कव्वाली (Qawwali) भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्रसिद्ध सूफी संगीत परंपरा है, जो मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान में प्रचलित है. यह सूफी मुस्लिम काव्य और संगीत का ऐसा रूप है, जिसका उद्देश्य श्रोताओं को आध्यात्मिक अनुभव और ईश्वर की याद में डूबने की भावना तक पहुंचाना होता है. कव्वाली का संबंध सूफी परंपरा से है और इसे धार्मिक तथा आध्यात्मिक सभाओं में विशेष महत्व दिया जाता है.
"कव्वाली" शब्द अरबी भाषा के शब्द "कौल" से निकला है, जिसका अर्थ होता है "बोलना" या "कहना". इसी से विकसित होकर कव्वाली एक ऐसी संगीत शैली बनी, जिसमें सूफी संतों के संदेश, ईश्वर प्रेम और आध्यात्मिक विचारों को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है.
कव्वाली प्रस्तुत करने वाले कलाकारों को कव्वाल कहा जाता है. एक सामान्य कव्वाली दल में एक या दो मुख्य गायक होते हैं, जो गीत की मुख्य पंक्तियां गाते हैं. उनके साथ अन्य कव्वाल समूह के रूप में बैठकर कोरस गाते हैं और तालियां बजाकर प्रस्तुति को आगे बढ़ाते हैं. संगीत में हारमोनियम का उपयोग प्रमुख रूप से किया जाता है, जो गायन को सहारा देता है. इसके अलावा ढोलक या तबला जैसे वाद्य यंत्र ताल और लय बनाए रखने का कार्य करते हैं.
कव्वाली का आयोजन आमतौर पर मेहफिल-ए-समा के दौरान किया जाता है. इसका अर्थ है "आध्यात्मिक श्रवण की सभा". ऐसी सभाएं विशेष रूप से सूफी संतों की दरगाहों और मजारों पर आयोजित होती हैं. संतों की पुण्यतिथि या उर्स के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. इसके अलावा वर्ष भर गुरुवार और शुक्रवार को भी कई स्थानों पर कव्वाली की महफिलें आयोजित की जाती हैं, क्योंकि इन दिनों का धार्मिक महत्व माना जाता है.
कव्वाली केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है. कई बार विशेष अवसरों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इसका आयोजन किया जाता है. समय के साथ यह संगीत शैली दक्षिण एशिया से बाहर भी लोकप्रिय हुई. विशेष रूप से 20वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में विश्व संगीत (World Music) के बढ़ते प्रभाव के कारण कव्वाली को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली.
आज कव्वाली सूफी संगीत की एक महत्वपूर्ण विधा मानी जाती है, जो भारत और पाकिस्तान की सांस्कृतिक तथा धार्मिक परंपराओं का एक अभिन्न हिस्सा बनी हुई है. इसके माध्यम से सूफी विचारधारा, आध्यात्मिक संदेश और पारंपरिक संगीत की विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है.
धुरंधर फिल्म में शामिल 65 साल पुरानी कव्वाली 'न तो कारवां की तलाश है' ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया है. यह कव्वाली 1960 की फिल्म 'बरसात की रात' की है, जिसे रोशन ने संगीतबद्ध किया था और जिसमें मन्ना डे, मोहम्मद रफी, आशा भोंसले जैसे महान गायकों ने आवाज दी थी.
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