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Return of the Jungle: 20 साल का जुनून, एक कव्वाली और नुसरत… ये फिल्म थियेटर्स में बवाल मचा रही है 

भारत में एनिमेशन की परिभाषा माइथोलॉजी या किड्स फिल्म तक ही सीमित ही रही है, लेकिन इस बार एक सीरियस फिल्म आई है जो ना सिर्फ बच्चों बल्कि बड़ों को भी पसंद आ रही है. थियेटर्स में लगी रिटर्न ऑफ द जंगल की एक क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई और उसके बाद दर्शकों की संख्या थियेटर्स में बढ़ती गई. हमने फिल्म के डायरेक्टर और लीड एनिमेटर से बात की है, आप भी पढ़ें...

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फिल्म के एक सीन में कव्वाली आती है, जिसका मेन कैरेक्टर नुसरत फतेह अली खान से मिलता-जुलता है.
फिल्म के एक सीन में कव्वाली आती है, जिसका मेन कैरेक्टर नुसरत फतेह अली खान से मिलता-जुलता है.

सोशल मीडिया के अंतहीन स्क्रॉलिंग लूप में जब उंगलियां थकने लगती हैं, तब अचानक एक क्लिप स्क्रीन पर तैरती है. एक दरगाह का रूहानी मंजर है, सामने कुछ छोटे-छोटे एनिमेटेड बच्चे बैठे हैं और बैकग्राउंड में एक ऐसी कव्वाली गूंज रही है जो सीधे दिल को छू जाती है. इस 30 सेकंड से एक मिनट की क्लिप ने इंटरनेट पर जैसे जज्बात का सैलाब ला दिया है. लोग इस रील या वीडियो को सिर्फ देख और शेयर नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसे देखते हुए अनगिनत लोगों की आंखें नम हो रही हैं. इस एक छोटी सी क्लिप ने सिनेमाघरों में वो जादू कर दिया है, जो आमतौर पर करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट और बड़े सितारों वाली लाइव-एक्शन फिल्में भी नहीं कर पातीं. लोग इस एनिमेटेड कव्वाली के इस कदर दीवाने हुए हैं कि इसने उन्हें थिएटर्स तक खींच लिया है. यह जादुई क्लिप जिस फिल्म की है, उसका नाम है 'रिटर्न ऑफ द जंगल'.

एक ऐसी फिल्म, जिसके रिलीज होने से पहले कोई बहुत बड़ा शोर-शराबा नहीं था, लेकिन इसकी एक कव्वाली ने सिनेमाघरों के बाहर दर्शकों की लंबी लाइनें खड़ी कर दी हैं. हमारे समाज में एनिमेशन फिल्मों को लेकर हमेशा से एक सोच रही है कि ये सिर्फ 'बच्चों का खेल' हैं. लेकिन जब आप 'रिटर्न ऑफ द जंगल' के इस सूफियाना कव्वाली वाले सीन से गुजरते हैं या इसी के बहाने इस पूरी फ़िल्म को देखते हैं, तो दिल के तार झनझना उठते हैं. यह सीन सिर्फ बच्चों के मनोरंजन के लिए नहीं बनाया गया है; यह बड़ों के भीतर सो चुके उस मासूम और भावुक इंसान को जगाने की एक गंभीर कोशिश है, जो इस भागदौड़ और जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो गया था.
 

फिल्म की कहानी केंद्रीय विद्यालय की कक्षा 4-बी के बच्चों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. स्कूल के वही जाने-पहचाने आम दिन, बच्चों की मासूम सी नोकझोंक, एक सीधे-साधे बच्चे का स्कूल के बुली (धौंस जमाने वाले लड़के) से सामना और इन तमाम उलझनों के बीच एक प्यारे से 'थाथा' (दादाजी) की पंचतंत्र और लोककथाओं के जरिए दी जाने वाली जिंदगी की सीख. इस फिल्म में कोई चमकीला या अवास्तविक सुपरहीरो नहीं है, बल्कि हमारे और आपके घरों जैसे आम बच्चे हैं. इस मिले-जुले भारत के ताने-बाने में जहां राहुल की मासूमियत है, वहीं अली की मोहब्बत भी है. यही वजह है कि जब फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और इस दरगाह और कव्वाली वाले मोड़ पर आकर ठहरती है, तो दर्शक खुद को भावुक होने से रोक नहीं पाते.

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इस जादुई कव्वाली वाले सीन को पर्दे पर उतारने के पीछे जो लगन और जो तपस्या छिपी है, उसकी कहानी फिल्म के परदे से भी ज्यादा दिल को छू लेने वाली है. एनिमेशन की दुनिया में किसी किरदार के चेहरे पर भक्ति और समर्पण के वो भाव लाना, उसकी उंगलियों की थिरकन में कव्वाली की असली लय डालना और उसकी एनिमेटेड आंखों में वो रूहानी चमक पैदा करना एक बेहद मुश्किल और बारीक काम है. जब कव्वाली का वो मुख्य किरदार स्क्रीन पर आकर अपनी आवाज और हरकतों से समां बांधता है, तो एक पल के लिए भी यह अहसास नहीं होता कि यह कंप्यूटर की स्क्रीन पर पिक्सल्स से बनाया गया कोई बेजान कैरेक्टर है. ऐसा लगता है कि उस किरदार के भीतर अपनी एक जीती-जागती आत्मा है, जो सीधे दर्शकों के दिल से बात कर रही है.

दिल को तसल्ली देने वाले सीन के पीछे फिल्म के एनिमेशन लीड अजीत अहेर इस पूरी प्रक्रिया की बारीकियों और अपने लगाव को शेयर करते हुए बताते हैं, "हमारी फिल्म 'रिटर्न ऑफ द जंगल' के कव्वाली सीक्वेंस को दर्शकों से जो बेपनाह प्यार मिल रहा है, वो अद्भुत है. इस पूरे सीक्वेंस के एनिमेशन को मुख्य रूप से डपून राय दीवान और मैंने संभाला है, और मुझे इस कव्वाली के सभी सिंगिंग शॉट्स को एनिमेट करने का मौका मिला. मैं कॉलेज के दिनों से ही उस्ताद नुसरत फतेह अली खान साहब के संगीत से वाकिफ था, लेकिन ज्यादातर उन्हीं गानों के जरिए जो टीवी या बॉलीवुड फिल्मों में पॉपुलर थे. हालांकि, 'याद-ए-नबी का गुलशन महका' यह कव्वाली मैंने पहली बार तब सुनी जब मैंने वैभव कुमारेश (फिल्म डायरेक्टर) द्वारा बनाया गया 'रिटर्न ऑफ द जंगल' का एनिमैटिक (स्टोरीबोर्ड का वीडियो रूप) देखा."

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अजीत उस शुरुआती अहसास को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे आज भी याद है कि मैं उस गाने और उस सीक्वेंस की कहानी में पूरी तरह डूब गया था. उसी दिन से, इस कव्वाली को एनिमेट करना मेरी विशलिस्ट का हिस्सा बन गया था. जब आखिरकार वो वक्त आया, तो मैंने अलग-अलग कव्वाली परफॉर्मेंस को समझने में लंबा समय बिताया. मैंने नुसरत साहब के लाइव परफॉर्मेंस के साथ-साथ कई अन्य दिग्गज कव्वालों के वीडियो देखे. मैंने उनकी बॉडी लैंग्वेज, हाथ के इशारों, चेहरे के हाव-भाव और उस एनर्जी को बहुत करीब से देखा जो वे गाते समय पैदा करते हैं. मैं स्क्रीन पर उस फील को पकड़ना चाहता था जहां सिंगर कव्वाली के संगीत और उसकी गहरी भावना में पूरी तरह खो जाता है. इसके अलावा, मैंने लाइव परफॉर्मेंस की बारीकियों को समझने के लिए तबला वादकों और उनके साथ संगत करने वाले कलाकारों के मूवमेंट्स का भी स्टडी किया."

यह मेहनत सिर्फ वीडियो देखने तक सीमित नहीं थी, बल्कि स्टूडियो के भीतर कलाकारों ने खुद को उस माहौल में झोंक दिया था. अजीत बताते हैं, "हमने स्टूडियो में अपने खुद के एक्टिंग रेफरेंस भी शूट किए. स्टूडियो के हम कुछ लोगों ने मिलकर उस वक्त मौजूद कबाड़ और सामान का इस्तेमाल करके पूरे सीक्वेंस को खुद परफॉर्म किया—पैकेजिंग के डिब्बे हमारे लिए हारमोनियम बन गए और हेलमेट तबले बन गए. यह एक बेहद मजेदार एक्सरसाइज थी, लेकिन इसने मुझे उस दृश्य की लय, कलाकारों के आपसी तालमेल और परफॉर्मेंस को गहराई से समझने में मदद की. फाइनल एनिमेशन इन सभी रेफरेंस का एक खूबसूरत मिश्रण बनकर उभरा. मैंने नुसरत साहब के परफॉर्मेंस, अन्य कव्वाली कलाकारों के अंदाज और हमारे अपने एक्टिंग रेफरेंस से बेस्ट एलिमेंट्स को चुना, जो उस किरदार और कहानी के साथ सबसे ज्यादा न्याय कर सकते थे."

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इस विजुअल चमत्कार के पीछे सिर्फ तकनीक या स्केच की मेहनत नहीं थी, बल्कि फिल्म के निर्देशक वैभव कुमारेश का वो 15-20 साल पुराना सपना और लंबा संघर्ष था, जिसने इस फिल्म को थिएटर्स तक पहुंचाने का रास्ता बनाया. अपनी इस लंबी और भावुक यात्रा को याद करते हुए डायरेक्टर वैभव कुमारेश बताते हैं, "मेरी टीम पिछले करीब 15-20 साल से इस फिल्म पर काम कर रही थी. यह हमारा एक बेहद पुराना आइडिया और सपना था. हमारे पास इस स्वतंत्र प्रोजेक्ट के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए हम अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए कमर्शियल काम करते थे, दूसरों के लिए एनिमेटेड फिल्में और विज्ञापन बनाते थे. वहां से जो पैसे आते थे, उन्हें बचाकर हम साइड में अपनी इस फिल्म को थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ाते थे." 

फिल्म डायरेक्टर वैभव कुमारेश
फिल्म डायरेक्टर वैभव कुमारेश

वह दौर कितना कठिन था, इसका अंदाजा वैभव के संघर्ष से लगाया जा सकता है. वे कहते हैं, "कोई भी इस फिल्म के लिए फंड नहीं देना चाहता था, हमें मार्केट में प्रोड्यूसर्स नहीं मिल रहे थे. आखिरकार, मैंने अपनी मां, बहन और बाकी बेहद करीबी रिश्तेदारों से पैसे उधार लेकर इस फिल्म को पूरा किया. जब फिल्म बनकर तैयार हुई और हमने इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को ऑफर किया, तो उन्होंने इसे सीधे रिजेक्ट कर दिया. जो कोई इक्का-दुक्का प्लेटफॉर्म तैयार भी हो रहा था, वो हमारी लागत का महज दस प्रतिशत ही ऑफर कर रहा था. ऐसे में हार मानकर बैठने के बजाय हमने एक बड़ा रिस्क लिया और इसे सीधे थिएटर्स में रिलीज करने का फैसला किया."

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वैभव आगे बताते हैं कि कैसे दर्शकों के प्यार ने उनके संघर्ष की पूरी कहानी को बदल कर रख दिया, "हमारी डिस्ट्रिब्यूटर कंपनी ने हमें बहुत सपोर्ट किया. शुरुआत में हमसे 350 स्क्रीन्स का वादा किया गया था, लेकिन इसके बावजूद हमें 500 से ज्यादा स्क्रीन्स मिलीं. शुरुआत में कुछ गिने-चुने लोगों ने इसे देखा, लेकिन जैसे ही फिल्म की माउथ-पब्लिसिटी शुरू हुई और वो कव्वाली की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई, लोग झुंड के झुंड बनाकर सिनेमाघरों की तरफ दौड़ पड़े. आज स्थिति यह है कि मेरे पास विदेशों से फोन आ रहे हैं. लोग खुद आगे आकर 100-100 टिकटें खरीदकर डोनेट कर रहे हैं ताकि दूसरे लोग इसे देख सकें. कई एनजीओ गरीब बच्चों को यह फिल्म दिखाने के लिए थिएटर्स ले जा रहे हैं. समाज का हर तबका इस कहानी से जुड़ रहा है."

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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इस कव्वाली के सिलेक्शन और फिल्म के किरदारों के पीछे की एक बेहद खूबसूरत सच्चाई को उजागर करते हुए वैभव कहते हैं, "मेरे साथ यह कव्वाली बहुत सालों से जुड़ी हुई थी. मैं इसे अक्सर सुना करता था और हमेशा सोचता था कि इस कव्वाली के सुरों और शब्दों में वो ताकत है जो किसी बीमार इंसान को भी ठीक कर सकती है. यही वजह थी कि मैं इसे अपनी फिल्म का हिस्सा बनाना चाहता था. इस कव्वाली को गाने वाले उस्ताद नुसरत फतेह अली खान साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फिल्म में गूंजने वाली आवाज उन्हीं की है और यह कव्वाली बिल्कुल ओरिजिनल है, जिसके लिए हमने बकायदा सिंक राइट्स खरीदे हैं. एक और दिलचस्प बात यह है कि कव्वाली के सीन में पीछे बैठे जो तमाम कैरेक्टर्स आपको दिखते हैं, वे असल में मेरी ही टीम के लोग हैं; हमने उन्हीं का स्केच बनाकर उन्हें एनिमेशन के किरदारों में ढाल दिया. आज जब लोग इस पर इतना प्यार लुटा रहे हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि हमारी 15-20 साल की वो गुमनाम तपस्या सफल हो गई है. फिलहाल मैंने इसे ओटीटी पर ले जाने के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा है. मैं चाहता हूं कि यह फिल्म थिएटर्स में लंबी चले. अब जब स्कूल खुलेंगे, तो मेरी ख्वाहिश है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे अपनी इस देसी कला को देखने आएं. यह फिल्म सिर्फ बच्चों के लिए बनाई गई कोई हल्की-फुल्की रील नहीं है, यह हर उम्र के इंसान के लिए बनी एक बेहद गंभीर और मुकम्मल फिल्म है."

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आज जब सिनेमाघरों के अंधेरे कमरों में बैठकर लोग इस 93 मिनट की फिल्म को देख रहे हैं, तो वे सिर्फ एक कहानी नहीं देख रहे होते, बल्कि वे परदे के पीछे के उस दो दशक लंबे संघर्ष और कलात्मक जिद को सलाम कर रहे होते हैं जिसने भारतीय एनिमेशन को एक नया और शानदार आयाम दिया है. फिल्म के भीतर फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन की पुरानी यादों से लेकर क्रिकेट मैच के उस रोमांचक मोड़ तक, हर एक सीन को इतनी संजीदगी और बारीकी से बुना गया है कि बच्चे जहां हंसते-खेलते और तालियां बजाते हुए थिएटर से बाहर आते हैं, वहीं बड़े एक अजीब से सुकूं, दिमागी शांति और भारी मन के साथ बाहर निकलते हैं. यह कव्वाली महज एक बैकग्राउंड स्कोर या मनोरंजन का जरिया नहीं है; यह इस पूरी फिल्म की धड़कन है जो बहुत ही खामोशी से इंसानियत, आपसी भाईचारे और हमारी खोई हुई मासूमियत का संदेश दे जाती है.

इस वायरल क्लिप के जादू को गहराई से समझने के लिए हमें उस कलाम को भी समझना होगा, जिसके सुरों ने इस पूरे मंजर को जादुई बनाया है. फिल्म के इस सीन में उस्ताद नुसरत फतेह अली खान साहब की आवाज में जो रचना गूंज रही है, वो असल में मशहूर शायर अब्दुल सत्तार नियाजी द्वारा लिखी गई एक बेहद खूबसूरत नात है—'याद-ए-नबी का गुलशन महका महका लगता है'.

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इस कलाम की आत्मा बेहद पाक और सच्ची है, जहां शायर बयां करता है कि जब दिल में नबी (पैगंबर) की यादों का बसेरा होता है, तो पूरी कायनात और यह जिंदगी किसी महकते हुए गुलशन (बगीचे) की तरह खूबसूरत लगने लगती है. इसके बोल सीधे दिल में उतरते हैं, जहां सूफियाना इश्क, सादगी और पूरी तरह खुद को सौंप देने की बात की गई है.

नियाजी साहब के लिखे इस कलाम के हर एक शेर में जो सादगी और गहराई है, वो इस फिल्म के विजुअल्स के साथ मिलकर कमाल कर देती है. जरा इसके इन शब्दों पर गौर कीजिए:

याद-ए-नबी का गुलशन महका-महका लगता है
महफ़िल में मौजूद हैं आक़ा ऐसा लगता है

नाम-ए-मोहम्मद कितना मीठा-मीठा लगता है
प्यारे नबी का ज़िक्र भी हम को प्यारा लगता है

लब पे नग़्मे सल्ले-'अला के हाथों में कश्कोल
देखो तो सरकार का मंगता कैसा लगता है

आँखों में मा-ज़ाग़ का कजला सर ताहा का ताज
कैसे कहूँ कमली वाला हम जैसा लगता है

सोशल मीडिया की इस वर्चुअल दुनिया में जहां हर रोज हजारों चमक-दमक वाली चीजें आती हैं और पलक झपकते ही गायब हो जाती हैं, वहां 'रिटर्न ऑफ द जंगल' की इस क्लिप का इस कदर टिक जाना और वायरल होना यह साबित करता है कि दर्शक आज भी ईमानदारी से रची गई कला के भूखे हैं. तकनीक कितनी भी एडवांस क्यों न हो जाए, अगर उसके पीछे छिपे जज्बात सच्चे और मिट्टी से जुड़े हों, तो वो एनिमेशन के किरदारों के जरिए भी इंसानी आंखों को भिगो सकती है और लोगों को थिएटर्स तक खींचकर ला सकती है. 'रिटर्न ऑफ द जंगल' हमारी अपनी माटी की सोंधी खुशबू से महकती एक ऐसी अनमोल कलाकृति है, जिसे हर उस शख्स को जरूर देखना चाहिए जो आज के शोर-शराबे वाले सिनेमा के बीच कहीं खो चुके दिल, रूह और सच्ची कला की तलाश कर रहा है.


 

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