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वैभव सूर्यवंशी को खुला छोड़ दो... नेचुरल गेम में वह विध्वंसक है

वैभव सूर्यवंशी को रोकने की कोशिश हुई, संभलकर खेलने की सलाह मिली, लेकिन फाइनल में उन्होंने वही किया जिसके लिए पूरी दुनिया उन्हें जानती है. 11 गेंदों में फिफ्टी, 29 गेंदों में 94 रन और श्रीलंका पर ऐसा हमला कि हर रणनीति बेकार साबित हो गई. दांबुला में वैभव ने साबित कर दिया- उनका नेचुरल गेम ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है.

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वैभव सूर्यवंशी.... नेचुरल गेम में वह गेंदबाजों का काल हैं. (Photo: ITG)
वैभव सूर्यवंशी.... नेचुरल गेम में वह गेंदबाजों का काल हैं. (Photo: ITG)

15 साल का एक लड़का. सामने फाइनल का दबाव. दूसरी तरफ मेजबान श्रीलंका... और फिर जो हुआ, वह क्रिकेट कम और तबाही ज्यादा थी. दांबुला में वैभव सूर्यवंशी ने बल्ला नहीं चलाया, हमला बोला. सिर्फ 11 गेंदों में फिफ्टी, 29 गेंदों में 94 रन और पूरे श्रीलंकाई अटैक को ऐसा रौंदा कि गेंदबाजों के पास छिपने की जगह नहीं बची.

पिछले कुछ दिनों से उन्हें समझाया जा रहा था कि वनडे क्रिकेट में थोड़ा संभलकर खेलो, लेकिन वैभव ने ए टीम ट्राई सीरीज फाइनल में दुनिया को बता दिया कि उनकी सबसे बड़ी ताकत सलाह नहीं, उनकी नैसर्गिक आक्रामकता है. छह दिन पहले जिस श्रीलंका से मैदान पर तनातनी हुई थी, उसी श्रीलंका पर उन्होंने बल्ले से ऐसी चढ़ाई की कि पूरा मुकाबला एकतरफा हो गया.

दिलचस्प बात यह है कि यह वही वैभव थे, जो पिछले कुछ हफ्तों से खुद को बदलने की कोशिश कर रहे थे. आईपीएल में अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से दुनिया का ध्यान खींचने के बाद जब वह 50 ओवरों के क्रिकेट में उतरे तो हर तरफ से एक ही सलाह मिल रही थी- वनडे क्रिकेट अलग है, यहां पारी बनानी पड़ती है, यहां जोखिम कम लेना पड़ता है.

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वैभव ने शायद उन सलाहों को गंभीरता से लिया भी. उन्होंने अपने खेल की रफ्तार को नियंत्रित करने की कोशिश की. परिस्थितियों के हिसाब से ढलने का प्रयास किया. लेकिन इसी कोशिश में वह अपने उस अंदाज से दूर होने लगे, जिसने उन्हें 15 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट की सबसे चर्चित प्रतिभाओं में शामिल कर दिया था.

सीरीज के शुरुआती मुकाबलों में कई बार ऐसा लगा कि वैभव अपने स्वाभाविक खेल और टीम की अपेक्षाओं के बीच फंसे हुए हैं. रन बने, लेकिन वह धमाका नहीं दिखा, जिसकी वजह से दुनिया उन्हें जानती है. फिर आया वह विवाद, जिसने कुछ समय के लिए क्रिकेट से ज्यादा सुर्खियां बटोरीं.

श्रीलंकाई खिलाड़ियों की छींटाकशी और उकसावे के बीच वैभव खुद को रोक नहीं पाए. मैदान पर तनाव बढ़ा और मामला आम क्रिकेटी नोकझोंक से आगे निकल गया. 15 साल की उम्र में भावनाएं हावी हो जाना स्वाभाविक है, लेकिन बड़े खिलाड़ी वही होते हैं जो जवाब बहस से नहीं, अपने प्रदर्शन से देते हैं.

फाइनल में उतरते ही ऐसा लगा मानो उन्होंने खुद से एक वादा किया हो- अब कोई समझौता नहीं. अब कोई आधा-अधूरा संस्करण नहीं. अब वही वैभव दिखेगा, जो गेंद देखते ही उसे सीमा रेखा के पार भेजने के बारे में सोचता है. नतीजा इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली पारी के रूप में सामने आया.

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महज 11 गेंदों में अर्धशतक. पांच चौके, पांच छक्के और हैरानी की बात यह कि फिफ्टी तक पहुंचने के दौरान एक भी सिंगल नहीं. वैभव ने अर्धशतक तक का सफर सिर्फ बाउंड्री के दम पर तय किया. ऐसा लगता था मानो वह रन नहीं बना रहे, बल्कि हर गेंद पर बयान दे रहे हों.

श्रीलंका ने उन्हें रोकने के लिए बाउंसर का सहारा भी लिया. युवा बल्लेबाजों को अक्सर छोटी गेंदों से डराने की कोशिश की जाती है. लेकिन उस दिन वैभव के लिए कोई गेंद असहज नहीं थी. कुगाथास मथुलन की एक बाउंसर पर वह झुकने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि गेंद ज्यादा उछली नहीं. बल्ला कंधे के पास सीधा और सपाट था और गेंद बल्ले के बीचों-बीच लगकर विकेटकीपर के ऊपर से चौके के लिए निकल गई. यह कोई इरादतन शॉट नहीं था, लेकिन जब कोई बल्लेबाज इस तरह लय में हो तो ऐसे पल भी उसके पक्ष में चले जाते हैं. वैभव सिर्फ रन नहीं बना रहे थे, मैच पर अपना असर छोड़ रहे थे.

जब वैभव 50 से 70 और 70 से 90 के बीच पहुंचे, तब एक और कहानी आकार लेने लगी. लिस्ट-ए क्रिकेट के सबसे तेज शतक का रिकॉर्ड खतरे में दिखाई देने लगा. रिकॉर्ड 29 गेंदों का था और वैभव उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे थे.

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लेकिन क्रिकेट कभी-कभी सबसे खूबसूरत कहानियों को अधूरा छोड़ देता है. 29 गेंदों पर 94 रन बनाकर वह आउट हो गए. शतक सिर्फ छह रन दूर रह गया. रिकॉर्ड भी हाथ नहीं लगा. लेकिन उस समय तक स्कोरबोर्ड से कहीं बड़ा असर वह मैच पर छोड़ चुके थे. 10 चौके, 8 छक्के और 324.13 का स्ट्राइक रेट. यह आंकड़े किसी वीडियो गेम के लगते हैं, फाइनल की पारी के नहीं.

कई लोग कहेंगे कि अगर वैभव कुछ गेंदें और खेल लेते, थोड़ा रुक जाते, तो शतक भी बन जाता और रिकॉर्ड भी. बात सही है. लेकिन शायद तब वह वैभव सूर्यवंशी नहीं होते. क्योंकि वैभव की सबसे बड़ी खूबी यह नहीं कि वह कितने रन बनाते हैं. उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह मैच की रफ्तार छीन लेते हैं. विपक्षी कप्तान की योजना, गेंदबाज का आत्मविश्वास और फील्डिंग टीम का संतुलन... सब कुछ कुछ ही मिनटों में बदल देते हैं.

दांबुला का फाइनल सिर्फ 94 रन की कहानी नहीं है. यह उस किशोर बल्लेबाज की घोषणा है, जिसने दुनिया को बता दिया है कि उसे किसी सांचे में ढालने की कोशिश मत कीजिए. उसे वनडे, टी20 या किसी और फॉर्मेट के हिसाब से मत बदलिए. क्योंकि जब वैभव सूर्यवंशी अपने असली रूप में बल्लेबाजी करते हैं, तब फॉर्मेट नहीं, सिर्फ गेंदबाज बदलते हैं. और दांबुला में वैभव ने बल्ले से अपना जवाब लिख दिया.
 

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