26 साल के लोइक डी मैरी ने ऐसा नहीं किया. उसने पूल में छलांग लगाने के बजाय एक खिलौना उठाया और उसे बहन की तरफ बढ़ा दिया. वजह भी ऐसी थी, जिसे सुनकर उनकी मां तक हैरान रह गईं. उसने कहा कि मैं पानी में नहीं कूदा क्योंकि मेरे कपड़े गिले हो जाते.
जब हम 'साइकोपैथ' शब्द सुनते हैं तो दिमाग में अक्सर सीरियल किलर, हिंसक अपराधी या फिल्मी किरदार आने लगते हैं. लेकिन 26 साल के लोइक डी मैरी कहते हैं कि हर साइकोपैथ अपराधी या हत्यारा नहीं होता.
द मिरर की रिपोर्टे के मुताबिक, बेल्जियम के रहने वाले लोइक को करीब तीन साल पहले पता चला कि उन्हें साइकोपैथी है. इसके बाद से वह इस स्थिति को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि साइकोपैथ होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सीरियल किलर ही होगा.
बहन डूब रही थी, लेकिन पानी में नहीं कूदे
लोइक के मुताबिक, बचपन से ही उन्हें लगता था कि वह दूसरे बच्चों से अलग हैं. उन्हें अपनी भावनाएं और दूसरों की भावनाएं उसी तरह समझ नहीं आती थीं, जैसे आम लोगों को आती हैं. वह अपनी स्थिति को समझाने के लिए एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं.
लोइक कहते हैं कि उनके लिए सहानुभूति यानी दूसरे के दर्द और भावनाओं को समझना कुछ ऐसा है जैसे कोई संगीत सुन रहा हो. बाकी लोग संगीत के शब्द और उसकी धुन दोनों महसूस कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ शब्द सुनाई देते हैं, धुन महसूस नहीं होती. उनकी बहन के साथ हुआ एक हादसा इस अंतर को और साफ करता है.
लोइक और उनकी छोटी बहन घर के पीछे बने स्विमिंग पूल के पास खेल रहे थे. इसी दौरान उनकी बहन अचानक पूल में गिर गई और डूबने लगी. ऐसे समय में ज्यादातर लोग बिना कुछ सोचे पानी में कूदकर बच्चे को बचाने की कोशिश करेंगे. लेकिन लोइक ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने कुछ पल सोचा और फिर पास पड़ा एक प्लास्टिक का खिलौना उठाकर बहन की तरफ बढ़ा दिया, ताकि वह उसे पकड़ सके. लोइक बताते हैं कि मैं पूल में नहीं कूदा क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरे कपड़े गीले हो जाएं.
मां ने पूछा- इस बच्चे को हुआ क्या है?
इस घटना ने उनकी मां को भी हैरान कर दिया था. लोइक की मां घर से बाहर आईं और उन्हें चिल्लाते हुए पूछा कि उन्होंने अपनी बहन को बचाने के लिए पानी में छलांग क्यों नहीं लगाई. लोइक का जवाब था - मां, मेरे कपड़े साफ थे.
उनकी मां के लिए यह जवाब किसी झटके से कम नहीं था. लोइक के मुताबिक, उनकी मां ने उसी समय पहली बार महसूस किया कि उनके बच्चे की सोच बाकी लोगों से काफी अलग है.
क्लासमेट की मौत पर भी नहीं रोए
लोइक को बचपन की एक और घटना याद है. उनके एक क्लासमेट की कार हादसे में मौत हो गई थी. स्कूल में हर कोई रो रहा था, लेकिन लोइक नहीं रोए. वह बताते हैं कि उस समय शिक्षक ने उन्हें जिस तरह देखा, उससे उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया दूसरे बच्चों से अलग हैं. जहां बाकी बच्चे अपने साथी की मौत से दुखी थे, वहीं लोइक के अंदर वैसी भावना पैदा नहीं हुई.
गुस्से में बेसबॉल बैट लेकर स्कूल पहुंचे
बड़े होने के साथ लोइक का व्यवहार कई बार हिंसक भी होने लगा. वह बताते हैं कि एक बार एक लड़के से उनकी दुश्मनी हो गई. दोनों के बीच तनाव बढ़ता गया और एक दिन लोइक बेसबॉल बैट लेकर स्कूल पहुंच गए.
उनके मन में उस लड़के को बुरी तरह पीटने का ख्याल था. वह कहते हैं कि वह उसका सिर तरबूज की तरह फोड़ देना चाहते थे. हालांकि, उनका कहना है कि किसी न किसी तरह वह हर बार मुसीबत से निकल जाते थे और उन्हें कई मौके मिले.
लोइक के मुताबिक, साइकोपैथी की एक बड़ी विशेषता यह है कि व्यक्ति अपने काम के नतीजों की परवाह बहुत कम करता है. वह बताते हैं कि वह जिंदगी को पूरी तरह वर्तमान में जीते हैं.
उनका कहना है कि उन्होंने जो कुछ भी किया, उसका उन्हें पछतावा नहीं होता. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी चिंता, डिप्रेशन या अपराधबोध जैसी भावनाएं महसूस नहीं कीं. मुश्किल परिस्थितियों में भी वह खुद को शांत रख सकते हैं और बिना भावनात्मक तकलीफ के कठोर फैसले ले सकते हैं.
बचपन के माहौल का भी पड़ा असर
लोइक मानते हैं कि उनके व्यक्तित्व पर घर के माहौल का भी असर पड़ा. उनके माता-पिता का तलाक हो गया था. इसके बाद उनकी मां शराब पीने लगीं और जब लोइक करीब आठ साल के थे, तब उन्होंने आत्महत्या की कोशिश भी की.
लोइक के मुताबिक, जब उनकी उम्र 8 से 16 तक थी, उनकी मां शराब पीती रहीं.कई बार वह आक्रामक रहती थीं और कभी-कभी घर से गायब भी रहती थीं. लोइक बताते हैं कि उनकी मां उनसे ऐसी बातें भी कहती थीं कि वह अब उनका बेटा नहीं है. उनके मुताबिक, इस तरह के व्यवहार का उन पर गहरा असर पड़ा.
हालांकि, लोइक का मानना है कि साइकोपैथी की बुनियाद जन्म से ही होती है. उनके मुताबिक, खराब पारिवारिक माहौल इस स्थिति को और मुश्किल बना सकता है, लेकिन अकेले माहौल से कोई व्यक्ति साइकोपैथ नहीं बनता.
साइकोपैथ और नार्सिसिस्ट में क्या फर्क?
लोइक साइकोपैथी और नार्सिसिज्म को भी अलग-अलग मानते हैं. उनका कहना है कि दोनों में कुछ समानताएं हो सकती हैं, लेकिन दोनों एक ही चीज नहीं हैं. वह कहते हैं कि साइकोपैथ में खुद को लेकर भरोसा और अहंकार पहले से मौजूद रहता है. जबकि नार्सिसिस्ट को अपने अहंकार को मजबूत करने के लिए दूसरों से लगातार तारीफ और ध्यान की जरूरत पड़ सकती है.
लोइक अपने पुराने व्यवहार को याद करते हुए बताते हैं कि वह लोगों के सामने बेहद आकर्षक और मिलनसार नजर आ सकते थे. उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान रहती थी और वह ऐसा व्यवहार कर सकते थे, जिससे सामने वाले को लगे कि वह उसकी भावनाओं को समझ रहे हैं. लेकिन लोइक खुद मानते हैं कि कई बार यह सिर्फ दिखावा होता था.
वह कहते हैं कि अतीत में उनका व्यवहार बहुत ज्यादा चालाकी भरा था और यह उनके लिए भी और दूसरों के लिए भी खतरनाक हो सकता था. लोइक यह भी स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कई लोगों को चोट पहुंचाई है. हालांकि, अब वह एक थेरेपिस्ट की मदद ले रहे हैं, जो उन्हें लोगों के साथ बेहतर तरीके से व्यवहार करना सिखा रहा है.
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लोइक की कहानी भले ही असहज और हैरान करने वाली लगे, लेकिन उनका मकसद लोगों को यह समझाना है कि साइकोपैथी का मतलब किसी हत्यारे या सीरियल किलर से नहीं है. हर व्यक्ति का व्यवहार अलग हो सकता है और इस स्थिति को समझने के लिए फिल्मों और अपराध की कहानियों से आगे जाकर वास्तविक मनोविज्ञान को समझना जरूरी है.