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जो IPL में नहीं चमका, वही बना बुमराह का रिप्लेसमेंट... आखिर क्यों?

जसप्रीत बुमराह के चोटिल होने के बाद आकिब नबी को भारतीय टेस्ट टीम में मौका मिला. आखिर IPL में साधारण प्रदर्शन के बावजूद चयनकर्ताओं ने उन पर भरोसा क्यों जताया? जानिए कैसे रणजी ट्रॉफी और घरेलू लाल गेंद का क्रिकेट आज भी टेस्ट टीम में चयन का सबसे बड़ा आधार है.

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आकिब नबी... रणजी ने दिलाई टीम इंडिया! (Photo, PTI)
आकिब नबी... रणजी ने दिलाई टीम इंडिया! (Photo, PTI)

जसप्रीत बुमराह चोट के कारण श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट सीरीज से बाहर हुए और उनकी जगह आकिब नबी को मौका मिला. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर वही पुरानी बहस फिर छिड़ गई- क्या टेस्ट टीम का चयन आईपीएल के प्रदर्शन पर होना चाहिए? कई लोग टी20 के आंकड़ों के आधार पर चयनकर्ताओं के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन टेस्ट क्रिकेट की अपनी अलग मांग और अलग कसौटी है. अगर भारत को आने वाले वर्षों में टेस्ट क्रिकेट की ताकत बनाए रखनी है, तो टीम का रास्ता आईपीएल से नहीं, रणजी ट्रॉफी और घरेलू लाल गेंद के क्रिकेट से होकर ही गुजरना होगा.

आकिब नबी का चयन कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है. जम्मू-कश्मीर के इस तेज गेंदबाज ने पिछले दो रणजी सीजनों में 104 विकेट लेकर खुद को लगातार साबित किया है. 2025-26 रणजी ट्रॉफी में उन्होंने 60 विकेट लेकर अपनी टीम को पहली बार चैम्पियन बनाने में अहम भूमिका निभाई और प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट भी बने. यही नहीं, श्रीलंका दौरे से पहले उन्होंने इंडिया-ए के लिए भी शानदार प्रदर्शन किया था. यही वजह है कि चयनकर्ताओं ने चार ओवर के प्रदर्शन की बजाय उस गेंदबाज को चुना, जिसने लाल गेंद से बार-बार अपनी उपयोगिता साबित की.

दिल्ली कैपिटल्स के लिए IPL 2026 में आकिब नबी का प्रदर्शन बेहद साधारण रहा. उन्होंने 5 मैचों में कुल 78 गेंदें फेंकी, 149 रन खर्च किए, लेकिन एक भी विकेट नहीं ले सके. इस दौरान उनका इकॉनमी रेट 11.46 रहा. यानी अगर चयन सिर्फ IPL के प्रदर्शन के आधार पर होता, तो शायद आकिब नबी टेस्ट टीम के आसपास भी नहीं होते.

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टेस्ट क्रिकेट और टी20 क्रिकेट दो बिल्कुल अलग खेल हैं. सफेद गेंद कुछ ही ओवरों में अपनी चमक और स्विंग खो देती है, जबकि लाल गेंद लंबे समय तक सीम और स्विंग करती रहती है. टेस्ट में गेंदबाज को सिर्फ 4 ओवर नहीं, बल्कि कई बार 20-25 ओवर तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है. यहां गति से ज्यादा मायने रखती है लाइन-लेंथ, धैर्य, फिटनेस और बल्लेबाज को लंबे समय तक बांधे रखने की क्षमता. यही वजह है कि रणजी ट्रॉफी और दूसरे प्रथम श्रेणी टूर्नामेंट किसी भी टेस्ट गेंदबाज की असली परीक्षा माने जाते हैं.

भारतीय क्रिकेट का इतिहास भी यही बताता है. मोहम्मद शमी, मोहम्मद सिराज, आकाश दीप और प्रसिद्ध कृष्णा जैसे तेज गेंदबाजों ने पहले घरेलू लाल गेंद के क्रिकेट में अपनी पहचान बनाई, फिर टेस्ट टीम का दरवाजा उनके लिए खुला. आईपीएल ने उन्हें लोकप्रियता जरूर दिलाई, लेकिन भारतीय टेस्ट टीम तक पहुंचने की असली सीढ़ी रणजी ट्रॉफी ही रही. यही चयन मॉडल पिछले एक दशक में भारत की टेस्ट सफलता की सबसे बड़ी वजहों में से एक है.

दरअसल, आईपीएल और टेस्ट क्रिकेट की मांग में जमीन-आसमान का फर्क है. टी20 में एक गेंदबाज 4 ओवर में अपनी पूरी ताकत झोंक देता है, जबकि टेस्ट में उसे पूरे दिन एक जैसी लाइन-लेंथ बनाए रखनी होती है. टी20 में बल्लेबाज जोखिम उठाता है, लेकिन टेस्ट में गेंदबाज को धैर्य के साथ बल्लेबाज से गलती करवानी पड़ती है. इसलिए आईपीएल आपको स्टार बना सकता है, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में पहचान लाल गेंद ही दिलाती है. अगर टेस्ट टीम का चयन सिर्फ आईपीएल के चार ओवरों के प्रदर्शन के आधार पर होने लगे, तो भारतीय क्रिकेट की सबसे मजबूत परंपरा ही कमजोर पड़ जाएगी.

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श्रीलंका का दौरा इस बार भारत के लिए आसान नहीं होने वाला. वहां की पिचें मैच बढ़ने के साथ स्पिनरों की मदद जरूर करती हैं, लेकिन नई लाल गेंद से तेज गेंदबाजों को शुरुआती स्विंग और सीम भी मिलती है. पहले सत्र में विकेट निकालना किसी भी टीम के लिए बेहद अहम होता है. अगर शुरुआती सफलता नहीं मिली तो श्रीलंकाई बल्लेबाज लंबी साझेदारियां बनाकर मैच पर पकड़ मजबूत कर सकते हैं. ऐसे में ऐसे तेज गेंदबाज की जरूरत होती है जो लंबे स्पेल फेंक सके, अनुशासन के साथ गेंदबाजी करे और परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढाल सके. यही गुण घरेलू लाल गेंद के क्रिकेट में निखरते हैं, टी20 में नहीं.

आईपीएल का प्रदर्शन चयनकर्ताओं की नजर में जरूर रहता है, लेकिन टेस्ट टीम का फैसला उससे आगे की चीज है. यहां देखा जाता है कि गेंदबाज लंबे स्पेल फेंक सकता है या नहीं, नई और पुरानी गेंद दोनों से असर डाल सकता है या नहीं, और पूरे दिन एक जैसी लाइन-लेंथ बनाए रख सकता है या नहीं. यही वजह है कि घरेलू लाल गेंद का क्रिकेट अब भी सबसे ज्यादा मायने रखता है.

हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जसप्रीत बुमराह की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता. बाएं घुटने की परेशानी के कारण वह श्रीलंका दौरे से बाहर हो गए हैं और उनकी अनुपस्थिति भारत के लिए बड़ा झटका है. लेकिन एक खिलाड़ी की गैरमौजूदगी में चयन के सिद्धांत नहीं बदलते. टीम प्रबंधन ने उसी खिलाड़ी को चुना है जिसने घरेलू क्रिकेट में लगातार खुद को साबित किया है, न कि सिर्फ टी20 की चमक में सुर्खियां बटोरी हैं.

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आकिब नबी का चयन दरअसल एक स्पष्ट संदेश है- भारतीय टेस्ट टीम का दरवाजा आज भी रणजी ट्रॉफी और घरेलू लाल गेंद के क्रिकेट से होकर ही गुजरता है. टेस्ट क्रिकेट में कोई शॉर्टकट नहीं होता. यहां चमक-दमक से ज्यादा कीमत उस मेहनत की होती है, जो लंबे स्पेल, अनुशासित गेंदबाजी और घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छे प्रदर्शन से हासिल होती है. अगर भारत को आने वाले वर्षों में भी टेस्ट क्रिकेट में अपना दबदबा बनाए रखना है, तो चयन का आधार आईपीएल की रोशनी नहीं, लाल गेंद का दम ही होना चाहिए.
 

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