2023 वनडे विश्व कप फाइनल की हार के बाद रोहित शर्मा के मन में सिर्फ एक अधूरा सपना बचा था- 2027 विश्व कप जीतकर उस टीस को हमेशा के लिए खत्म करना. इसके लिए उन्होंने खुद को पूरी तरह बदल डाला. करीब 11 किलो वजन घटाया, फिटनेस पर घंटों मेहनत की और अपने खेल को फिर से निखारने की कोशिश की... लेकिन क्रिकेट सिर्फ मेहनत का खेल नहीं है. यहां समय, टीम की जरूरत और भविष्य की योजनाएं भी उतनी ही अहम होती हैं.
अगर रिपोर्ट्स सही हैं और बीसीसीआई चयन समिति ने रोहित शर्मा को बता दिया है कि वह 2027 विश्व कप की योजनाओं का हिस्सा नहीं हैं, तो यह फैसला सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के नए दौर का ऐलान है. इस कहानी के तीन बड़े किरदार हैं- मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर, मुख्य कोच गौतम गंभीर और युवा ओपनर यशस्वी जायसवाल.
अगरकर का विजन: 2027 विश्व कप पर पूरी नजर
अजीत अगरकर ने पिछले कुछ समय में ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें आसान नहीं कहा जा सकता. उन्होंने लोकप्रियता की जगह भविष्य को प्राथमिकता दी.
टेस्ट क्रिकेट में रोहित शर्मा और विराट कोहली के युग पर विराम लगाया. 35 साल के मोहम्मद शमी जैसे अनुभवी गेंदबाज की जगह युवा तेज गेंदबाजों पर भरोसा जताया. टीम की कप्तानी में बदलाव किया और लगातार नई पीढ़ी को तैयार करने पर जोर दिया.
इन फैसलों का एक ही मकसद था- 2027 वनडे विश्व कप के लिए ऐसी टीम तैयार करना, जो दक्षिण अफ्रीका जैसी कठिन परिस्थितियों में खिताब जीत सके.
भारत ने 2011 के बाद से वनडे विश्व कप नहीं जीता है. 2023 में टीम फाइनल तक पहुंची, लेकिन ट्रॉफी हाथ से निकल गई. चयनकर्ताओं का मानना है कि अब अगली पीढ़ी को तैयार करने का समय आ गया है.
गौतम गंभीर का मिशन: नाम नहीं, प्रदर्शन
मुख्य कोच बनने के बाद गौतम गंभीर का एजेंडा भी साफ था- 2027 विश्व कप को लक्ष्य बनाकर टीम तैयार करना.
साल की शुरुआत तक रोहित शर्मा के लिए सब कुछ ठीक दिख रहा था. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 73 और 121* रनों की पारियां, दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अर्धशतक- इन पारियों ने उम्मीद जगाई कि वह अभी भी बड़े मंच के खिलाड़ी हैं.
लेकिन इसके बाद आईपीएल में हैमस्ट्रिंग चोट लगी. फिर अफगानिस्तान और इंग्लैंड के खिलाफ लगातार कम स्कोर ने सवाल खड़े कर दिए. 40 की उम्र के करीब पहुंच चुके खिलाड़ी के लिए लगातार उसी स्तर का प्रदर्शन करना आसान नहीं होता। टीम प्रबंधन ने भी यही देखा.
गंभीर के लिए फैसला भावनाओं का नहीं, अगले विश्व कप का था.
यशस्वी जायसवाल: जिसने पूरा समीकरण बदल दिया
रोहित शर्मा के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनकी उम्र नहीं, बल्कि यशस्वी जायसवाल का तेजी से उभरना बना.
जायसवाल ने टेस्ट क्रिकेट में खुद को भारत का सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज साबित किया. इंग्लैंड के खिलाफ 700 से ज्यादा रन, ऑस्ट्रेलिया में शतक और एंडरसन-तेंदुलकर ट्रॉफी में 411 रन...उन्होंने हर बड़े मंच पर अपनी छाप छोड़ी.
वनडे में भी उनके आंकड़े चयनकर्ताओं को नजरअंदाज करने की इजाजत नहीं देते. पिछली तीन पारियों में उन्होंने दो शतक जड़े. इसके बावजूद उन्हें लगातार मौके नहीं मिले. लेकिन चयनकर्ताओं को यह साफ दिखने लगा कि आने वाले दशक में भारत की बल्लेबाजी की कमान उनके हाथों में हो सकती है.
भारतीय क्रिकेट में चयन हमेशा पिछले रिकॉर्ड के आधार पर नहीं होता. सवाल हमेशा यही होता है- अगला विश्व कप कौन जिता सकता है?
भारतीय क्रिकेट में यह पहली बार नहीं हो रहा. एक समय सचिन तेंदुलकर के लंबे करियर के कारण अजिंक्य रहाणे जैसे खिलाड़ियों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा था. आखिरकार टीम आगे बढ़ी. अब वही कहानी रोहित शर्मा के साथ दिखाई दे रही है.
महान खिलाड़ियों का करियर कभी उनके रिकॉर्ड से खत्म नहीं होता, बल्कि तब खत्म होता है जब टीम भविष्य की ओर देखने लगती है.
रोहित हारे नहीं... वक्त जीत गया
रोहित शर्मा ने आखिरी दम तक हार नहीं मान.उन्होंने खुद को बदला, फिटनेस सुधारी, 11 kg वजन घटाया और यह भरोसा बनाए रखा कि 2027 विश्व कप अभी भी उनका हो सकता है. लेकिन भारतीय क्रिकेट ने दूसरी दिशा चुन ली.
अगरकर ने भविष्य का ब्लूप्रिंट तैयार किया, गंभीर ने उस पर अमल शुरू किया और यशस्वी जायसवाल ने अपने प्रदर्शन से उस योजना को मजबूत कर दिया.
अगर लॉर्ड्स का वनडे वास्तव में रोहित शर्मा के करियर का आखिरी वनडे साबित होता है, तो इसकी वजह यह नहीं होगी कि उन्होंने कोशिश कम की. वजह सिर्फ इतनी होगी कि भारतीय क्रिकेट ने अब अतीत की महानता से ज्यादा भविष्य की संभावनाओं पर भरोसा करने का फैसला कर लिया है.
... और शायद यही खेल का सबसे बड़ा सच भी है- महान खिलाड़ी हारकर नहीं जाते, समय उन्हें पीछे छोड़ देता है.