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एक छोटे से डिवाइस ने ऐसे बचाई ईरान में फंसे US पायलट की जान, पेंटागन की टेक्नोलॉजी का खेल

ईरान ने हाल ही में अमेरिकी फाइटर जेट गिराया. अमेरिकी एयरमैन 48 घंटों तक ईरान में फंसा रहा. बाद में अमेरिका ने रेस्क्यू किया, लेकिन इस दौरान एक खास डिवाइस काम आया. बताया जा रहा है कि जान बचाने में इस डिवाइस का बड़ा योगदान रहा है. आइए जानते हैं इस खास डिवाइस के बारे में.

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एक खास डिवाइस ने की अमेरिकी एयरमैन की मदद
एक खास डिवाइस ने की अमेरिकी एयरमैन की मदद

मिडिल ईस्ट जंग ने अब तक ये तो साबित कर दिया है कि वॉर सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ी जाती. इस वॉर में टेक्नोलॉजी और AI का यूज काफी हो रहा है. हाल ही में एक डिवाइस चर्चा में आया है. ये डिवाइस AI बेस्ड तो नहीं है, लेकिन काफी टाइम से ये मिलिट्री की मदद कर रहा है.

ईरान ने जंग के दौरान अमेरिकी F-15E लड़ाकू विमान मार गिराया. अमेरिका ने जिंदा बचे पायलट्स और नेविगेटर को जिंदा बचाने के लिए जो रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, उसमें एक खास डिवाइस की सबसे ज़्यादा मदद ली गई. इसका नाम है कॉम्बैट सर्वाइवर इवेडर लोकेटर.

डिवाइस छोटा, लेकिन काम हैरान करने वाला

बोइंग का बनाया हुआ CSEL करीब 800 ग्राम का छोटा सा डिवाइडस है, जो पायलट की सर्वाइवल जैकेट में लगा रहता है. जब पायलट पैराशूट से नीचे गिरता है, तब भी यह डिवाइस उसके साथ ही रहता है और उसकी लोकेशन का एन्क्रिप्टेड भेजता रहता है.  साथ ही यह सिग्नल बहुत जल्दी–जल्दी फ्रीक्वेंसी बदलते हैं और बहुत छोटे–छोटे बर्स्ट में जाते हैं, इसलिए दुश्मन की नज़र से इन्हें पकड़ पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. 

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इस डिवाइस का नाम CSEL (Combat Survivor Evader Locator) है. इस डिवाइस ने ईरान में फंसे हुए अमेरिकी एयरमैन को दुश्मन के इलाके में 48 घंटे तक जिंदा रहने और सुरक्षित कॉन्टैक्ट बनाए रखने में मदद की. यह डिवाइस अब दुनिया की सबसे एडवांस्ड सर्वाइवल और रेस्क्यू टेक्नोलॉजी में गिना जा रहा है.

क्या है CSEL?

CSEL दरअसल एक हाई-टेक कम्युनिकेशन और लोकेशन डिवाइस है, जिसे खास तौर पर उन सैनिकों, पायलट्स या स्पेशल फोर्सेज के लिए बनाया गया है जो मिशन के दौरान दुश्मन के इलाके में फंस जाते हैं. इसे अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए Boeing कंपनी ने बनाया है. इसका मेन मॉडल AN/PRQ-7 रेडियो के नाम से जाना जाता है.

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यह डिवाइस सैनिकों की टैक्टिकल वेस्ट या गियर में फिट किया जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर वे बिना किसी देरी के इसका इस्तेमाल कर सकें. इसका काम ये है कि अगर कोई सैनिक या पायलट दुश्मन के इलाके में गिर जाए या अलग-थलग पड़ जाए, तो वह अपनी लोकेशन, स्थिति और जरूरत की जानकारी सुरक्षित तरीके से अपने कमांड सेंटर तक पहुंचा सके.

कैसे काम करता है यह डिवाइस?

CSEL की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुरक्षित और हिडेन कम्युनिकेशन पावर है. आम रेडियो की तरह यह खुलकर बातचीत नहीं करता, क्योंकि ऐसा करने से दुश्मन लोकेशन ट्रैक कर सकता है. इसके बजाय, यह एन्क्रिप्टेड टेक्स्ट मैसेज के जरिए जानकारी भेजता है.

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डिवाइस अल्ट्रा-शॉर्ट सिग्नल बर्स्ट और तेजी से फ्रीक्वेंसी बदलने वाली तकनीक का इस्तेमाल करता है. इसका मतलब यह है कि इसकी सिग्नल ट्रांसमिशन इतनी तेज और बिखरी हुई होती है कि दुश्मन के लिए उसे पकड़ना या ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है. यह तकनीक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से बचने में बेहद कारगर मानी जाती है.

डायरेक्ट सैटेलाइट कनेक्शन

CSEL की एक और बड़ी खासियत है इसका सैटेलाइट कम्युनिकेशन. यह डिवाइस ओवर-द-होराइजन यानी लंबी दूरी तक सैटेलाइट के जरिए कनेक्शन स्टैब्लिश कर सकता है. इसका मतलब है कि चाहे सैनिक किसी भी इलाके में हो, जंगल, पहाड़ या दुश्मन का इलाका, वह सीधे अपने कमांड सेंटर तक सिग्नल भेज सकता है.

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इसके साथ ही इसमें लाइन-ऑफ-साइट रेडियो भी होता है, जिससे पास में मौजूद रेस्क्यू टीम से सीधा संपर्क किया जा सकता है.

GPS और रियल-टाइम लोकेशन

यह डिवाइस GPS के जरिए सटीक लोकेशन ट्रैक करता है और समय-समय पर कमांड सेंटर को अपडेट भेजता रहता है. जरूरत पड़ने पर यह रियल-टाइम लोकेशन भी शेयर कर सकता है, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन और तेज और सटीक हो जाता है.

यही वजह है कि हाल के मामलों में, जहां एयरमैन या सैनिक दुश्मन के इलाके में फंस गए थे, वहां उनकी लोकेशन ट्रैक करना और उन्हें सुरक्षित निकालना संभव हो पाया.

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मैप्स और इंटेलिजेंस डेटा भी साथ

CSEL सिर्फ लोकेशन भेजने का काम नहीं करता, बल्कि इसमें पहले से टोपोग्राफिक मैप्स और इंटेलिजेंस डेटा भी लोड होता है. इसका फायदा यह है कि सैनिक खुद भी यह समझ सकता है कि उसे किस दिशा में आगे बढ़ना है और कहां सुरक्षित क्षेत्र मौजूद हैं. इससे वह सिर्फ इंतजार करने के बजाय खुद भी सुरक्षित निकलने की कोशिश कर सकता है.

टू-वे कम्युनिकेशन और ऑथेंटिकेशन

इस डिवाइस में दो-तरफा टेक्स्ट कम्युनिकेशन की सुविधा होती है. यानी सैनिक सिर्फ सिग्नल भेज ही नहीं सकता, बल्कि कमांड सेंटर से डायरेक्शन भी हासिल कर सकता है. वह छोटे-छोटे मैसेज जैसे इंजर्ड या रेडी टु पिकअप भेज सकता है.

इसके अलावा इसमें ऑथेंटिकेशन सिस्टम भी होता है, जिससे यह मेक श्योर किया जाता है कि सिग्नल सही शख्स से ही आ रहा है. यह फीचर दुश्मन द्वारा फर्जी सिग्नल भेजने की संभावना को खत्म करता है.

कठिन परिस्थितियों में भी बिना रूके करता है ये काम

CSEL को बेहद कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. यह लगभग 800 ग्राम का कॉम्पैक्ट डिवाइस है. ये डिवाइस हार्श कंडीशन में भी ये सब काम कर सकता है. 

  • तेज झटकों और हाई जी-फोर्स को झेल सकता है
  • पानी में गिरने के बाद भी काम करता है
  • ज्यादा टेंप्रेचर में भी ऐक्टिव रहता है

यानी अगर कोई पायलट इजेक्शन के बाद जमीन पर गिरता है, तब भी यह डिवाइस काम करता रहता है.

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