आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अब तक की सबसे बड़ी टेक क्रांति बताया जा रहा है. टेक कंपनियां दावा कर रही हैं कि एआई दुनिया बदल देगा, काम करने का तरीका बदल देगा और नई इकॉनमी खड़ी कर देगा.
इसी बीच पिछले कुछ महीनों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खिलाफ दुनिया के कई देशों में जम कर विरोध हो रहा है जिसमें अमेरिका भी शामिल है.
दुनिया के कई देशों में एआई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं. कहीं लोग एआई डेटा सेंटर बनने से रोक रहे हैं, कहीं लेखक एआई के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, तो कहीं छात्र और एक्टिविस्ट टेक कंपनियों के अधिकारियों का विरोध कर रहे हैं. अब सवाल उठने लगा है कि क्या एआई के खिलाफ एक ग्लोबल आंदोलन आकार ले रहा है?
AI के खिलाफ गुस्सा आखिर क्यों बढ़ रहा है?
एआई का विरोध सिर्फ नौकरी छिनने के डर तक सीमित नहीं है. लोगों की चिंता कई स्तरों पर है. एक तरफ कर्मचारियों को डर है कि एआई उनकी जगह ले सकता है. दूसरी तरफ लोकल ट्राइब्स को लगता है कि एआई को चलाने वाला बड़ा डेटा सेंटर उनके शहरों और गांवों पर बोझ बन रहे हैं.
यह भी पढ़ें: गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर उबर तक! AI के नाम पर लाखों लोगों की छंटनी के बाद मुश्किल में कंपनियां
दरअसल एआई मॉडल्स को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली, पानी और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है. यही वजह है कि अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई इलाकों में नए डेटा सेंटरों का विरोध हो रहा है.
पानी और बिजली खा रहा है AI
डेटा सेंटर में बिजली की खपत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं. एक 100-मेगावॉट का AI डेटा सेंटर 75 हजार घरों के बराबर अकेले बिजली की खपत करता है.
इतना ही नहीं, रिपोर्ट के मुताबिक एक अनुमान है कि 2025 तक AI सिस्टम की वजह से 765 बिलियन लीटर पानी की खपत हो चुकी थी. ये आंकड़ा दुनिया की पूरी वॉटर बोतल की इंडस्ट्री के बराबार है.
IEA के अनुमान के मुताबिक 2030 तक हर साल AI पर 1,200 बिलियन लीटर पानी खर्च होगा. दरअसल पानी को डेटा सेंटर कूलिंग के लिए यूज किया जाता है. इसके अलावा इससे इलेक्ट्रिसिटी भी बनाई जाती है ताकि डेटा सेंटर चलता रहे.
लोगों का कहना है कि इन परियोजनाओं से बिजली की खपत बढ़ेगी, पानी की कमी हो सकती है और स्थानीय पर्यावरण पर असर पड़ेगा.
अमेरिका में डेटा सेंटर बन गए हैं नया राजनीतिक मुद्दा
अमेरिका में एआई विरोध का सबसे बड़ा केंद्र डेटा सेंटर बन चुके हैं. कई राज्यों में स्थानीय लोगों ने डेटा सेंटर परियोजनाओं के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है.
हाल के महीनों में कैलिफोर्निया के कोचेला क्षेत्र में सैकड़ों लोगों ने प्रस्तावित डेटा सेंटर प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन किया.
यह भी पढ़ें: Meta ने कर दिया खेल, WhatsApp के लिए भी देने होंगे पैसे!
विरोध इतना बढ़ गया कि स्थानीय प्रशासन को डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाने पर विचार करना पड़ा. लोगों का कहना था कि यह प्रोजेक्ट इलाके के पानी और बिजली पर भारी दबाव डालेगी. वर्जीनिया, टेक्सास, एरिजोना, विस्कॉन्सिन, मिसौरी और कई अन्य राज्यों में भी इसी तरह के विरोध देखे गए हैं.
कुछ जगहों पर परियोजनाएं रद्द हुईं, जबकि कई जगहों पर प्रोडक्शन टल गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक स्थानीय विरोध के कारण अरबों डॉलर की डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स प्रभावित हुए हैं.
कनाडा में भी सड़कों पर उतरे लोग
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, कनाडा में भी एआई डेटा सेंटरों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. वैंकूवर में सैकड़ों लोग प्रस्तावित एआई डेटा सेंटर परियोजनाओं के खिलाफ रैली में शामिल हुए. प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि आखिर स्थानीय लोगों को क्या फायदा होगा जबकि पर्यावरणीय और ऊर्जा संबंधी दबाव उन्हें झेलना पड़ेगा.
लेखक, कलाकार और क्रिएटर्स भी नाराज
एआई विरोध का एक बड़ा कारण कॉपीराइट का मुद्दा भी है. दुनिया भर के लेखक, कलाकार और कंटेंट क्रिएटर्स आरोप लगा रहे हैं कि एआई कंपनियां उनके काम का इस्तेमाल मॉडल ट्रेनिंग के लिए कर रही हैं.
यह भी पढ़ें: किसने कितनी बार देखी आपकी स्टोरी? इंस्टाग्राम का ये फीचर बताएगा सबकुछ
हाल ही में हजारों लेखकों ने एक प्रतीकात्मक अभियान चलाया जिसमें उन्होंने एआई के विरोध में खाली किताबेें प्रकाशित कीं. उनका कहना है कि अगर एआई इंसानी रचनात्मकता की नकल करेगा तो असली लेखकों और कलाकारों का फ्यूचर खतरे में पड़ जाएगा.
फिल्म, म्यूजिक और मीडिया उद्योग में भी यही बहस तेज हो चुकी है. कई यूनियनें एआई के इस्तेमाल को लेकर नए नियमों की मांग कर रही हैं.
टेक कंपनियों और जनता के बीच बढ़ रही दूरी
दिलचस्प बात यह है कि एआई को लेकर जनता और टेक कंपनियों के बीच दूरी बढ़ती दिख रही है.
टेक कंपनियां एआई को विकास और आर्थिक अवसर का साधन बता रही हैं. लेकिन आम लोगों का एक बड़ा वर्ग इसे नौकरी, गोपनीयता और पर्यावरण के लिए खतरा मान रहा है.
अमेरिका में किए गए सर्वे और रिपोर्ट्स दिखाती हैं कि बड़ी संख्या में लोग अपने आसपास एआई डेटा सेंटर नहीं चाहते.
यह भी पढ़ें: बैटमैन, इंसेप्शन और इंटरस्टेलर बनाने वाले ऑस्कर विनर क्रिस्टोफर नोलन स्मार्टफोन और ईमेल क्यों नहीं यूज करते?
कुछ रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत तक बताया गया है. यही वजह है कि अब एआई सिर्फ तकनीक का विषय नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बन चुका है.
क्या एआई विरोध अब आंदोलन बन रहा है?
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह विरोध अभी शुरुआती चरण में है. लेकिन जिस तरह अलग-अलग देशों में अलग-अलग कारणों से एआई के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं, उससे साफ है कि यह सिर्फ एक लोकल समस्या नहीं है.
कहीं लोग नौकरी को लेकर चिंतित हैं, कहीं पर्यावरण को लेकर, कहीं कॉपीराइट को लेकर और कहीं टेक कंपनियों की बढ़ती ताकत को लेकर.
यह भी दिलचस्प है कि अमेरिका में कुछ नेताओं ने नए एआई डेटा सेंटरों पर अस्थायी रोक लगाने की मांग तक कर दी है. कई राज्यों में डेटा सेंटर निर्माण सीमित करने वाले प्रस्ताव भी सामने आए हैं.
क्या एआई का 'हनीमून पीरियड' खत्म हो रहा है?
पिछले दो सालों में एआई को लगभग बिना सवालों के स्वीकार किया गया. निवेशकों ने अरबों डॉलर लगाए, कंपनियों ने बड़े-बड़े वादे किए और सरकारों ने इसे विकास का इंजन बताया.
लेकिन अब कहानी बदलती दिख रही है. आज बहस सिर्फ इस बात की नहीं है कि एआई क्या कर सकता है. बहस इस बात की भी है कि इसकी कीमत कौन चुकाएगा, इसके फायदे किसे मिलेंगे और इसके नुकसान कौन झेलेगा.