24 दिन... 10 मैच... और सिर्फ एक जीत. आयरलैंड में टी20 सीरीज 0-2 से हार, इंग्लैंड में टी20 सीरीज 0-4 से शर्मनाक शिकस्त और फिर वनडे सीरीज भी 1-2 से गंवाना. विदेशी धरती पर टीम इंडिया का ऐसा बुरा हाल देखकर 36 साल पुराना वह बयान फिर याद आ गया, जब बिशन सिंह बेदी ने गुस्से में कहा था- 'इस टीम को समंदर में डुबो दो.'
टीम इंडिया की मौजूदा हालत देखकर बिशन सिंह बेदी का वह ऐतिहासिक बयान फिर चर्चा में है. हार से क्षुब्ध बेदी ने गुस्से में कहा था कि भारतीय टीम को वतन लौटते समय 'प्रशांत महासागर में डुबो देना चाहिए.' यह टिप्पणी आज भी भारतीय क्रिकेट के सबसे विवादित बयानों में गिनी जाती है.
1990 और 2026... क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
1990 का न्यूजीलैंड दौरा और 2026 का आयरलैंड-इंग्लैंड दौरा पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं, लेकिन दोनों में एक समानता जरूर दिखती है- लगातार हार और उससे उपजा असंतोष.
तब मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी में भारत न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज 0-1 से हार गया था. इसके बाद रॉथमेंस कप त्रिकोणीय वनडे सीरीज (भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड) में भी भारतीय टीम बुरी तरह लड़खड़ा गई. चार मैचों में सिर्फ एक जीत मिली, वह भी महज एक रन से.
3 मार्च 1990 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत को सिर्फ 188 रन का लक्ष्य मिला था. लेकिन पूरी टीम 169 रनों पर सिमट गई. टीम मैनेजर बिशन सिंह बेदी का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने गुस्से में कहा कि भारतीय टीम को वतन लौटते समय प्रशांत महासागर में डुबो देना चाहिए. उस दौर में यह बयान पूरे क्रिकेट जगत की सुर्खियां बन गया था.
इन दिनों गौतम गंभीर की कोचिंग में भारतीय टीम ने श्रीयस अय्यर की कप्तानी में आयरलैंड के खिलाफ टी20 सीरीज 0-2 से गंवाई. इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ टी20 सीरीज भी 0-4 से हार गई (एक मैच बेनतीजा रहा). फिर शुभमन गिल की कप्तानी में खेली गई वनडे सीरीज भी भारत 1-2 से हार गया. 24 दिनों में 10 मैच और सिर्फ एक जीत का यह रिकॉर्ड भारतीय क्रिकेट के लिए कई असहज सवाल छोड़ गया है.
आज बेदी होते तो क्या कहते?
इस सवाल का सटीक जवाब कोई नहीं दे सकता. लेकिन बिशन सिंह बेदी के स्वभाव और क्रिकेट को लेकर उनके बेबाक नजरिए को देखते हुए इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी नाराजगी सिर्फ हार पर नहीं, बल्कि हार मान लेने वाले रवैये पर होती थी. बेदी हमेशा जज्बे, प्रतिबद्धता और मैदान पर लड़ने की मानसिकता को सबसे ऊपर रखते थे.
अगर टीम के प्रदर्शन में आखिरी दम तक लड़ने का जज्बा दिखता, तो शायद उनकी प्रतिक्रिया भी अलग होती. लेकिन जब लगातार तीन सीरीज में बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग- तीनों विभाग उम्मीदों पर खरे नहीं उतरें और कई मुकाबलों में टीम बिना कड़ा मुकाबला दिए बिखरती नजर आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.
सबसे बड़ी चिंता हार नहीं, हार का तरीका है
आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीम के खिलाफ टी20 सीरीज गंवाना, इंग्लैंड के खिलाफ टी20 में 0-4 से हारना और फिर वनडे सीरीज भी 1-2 से खो देना बताता है कि समस्या सिर्फ खराब फॉर्म की नहीं है.
टीम संयोजन, रणनीति, खिलाड़ियों की भूमिका, मानसिक मजबूती और मैदान पर बॉडी लैंग्वेज- हर स्तर पर भारतीय टीम संघर्ष करती दिखी. कई मुकाबलों में ऐसा लगा कि भारत मैच शुरू होने के कुछ ही समय बाद मुकाबले से बाहर हो गया.
1990 और आज में सबसे बड़ा फर्क
हालांकि दोनों दौर की तुलना पूरी तरह उचित नहीं होगी. 1990 में भारतीय क्रिकेट के पास न आज जैसी सुविधाएं थीं, न इतना बड़ा सपोर्ट स्टाफ, न डेटा एनालिटिक्स और न ही इतनी मजबूत बेंच स्ट्रेंथ. आज भारतीय क्रिकेट दुनिया का सबसे समृद्ध क्रिकेट ढांचा माना जाता है. इसलिए आज अपेक्षाएं भी कहीं ज्यादा हैं और निराशा भी उतनी ही बड़ी.
यह सिर्फ हार नहीं, एक चेतावनी है
इतिहास गवाह है कि भारतीय क्रिकेट कई बार मुश्किल दौर से निकलकर पहले से ज्यादा मजबूत बनकर लौटा है. इसलिए 24 दिनों का यह खराब दौरा किसी युग का अंत नहीं है. लेकिन इसे हल्के में लेना भी बड़ी भूल होगी.
अगर टीम प्रबंधन और चयनकर्ता इन नाकामियों से सबक नहीं लेते, तो यह दौरा सिर्फ एक खराब विदेशी दौरे के रूप में नहीं, बल्कि उस मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जहां चेतावनी तो मिल गई थी, लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया. 36 साल पहले बिशन सिंह बेदी का गुस्सा भारतीय क्रिकेट की पीड़ा का प्रतीक बन गया था. आज उनकी वह टिप्पणी फिर इसलिए याद आ रही है, क्योंकि हार से ज्यादा दर्द उस तरीके ने दिया है, जिससे टीम इंडिया हारती नजर आई.