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5 दिन नहीं खाया खाना, फिर भी नहीं डगमगाया निशाना… अस्पताल से निकलकर रचा गोल्डन कारनामा

5 दिन अस्पताल में रहीं, खाना तक नहीं खाया… लेकिन 10 दिन बाद नीरू ढांडा ने एशियन गेम्स में इतिहास रच दिया. भारतीय निशानेबाज ने महिलाओं की ट्रैप स्पर्धा के फाइनल में 30 में से 28 निशाने साधकर गोल्ड जीता. बारिश, ठंड और बीमारी के बीच नीरू का निशाना नहीं डगमगाया.

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नीरू की अस्पताल से गोल्ड तक जंग. (Photo, PTI)
नीरू की अस्पताल से गोल्ड तक जंग. (Photo, PTI)

नीरू ढांडा के लिए एशियन गेम्स का गोल्ड सिर्फ एक मेडल नहीं है. इसके पीछे बीमारी से जूझने, मुश्किल हालात में खुद को संभालने और आखिरी निशाने तक एकाग्र रहने की पूरी कहानी है. हरियाणा के जींद की 26 साल की इस निशानेबाज ने मंगलवार को महिलाओं की ट्रैप स्पर्धा में 28 में से 30 निशाने साधकर गोल्ड जीत लिया.

भारतीय सेना में नायब सूबेदार नीरू ने बारिश से भीगे शूटिंग रेंज और गिरते तापमान के बीच कमाल का संयम दिखाया. फाइनल में चीन की सुन युनोंग ने 26 निशाने साधे, जबकि कुवैत की अब्दुलमलिक हाजर 21 के स्कोर के साथ पीछे रहीं. नीरू ने 28 का स्कोर बनाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया.

... लेकिन इस गोल्ड तक पहुंचने से सिर्फ 10 दिन पहले तक नीरू अस्पताल में थीं.

10 दिन पहले फ्लू हुआ था... भोपाल में थीं भर्ती

भोपाल में एशियन गेम्स से करीब 10 दिन पहले नीरू को तेज फ्लू हुआ था. बीमारी इतनी गंभीर थी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. वह पांच दिन तक खाना तक नहीं खा सकीं. बीमारी को लेकर H1N1 की आशंका भी जताई गई थी.

ऐसे वक्त में एशियन गेम्स में उतरना भी सवाल था और फॉर्म को लेकर भी संशय था... लेकिन नीरू के निजी कोच और पूर्व अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज मंशेर सिंह ने उन्हें बीमारी को पीछे छोड़कर सिर्फ टारगेट पर ध्यान देने को कहा.

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नीरू ने वही किया. उन्होंने जीत के बाद कहा, 'मंशेर सर ने सिर्फ इतना कहा कि जो हुआ उसे भूल जाओ और टारगेट पर ध्यान दो. मैंने वही किया.'

... बारिश और ठंड भी नहीं रोक सकी

मंगलवार को शूटिंग रेंज का मौसम भी आसान नहीं था. लगातार बारिश और खराब विजिबिलिटी ने उड़ते हुए क्ले टारगेट को देखना मुश्किल कर दिया था. तापमान भी नीचे जा रहा था. लेकिन नीरू का निशाना नहीं डगमगाया.

क्वालिफिकेशन के शुरुआती चार राउंड में उन्होंने 100 में 95 निशाने साधे और बढ़त बना ली. पांचवें राउंड में उन्होंने 23 का स्कोर किया. कुल 118 के स्कोर के साथ वह कतर की बासिल रे के बराबर रहीं और आठ निशानेबाजों वाले फाइनल में पहुंच गईं.

इसके बाद शुरू हुआ असली इम्तिहान.

आखिरी पांच निशाने और गोल्ड

फाइनल में जैसे-जैसे मुकाबला आगे बढ़ा, मुश्किल मौसम का असर दूसरे निशानेबाजों पर दिखने लगा. लेकिन नीरू अपनी लय में बनी रहीं.

आखिरी पांच निशानों से पहले उनके पास चीन की सुन युनोंग पर दो अंक की बढ़त थी. इसी दौरान नीरू को येलो कार्ड भी दिखाया गया. कुछ देर के लिए फैसला विवादित रहा और फिर उन्हें इसका लाभ मिला.

वापसी के बाद नीरू ने एक बार फिर अपना फोकस दिखाया. आखिरी पांचों टारगेट पर निशाना सटीक लगा.

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28/30...गोल्ड पक्का

आखिरी टारगेट टूटते ही भारतीय खेमे में जश्न शुरू हो गया. भारत के ब्रिटिश कोच और ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट पीटर विल्सन ने नीरू को तिरंगे में लपेट लिया. नीरू हालांकि बेहद शांत नजर आईं. जैसे उन्हें पता हो कि अभी कहानी पूरी नहीं हुई है.

पहले टीम सिल्वर, फिर व्यक्तिगत गोल्ड

नीरू ने इसी दिन पहले टीम स्पर्धा में भी भारत को सिल्वर दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. नीरू के 118, आशीमा अहलावत के 106 और मनीषा कीर के 104 के स्कोर से भारत का कुल स्कोर 328 रहा.

चीन ने 346 के स्कोर के साथ गोल्ड जीता, जबकि कुवैत को 325 के साथ ब्रॉन्ज मिला.

लेकिन दिन का सबसे बड़ा पल नीरू के लिए व्यक्तिगत फाइनल में आया. वह महिलाओं की ट्रैप स्पर्धा में एशियन गेम्स का व्यक्तिगत मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं और भारत के लिए मौजूदा गेम्स में व्यक्तिगत शूटिंग गोल्ड जीतने वाली पहली निशानेबाज भी बनीं.

2017 में शुरू हुआ सफर

नीरू का शूटिंग सफर 2017 में मध्य प्रदेश शूटिंग अकादमी पहुंचने के बाद तेजी से आगे बढ़ा. उन्हें उनके चचेरे भाई और 2018 एशियन गेम्स में पुरुषों की ट्रैप स्पर्धा के सिल्वर मेडलिस्ट लक्ष्य श्योराण ने इस खेल को अपनाने के लिए प्रेरित किया था.

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इसके बाद नीरू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. हाल ही में उन्होंने इटली के लोनाटो में ISSF वर्ल्ड कप में ट्रैप का गोल्ड जीतकर इतिहास रचा था. वह इस स्पर्धा में ISSF वर्ल्ड कप का व्यक्तिगत गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं.

अब एशियन गेम्स का गोल्ड भी उनके नाम है.

गोल्ड जवानों को समर्पित

नीरू ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत को भारतीय सेना के जवानों को समर्पित किया. उन्होंने कहा कि सीमा पर देश की रक्षा करने वाले जवानों के सामने उनकी उपलब्धि कुछ भी नहीं है.

उन्होंने 1978 के बैंकॉक एशियन गेम्स में भारत को ट्रैप का पहला गोल्ड दिलाने वाले रणधीर सिंह को भी याद किया. नीरू ने बताया कि रणधीर सिंह हमेशा उन्हें गर्मजोशी से मिलते थे और सलाह देते थे. अब नीरू ने उसी विरासत में अपना नाम जोड़ दिया है.

लेकिन नीरू की नजर सिर्फ एशियन गेम्स के गोल्ड पर नहीं रुकी है. उनके लिए यह सफर आगे भी जारी है. उनका अगला बड़ा निशाना ओलंपिक है.

भोपाल के अस्पताल के बेड से लेकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंची नीरू ढांडा ने बता दिया कि कभी-कभी सबसे बड़ा निशाना सामने वाले टारगेट पर नहीं, खुद की मुश्किलों पर साधना पड़ता है.

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