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धरती के नीचे 200 साल से जमा है ऊर्जा, तिब्बत के भूकंप के बाद हिमालय पर कितना बड़ा खतरा?

तिब्बत में 7 मैग्नीट्यूड के भूकंप के बाद 17-18 आफ्टरशॉक दर्ज हुए हैं. हिमालय के नीचे दशकों तक ऊर्जा जमा होती रहती है. क्या यह हलचल उत्तराखंड और देहरादून के लिए भी खतरा बन सकती है? वैज्ञानिक से समझिए पूरी बात.

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एक्टिव भूकंप के क्षेत्र में आने वाले इलाके दिखाते साइंटिस्ट डॉ. नरेश कुमार. (Photo: ITG)
एक्टिव भूकंप के क्षेत्र में आने वाले इलाके दिखाते साइंटिस्ट डॉ. नरेश कुमार. (Photo: ITG)

तिब्बत में 7 मैग्नीट्यूड का शक्तिशाली भूकंप आने के बाद 17-18 आफ्टरशॉक दर्ज किए गए हैं. वहीं, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी 4.0 से ज्यादा तीव्रता के भूकंप आए हैं. भारत के उत्तराखंड में भी सितंबर के आखिरी हफ्ते और अक्टूबर की शुरुआत में कई भूकंप दर्ज किए गए. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या तिब्बत और उत्तराखंड में आने वाले भूकंपों का आपस में कोई संबंध है? क्या हिमालय में बड़े भूकंप का खतरा बढ़ रहा है?

आजतक से खास बातचीत में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. नरेश कुमार ने तिब्बत में आए भूकंप, उसके बाद आए आफ्टरशॉक और हिमालय में बड़े भूकंप की आशंका के बारे में बताया. उन्होंने समझाया कि जमीन के नीचे ऊर्जा कैसे जमा होती है और इसका भूकंप से क्या संबंध है.

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डॉ. नरेश कुमार ने कहा कि भारत और एशिया की टेक्टोनिक प्लेटों के बीच लगातार टकराव होता है. इससे जमीन के नीचे दबाव बनता है और ऊर्जा जमा होती रहती है. यह ऊर्जा 50 से 100 साल या उससे भी ज्यादा समय तक जमा हो सकती है. जब यह ऊर्जा बाहर निकलती है, तो भूकंप आता है.

तिब्बत में भूकंप के बाद क्यों आए 17-18 आफ्टरशॉक?

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डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि तिब्बत में आया 7 मैग्नीट्यूड का भूकंप काफी शक्तिशाली था. इससे कुछ लोगों की जान गई और कई जगहों पर नुकसान हुआ. जब इतना बड़ा भूकंप आता है, तो उसके बाद जमीन के नीचे की चट्टानों में बदलाव होते हैं. इसी वजह से उसी इलाके में छोटे-छोटे भूकंप आते हैं, जिन्हें आफ्टरशॉक कहा जाता है. उन्होंने बताया कि इस भूकंप के बाद अब तक करीब 17-18 आफ्टरशॉक दर्ज किए गए हैं. ये उसी इलाके में आए हैं, जहां मुख्य भूकंप का केंद्र था.

भूकंप के दौरान जमीन के नीचे चट्टानों के टूटने और खिसकने की प्रक्रिया को रूप्चर कहते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, तिब्बत में आए इस भूकंप के दौरान जमीन के नीचे करीब 60-70 किलोमीटर लंबे और 20-25 किलोमीटर चौड़े इलाके में रूप्चर हुआ. यह भूकंप जमीन के नीचे लगभग 18 किलोमीटर की गहराई पर आया था. डॉ. कुमार के मुताबिक, इस इलाके में लंबे समय से जमा दबाव और ऊर्जा भूकंप के दौरान बाहर निकली. इससे जमीन के नीचे मौजूद चट्टानों में बदलाव हुआ.

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हिमालय में क्यों आते हैं भूकंप?

डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि भारत और एशिया की टेक्टोनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे से टकरा रही हैं. इस टकराव से जमीन के नीचे दबाव बनता है. जब यह दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो चट्टानें खिसकने लगती हैं और भूकंप आता है. हिमालय में मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT), मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) और हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट (HFT) जैसी बड़ी फॉल्ट लाइनें मौजूद हैं. ये भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच होने वाली हलचल से जुड़ी हैं. इसी वजह से हिमालय के कई इलाकों में भूकंप आते रहते हैं.

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उन्होंने बताया कि तिब्बत में भी फॉल्ट लाइनें हैं, लेकिन वहां नॉर्मल फॉल्ट पाए जाते हैं. ये हिमालय में मौजूद थ्रस्ट फॉल्ट से अलग होते हैं. इससे पहले जनवरी 2025 में भी तिब्बत में 7.1 मैग्नीट्यूड का भूकंप आया था. उस भूकंप में करीब 300 लोगों की जान गई थी. डॉ. कुमार ने बताया कि भूकंप से कितना नुकसान होगा, यह वहां की आबादी और इमारतों की मजबूती पर भी निर्भर करता है.

उत्तराखंड और तिब्बत के भूकंपों का क्या है कनेक्शन?

डॉ. कुमार के मुताबिक, उत्तराखंड और तिब्बत में होने वाली भूकंपीय गतिविधियों के बीच संबंध है. दोनों इलाके टेक्टोनिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं. उत्तराखंड में हर महीने कम तीव्रता के करीब दो-तीन भूकंप आते हैं. हाल ही में चमोली के पास भूकंप आया था. इसके बाद बड़कोट के पास 4.2 मैग्नीट्यूड का भूकंप दर्ज किया गया. थराली, चमोली और बड़कोट जैसे इलाके भूकंप के लिहाज से संवेदनशील हैं.

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वैज्ञानिक GPS डेटा की मदद से यह पता लगाते हैं कि जमीन में लंबे समय के दौरान किस तरह बदलाव हो रहे हैं. इससे उन्हें समझने में मदद मिलती है कि जमीन के नीचे दबाव कैसे जमा हो रहा है. डॉ. कुमार ने बताया कि किसी फॉल्ट वाले इलाके में ऊर्जा 50-60 साल, 100 साल या 200 साल तक जमा हो सकती है. इसके बाद यह ऊर्जा भूकंप के रूप में बाहर निकल सकती है. हालांकि, छोटे भूकंप आने से यह तय नहीं होता कि उसके बाद बड़ा भूकंप कब आएगा.

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क्या हिमालय में 8 मैग्नीट्यूड का भूकंप आ सकता है?

डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि पिछले करीब 200 साल के रिकॉर्ड में हिमालयी क्षेत्र में कई बड़े भूकंप आए हैं. इनमें चमोली और उत्तरकाशी के भूकंप शामिल हैं. साल 1905 में कांगड़ा में भी बड़ा भूकंप आया था. वहीं, 2015 में नेपाल में 7.8 मैग्नीट्यूड का भूकंप आया था, जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था. उन्होंने बताया कि हिमालय के नीचे करीब 15-20 किलोमीटर की गहराई पर ऐसा क्षेत्र है, जहां दबाव और ऊर्जा जमा होती है. इसी इलाके में बड़े भूकंप आ सकते हैं.

देहरादून की बात करें, तो MBT और HFT पर भूकंप का केंद्र दर्ज नहीं हुआ है. लेकिन अगर चमोली या उत्तरकाशी में 8 या उससे ज्यादा मैग्नीट्यूड का भूकंप आता है, तो उसका असर हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट तक पहुंच सकता है. इससे बड़े इलाके में नुकसान होने की आशंका हो सकती है. 

डॉ. कुमार ने 2015 में नेपाल में आए भूकंप का उदाहरण देते हुए बताया कि उस दौरान जमीन के नीचे करीब 140 किलोमीटर लंबे और 50-60 किलोमीटर चौड़े इलाके में रूप्चर हुआ था. बड़े भूकंप में जमीन के नीचे टूटने और खिसकने वाला क्षेत्र ज्यादा बड़ा हो सकता है. ऐसे में उसका असर भी ज्यादा बड़े इलाके में हो सकता है.

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डॉ. कुमार ने बताया कि वैज्ञानिक हिमालय और तिब्बत में लगातार भूकंपों का अध्ययन कर रहे हैं. जब भी भूकंप आता है, तो वे उसके केंद्र, गहराई, प्रकार, निकली ऊर्जा और उसके बाद आने वाले आफ्टरशॉक की जांच करते हैं. उन्होंने कहा कि भूकंप एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से जमीन के नीचे दबाव और ऊर्जा जमा होती है. जब यह ऊर्जा बाहर निकलती है, तो भूकंप आता है.

हिमालय में लगातार भूकंप आना बताता है कि यह इलाका भूकंपीय रूप से सक्रिय है. यहां भविष्य में भी भूकंप आने की संभावना बनी रहेगी. हालांकि, किसी भूकंप के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अगला बड़ा भूकंप कब और कहां आएगा.

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