
नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा में उनकी आवाज, आंखों का गुस्सा और संवाद बोलने का अंदाज लंबे समय तक याद किया जाएगा. 75 साल की उम्र में उनके निधन की खबर सामने आते ही उनके चाहने वालों ने सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के पुराने सीन शेयर करने शुरू कर दिए हैं. इनमें सबसे ज्यादा चर्चा ‘क्रांतिवीर’ के उस सीन की हो रही है, जिसमें नाना का किरदार प्रताप भीड़ के सामने खड़ा होकर धर्म के नाम पर इंसानों को बांटने पर सवाल उठाता है.
‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...’
‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर ने प्रताप का किरदार निभाया था. फिल्म का क्लाइमेक्स हिंदी सिनेमा के यादगार दृश्यों में गिना जाता है. प्रताप भीड़ के सामने खड़ा होता है और सवाल करता है कि आखिर एक इंसान का खून हिंदू और दूसरे का खून मुसलमान कैसे हो सकता है.
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इस सीन की खास बात यह बताई जाती है कि नाना ने इसे महज एक रटे-रटाए संवाद की तरह पेश नहीं किया था. कैमरा चलने के बाद उन्होंने अपने अंदाज में बोलना शुरू किया और उनका गुस्सा, दर्द और बेचैनी किरदार में उतरती चली गई. नतीजा ऐसा सीन बना, जिसे दर्शकों ने सालों बाद भी नहीं भुलाया.
इसी फिल्म की उनकी एक लाइन अब उनके निधन के बाद और भी भावुक कर रही है- ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...’
क्रांतिवीर का ये सीन कौन भूल पाएगा.
आज जब फैंस उनके पुराने वीडियो शेयर कर रहे हैं, तो यह संवाद एक फिल्मी लाइन से आगे निकलकर नाना की याद से जुड़ गया है.
क्रांतिवीर का वो सीन
खून एक है तो पहचान अलग कैसे? सीन में प्रताप का सवाल सिर्फ वहां मौजूद लोगों से नहीं होता, बल्कि वह दर्शकों को भी सोचने पर मजबूर करता है. वह धार्मिक पहचान के नाम पर इंसानों के बीच फर्क किए जाने पर सवाल उठाता है.
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नाना इस पूरे हिस्से को जिस तीखे अंदाज में निभाते हैं, वह इसे महज फिल्मी संवाद नहीं रहने देता. उनकी आवाज में गुस्सा है, चेहरे पर बेचैनी है और बोलने के अंदाज में ऐसा आक्रोश है कि सीन देखते हुए दर्शक भी खुद को उस भीड़ का हिस्सा महसूस करने लगते हैं.
‘परिंदा’ का अन्ना, जिसकी खामोशी में भी डर था
नाना पाटेकर की अदाकारी का दूसरा पहलू ‘परिंदा’ में देखने को मिला. फिल्म में उन्होंने अन्ना नाम के खतरनाक गैंगस्टर की भूमिका निभाई थी.
अन्ना का किरदार सिर्फ गुस्से और हिंसा से डरावना नहीं था. नाना की आंखों का ठहराव और अचानक बदल जाने वाला हावभाव ही सामने वाले को बेचैन कर देता था. उन्होंने इस किरदार में दिखाया कि एक अभिनेता बिना बहुत कुछ कहे भी पर्दे पर खौफ पैदा कर सकता है.

‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अफसर की सख्ती
‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी साधु अगाशे का किरदार निभाया. यहां उनका अंदाज पहले से बिल्कुल अलग था.
साधु कम बोलता है, लेकिन उसकी मौजूदगी ही सामने वाले पर दबाव बना देती है. नाना ने इस भूमिका में एक ऐसे पुलिस अफसर को दिखाया जो अपराधियों से निपटने के लिए भावनाओं को पीछे छोड़ देता है. इस किरदार में उनकी संवाद अदायगी से ज्यादा उनकी आंखें और बॉडी लैंग्वेज चर्चा में रही.
‘वेलकम’ में गुस्सैल लेकिन मजेदार उदय शेट्टी
अगर किसी को लगता है कि नाना सिर्फ गंभीर और गुस्सैल किरदार निभा सकते थे, तो ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी इसका सबसे मजेदार जवाब है.
उदय एक गैंगस्टर है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या उसका अपना गुस्सा है. छोटी-सी बात पर भड़क जाना, आवाज ऊंची कर देना और फिर हालात संभालने की कोशिश करना- नाना ने इस किरदार को ऐसा अंदाज दिया कि वह फिल्म के सबसे यादगार किरदारों में शामिल हो गया.
अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी केमिस्ट्री ने इस कॉमेडी को और खास बना दिया. आज भी ‘उदय भाई’ के सीन सोशल मीडिया पर मीम्स और वीडियो के जरिए लोगों को हंसाते हैं.
‘नटसम्राट’ का गणपत बेलवलकर
नाना पाटेकर के अभिनय की गहराई समझने के लिए ‘नटसम्राट’ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फिल्म में उन्होंने गणपत बेलवलकर का किरदार निभाया, जो उम्र भर थिएटर में अलग-अलग किरदार निभाता रहा, लेकिन निजी जिंदगी में अकेलेपन और रिश्तों के दर्द से जूझता है.
इस भूमिका में नाना का गुस्सा जितना प्रभावशाली था, उनकी खामोशी उतनी ही दर्दनाक. उनकी आंखों में दिखाई देने वाली टूटन ने इस किरदार को बेहद यादगार बना दिया.
यही थे नाना पाटेकर
नाना पाटेकर को सिर्फ एक तरह के अभिनेता के रूप में देखना उनके काम को छोटा करना होगा. वह एक तरफ ‘क्रांतिवीर’ के प्रताप थे, दूसरी तरफ ‘परिंदा’ के अन्ना. ‘अब तक छप्पन’ में सख्त पुलिस अफसर बने तो ‘वेलकम’ में लोगों को हंसाने वाले उदय शेट्टी.
उनकी यही रेंज उन्हें बाकी कलाकारों से अलग करती थी. वह स्क्रीन पर आते थे तो दर्शक सिर्फ किरदार नहीं देखते थे, बल्कि उनकी आवाज, आंखों और ठहराव से कहानी महसूस करते थे.
नाना ने पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में हिंदी और मराठी सिनेमा में काम किया. उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री जैसे सम्मान मिले. अभिनय के अलावा उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी हाथ आजमाया.
उनकी जिंदगी का एक दूसरा पहलू सामाजिक काम से जुड़ा रहा. किसान परिवारों की मदद के लिए उन्होंने ‘नाम फाउंडेशन’ के जरिए भी काम किया.
आज नाना पाटेकर नहीं हैं, लेकिन उनके किरदार अभी भी जिंदा हैं. कहीं प्रताप व्यवस्था पर सवाल करता नजर आएगा, कहीं अन्ना की आंखों में खौफ दिखेगा, कहीं उदय शेट्टी अपनी आवाज ऊंची करेगा और कहीं गणपत बेलवलकर के चेहरे पर अकेलेपन का दर्द दिखाई देगा.
नाना ने कभी कहा था कि अभिनय उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि सांस लेने जैसा था. शायद यही वजह है कि उनके जाने के बाद भी उनकी फिल्में उन्हें पर्दे पर बार-बार हमारे सामने ले आती रहेंगी.दुनिया चलती रहेगी, लेकिन नाना पाटेकर के चाहने वालों के लिए पर्दे पर उनकी कमी हमेशा महसूस होगी.