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Fifa World Cup 2026: महंगे टिकट, कड़े नियम और जबरन उगाही... ये वर्ल्ड कप का अमेरिका स्टाइल है!

अमेरिका ने फीफा वर्ल्ड कप को अपने कलेवर में बदल दिया है. एक मैच देखना है तो पहले आपको अमेरिका के नियम, कानून का सामना करना होगा. और अगर फिर नसीब और आपकी जेब अच्छी होगी, तो मैच देखने को मिलेगा. सिर्फ फैन्स ही क्यों, कई खिलाड़ी, टीमें यहां तक कि रेफरी भी अमेरिका के इस स्टाइल को भुगत रहे हैं.

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डोनाल्ड ट्रंप का स्टाइल फुटबॉल फैन्स को भारी पड़ रहा है. (फोटो: AI Generated)
डोनाल्ड ट्रंप का स्टाइल फुटबॉल फैन्स को भारी पड़ रहा है. (फोटो: AI Generated)

जब दुनिया के सबसे बड़े खेल को उस देश में आयोजित करने का फैसला किया गया जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा बॉस मानता है, तो लगा था कि कुछ तो अद्भुत होगा. लेकिन जब स्पोर्ट्स वर्ल्ड में 'ग्लोबालाइजेशन' के सबसे बड़े प्रतीक यानी फुटबॉल वर्ल्ड कप की टक्कर डोनाल्ड ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' वाले राष्ट्रवाद से हुई, तो जो तमाशा निकलकर सामने आया है, उसे इतिहास में 'लॉजिस्टिक्स का महा-डिजास्टर' ही कहा जाएगा. फुटबॉल की दुनिया को अमेरिका में बुला तो लिया गया, लेकिन वहां की नीतियों ने खेल की ऐसी 'खिंचाई' की है कि अब खुद फीफा के अधिकारी भी बैकस्टेज पर सिर पकड़कर बैठे हैं.

यह कोई सामान्य वर्ल्ड कप नहीं है. यह एक ऐसा टूर्नामेंट है जहां फुटबॉल कम और अमेरिकी वीजा नियमों की फाइलें ज्यादा घूम रही हैं. जिस अमेरिका ने पूरी दुनिया को अपने बाजार से प्रभावित किया, आज उसी अमेरिका की नीतियों ने उसके अपने ही घर में आए फुटबॉल के सबसे बड़े उत्सव को एक वीरान मेले में बदल दिया है.

वेलकम टू अमेरिका

डोनाल्ड ट्रंप की जो पॉलिटिक्स नज़र आती है, उसका मूल मंत्र रहा है- दीवारों को ऊंचा करना और सीमाओं को सख्त बनाना. यह बात उनकी रैलियों में तो खूब तालियां बटोरती है, लेकिन जब ग्राउंड पर फुटबॉल वर्ल्ड कप उतरता है, तो यही नीति गले की हड्डी बन जाती है. इंटरनेशनल मीडिया में जो रिपोर्ट्स छप रही हैं, वो बता रही हैं कि अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग इस समय फुटबॉल फैंस और टीमों के साथ ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसे वे किसी मैच में नहीं, बल्कि अमेरिका पर कब्जा करने आ रहे हैं.

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अफ्रीका के बेहतरीन रेफरी उमर आर्टन को अमेरिका में घुसने ही नहीं दिया गया. वजह? शायद उनका पासपोर्ट अमेरिकी अधिकारियों को 'फुटबॉल फ्रेंडली' नहीं लगा. इराक के स्टार स्ट्राइकर अयमन हुसैन को हवाई अड्डे पर घंटों बैठाकर उनके फोन की जांच की गई. ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां यह सुनिश्चित करना चाहती थीं कि उनके फोन में गोल करने की कोई स्ट्रेटेजी तो नहीं छिपी है. हद तो तब हो गई जब ईरान के फुटबॉल महासंघ के पूरे स्टाफ को वीजा देने से ही साफ मना कर दिया गया.

ईरान की टीम को तो बाकायदा यह हिदायत दी गई है कि वे मैच खेलते ही तुरंत बॉर्डर पार करके मेक्सिको के तिजुआना भाग जाएं. वे अमेरिका में ज्यादा देर रुककर वहां की हवा का लुत्फ नहीं उठा सकते. उन्हें लॉस एंजिल्स में अपने अगले मैच से महज 24 घंटे पहले आने की इजाजत मिली है. ईरान के कप्तान मेहदी तरेमी ने जब इस पूरी व्यवस्था को 'डिजास्टर' कहा, तो उन्होंने फुटबॉल फैंस के दिल की बात कह दी. उरुग्वे की टीम सऊदी अरब के खिलाफ मैच से एक दिन पहले तक मेक्सिको में फंसी रही क्योंकि उनके विमान के कागजात अमेरिकी सिस्टम में 'प्रोसेस' नहीं हो पा रहे थे. ट्रंप साहब के राज में फुटबॉल अब पैरों से नहीं, बल्कि वीजा के अप्रूवल से खेला जा रहा है. 

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खाली कमरों का सन्नाटा

जब अमेरिका को वर्ल्ड कप मिला था, तो वहां के होटल मालिकों ने अपनी तिजोरियों के ताले साफ करवा लिए थे. उन्हें लगा था कि पूरी दुनिया से लाखों फैंस आएंगे और उनके कमरों को डॉलर से भर देंगे. लेकिन ट्रंप प्रशासन की इमीग्रेशन नीतियों ने ऐसा जादू किया कि आज होटल इंडस्ट्री सिर पकड़कर रो रही है. हाल ही में आई लिंक्डइन की एक रिपोर्ट का शीर्षक ही सबकुछ बयां कर देता है- ‘World Cup crowds aren’t filling hotel rooms’ (वर्ल्ड कप की भीड़ होटल के कमरों को नहीं भर पा रही है).

इसके पीछे की क्रोनोलॉजी बड़ी दिलचस्प है. पहले तो होटलों ने मांग देखकर अपने दाम 300 फीसदी तक बढ़ा दिए. एक सिम्पल से कमरे का किराया भी 400 डॉलर प्रति रात तक पहुंच गया. लेकिन इमिग्रेशन विभाग ने आधे से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय फैंस के वीजा रिजेक्ट कर दिए. अल्जीरिया, सेनेगल और ट्यूनीशिया जैसे देशों के फैंस के सामने शर्त रख दी गई कि अगर अमेरिका आना है तो पहले 15,000 डॉलर (करीब 12.5 लाख रुपये) का 'सुरक्षा बांड' जमा करो. अब भला कौन सा आम फैन एक मैच देखने के लिए अपनी जमीन गिरवी रखकर 15 लाख का बांड भरेगा?

नतीजा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय फैंस अपने घरों में बैठ गए. अमेरिकन होटल एंड लॉजिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट कहती है कि मेजबान शहरों के 80 फीसदी होटलों में बुकिंग उम्मीद से बेहद कम है. हालत इतनी खराब हो गई कि फीफा को खुद अपने रिजर्व किए गए हजारों रूम ब्लॉक्स आखिरी समय पर कैंसिल करने पड़े क्योंकि कमरे भरने के लिए लोग ही नहीं थे. जो देश दुनिया को 'फ्री मार्केट' का पाठ पढ़ाता था, उसने अपने ही नियमों से अपने होटल उद्योग का मार्केट फ्रीज कर दिया है.

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टिकटों का खेल 

अगर आप सोचते हैं कि वीजा और होटल पार करके आप मैच देख लेंगे, तो आपका सामना फीफा के नए टिकट नियमों से होगा. इस बार अमेरिकी कॉरपोरेट माइंडसेट और फीफा ने मिलकर 'वैरिएबल और डायनेमिक प्राइसिंग' का ऐसा जाल बुना है जिसे आम भाषा में 'लूट' कहा जाता है. जैसे-जैसे मैच की मांग बढ़ती है, टिकट की कीमतें शेयर बाजार की तरह ऊपर भागने लगती हैं.

एसोसिएटेड प्रेस (AP) की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टबहब (StubHub) जैसे रीसेल प्लेटफॉर्म्स और फीफा के अपने सिस्टम के बीच टिकटों को लेकर भारी अव्यवस्था मची हुई है. आम फैंस के लिए टिकट खरीदना किसी दुःस्वप्न जैसा हो गया है. ग्रुप स्टेज के एक साधारण मैच का टिकट जो सामान्यतः 100 डॉलर का होना चाहिए, वह डायनेमिक प्राइसिंग की वजह से 1,200 डॉलर (लगभग एक लाख रुपये) तक बिक रहा है. और अगर आपको न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में फाइनल देखना है, तो न्यूनतम टिकट की कीमत ही 1,490 डॉलर से शुरू होकर 11,000 डॉलर (करीब 9 लाख रुपये) के पार जा रही है.

अमेरिकी सांसदों और कई राज्यों के अटॉर्नी जनरलों ने फीफा पर 'प्राइस गॉजिंग' यानी जबरन वसूली का आरोप लगाया है. ऊपर से फीफा ने कड़ा नियम बना दिया है कि कोई भी फैन अपना टिकट किसी बाहरी प्लेटफॉर्म पर अपनी मर्जी से नहीं बेच सकता. पूरा नियंत्रण फीफा के पास है और वे हर रीसेल पर मोटी कमीशन खा रहे हैं. फुटबॉल को गरीबों का खेल कहा जाता था, लेकिन अमेरिका और फीफा ने मिलकर इसे सिर्फ सिलिकॉन वैली के अरबपतियों और इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स का तमाशा बना दिया है. असली फुटबॉल फैंस जो अपनी टीमों के लिए ड्रम बजाते थे, झंडे लहराते थे, वे अब टीवी स्क्रीन पर खाली सीटों और VIP बॉक्सेस में बैठे सूट-बूट वाले लोगों को देख रहे हैं.

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फुटबॉल का 'अमेरिकनाइजेशन'

अमेरिका की एक और आदत है, वह हर खेल को 'सुपर बाउल' बनाना चाहता है. फुटबॉल का अपना एक पारंपरिक मिजाज है. 45 मिनट का पहला हाफ, 15 मिनट का ब्रेक और फिर 45 मिनट का दूसरा हाफ. खेल खत्म, बात खत्म. लेकिन अमेरिकी आयोजकों को लगा कि इसमें तड़का कम है. इसलिए उन्होंने नियम बदल दिया कि फाइनल मैच में 15 मिनट के बजाय एक लंबा 'हाफटाइम शो' होगा, जिसमें मैडोना, शकीरा और बीटीएस जैसे पॉप स्टार परफॉर्म करेंगे.

इस फैसले ने फुटबॉल जगत में भूचाल ला दिया है. यूरोप के ब्रॉडकास्टर्स (BBC, ITV) और खिलाड़ी संघ चिल्ला रहे हैं कि यह कोई पॉप कॉन्सर्ट नहीं है. 15 मिनट से ज्यादा का ब्रेक खिलाड़ियों की मांसपेशियों को ठंडा कर देगा, जिससे उनके चोटिल होने का खतरा बढ़ जाएगा. लेकिन अमेरिकी बाजार को खिलाड़ियों के घुटनों से ज्यादा विज्ञापनों के स्लॉट की चिंता है. खेल का यह 'अमेरिकनाइजेशन' पारंपरिक फैंस को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है.

भारतीय फैंस का दर्द

अब बात करते हैं इस पूरे तमाशे के भारतीय पक्ष की. भारत में फुटबॉल का क्रेज लगातार बढ़ रहा है. रोनाल्डो और मेस्सी के दीवाने आधी रात को भी जागने को तैयार रहते हैं. लेकिन इस बार टाइमजोन ने ऐसा खेल खेला है कि भारतीय फैंस के लिए यह वर्ल्ड कप किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है.

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जब अमेरिका में शाम के 8 बजते हैं, तो भारत में सुबह के 5:30 या 6:30 बज रहे होते हैं. कुछ मैच तो रात के 3:00 बजे शुरू हो रहे हैं. अब एक आम भारतीय नौकरीपेशा व्यक्ति के सामने यह धर्मसंकट है कि वह रात को उठकर मैच देखे या सुबह ऑफिस जाकर बॉस की डांट सुने. ऊपर से पर्सनल फाइनेंस के नजरिए से देखें तो यदि कोई भारतीय फैन यह सोचता कि चलो अमेरिका जाकर लाइव मैच देख आते हैं, तो बजट सुनकर ही उसकी फुटबॉल खेलने की इच्छा मर जाती.

जिस देश में लोग पाई-पाई जोड़कर म्यूचुअल फंड और एसआईपी (SIP) में निवेश करते हैं ताकि भविष्य में एक फ्लैट या प्लॉट खरीद सकें, वहां अमेरिका के एक मैच का टिकट, वीजा की फीस, 15,000 डॉलर का सिक्योरिटी बांड और महंगे विमान टिकटों का खर्च मिलाकर कुल बजट आसानी से 8 से 10 लाख रुपये पार कर रहा है. इतने पैसों में तो भारत में एक शानदार एसयूवी कार आ जाए या किसी टियर-3 शहर में छोटा सा खेत आ जाए. नतीजा यह है कि भारतीय फैंस ने चुपचाप अपने फोन पर अलार्म लगाना और मैच की केवल हाइलाइट्स देखना ही बेहतर समझा है.

जब दीवारें खेल से बड़ी हो गईं

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को दुनिया से अलग करने के लिए नीतियां बनाई थीं, लेकिन उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं था कि खेल सरहदों और दीवारों को नहीं मानते. जब आप दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल की मेजबानी करते हैं, तो आपको अपना दिल और अपने दरवाजे दोनों बड़े करने होते हैं.

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अमेरिका ने दरवाजे तो बंद रखे, लेकिन खिड़की से फुटबॉल को अंदर खींचने की कोशिश की. नतीजा आज सबके सामने है. खाली पड़े होटल के कमरे, वीजा दफ्तरों के चक्कर काटते खिलाड़ी, आसमान छूती टिकटों की कीमतें और फुटबॉल के नाम पर परोसा जा रहा पॉप म्यूजिक. ट्रंप के राज में अमेरिका ने भले ही खुद को 'महान' बनाने का दावा किया हो, लेकिन उसने फुटबॉल वर्ल्ड कप को एक ऐतिहासिक 'डिजास्टर' जरूर बना दिया है. खेल की आत्मा को बाजार और राष्ट्रवाद की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया है, और पीछे छूट गए हैं सिर्फ खाली स्टेडियम और परेशान फैंस.

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