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बिना सांस लिए भी जिंदा रह सकता है इंसान, नई खोज से चकरा जाएगा दिमाग

बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों ने इंजेक्टेबल ऑक्सीजन माइक्रोबबल्स विकसित किए हैं, जो फेफड़े फेल होने पर 15-30 मिनट तक खून में सीधे ऑक्सीजन पहुंचाते हैं. डूबने, अस्थमा या सांस में रुकावट जैसी इमरजेंसी में यह तकनीक जीवन बचाएगा. जानवरों पर ट्रायल सफल रहा है.

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इंसान सांस लेकर ही जिंदा रहता है. लेकिन अब ऐसी तकनीक बन चुकी है जो बिना सांस के भी इंसान को कुछ देर तक जिंदा रख सकती है. (Photo: Getty)
इंसान सांस लेकर ही जिंदा रहता है. लेकिन अब ऐसी तकनीक बन चुकी है जो बिना सांस के भी इंसान को कुछ देर तक जिंदा रख सकती है. (Photo: Getty)

क्या इंसान सांस लिए बिना भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है? 

अमेरिका के बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें इंजेक्शन से सीधे खून में ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है. यह तकनीक फेफड़ों के पूरी तरह फेल हो जाने पर 15 से 30 मिनट तक ऑक्सीजन सप्लाई कर सकती है.

यह कोई साइंस फिक्शन नहीं, बल्कि असली रिसर्च है, जो इमरजेंसी मेडिकल साइंस को बदल सकती है. हालांकि, यह स्थाई रूप से सांस के बिना जीने का तरीका नहीं है. 

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यह तकनीक क्या है और कैसे काम करती है?

यह एक स्पेशल लिक्विड फोम या माइक्रोबबल्स है, जिसमें लाखों छोटे-छोटे बुलबुले होते हैं. ये बुलबुले शुद्ध ऑक्सीजन से भरे होते हैं.  बाहर से फैट जैसी लेयर (लिपिड) से लिपटे होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं जैसी होती है.

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इंजेक्शन से जब इसे खून में डाला जाता है, तो ये माइक्रोबबल्स खून की नसों में घूमते हैं. धीरे-धीरे ऑक्सीजन छोड़ते हैं. इससे शरीर की कोशिकाओं को सीधे ऑक्सीजन मिलती है, बिना फेफड़ों के. पुरानी तकनीक में माइक्रोपार्टिकल्स थे, जबकि नई में तेजी से घुलने वाले माइक्रोबबल्स हैं, जो सुरक्षित हैं.

Human Breathing

यह इमरजेंसी में काम आती है, जैसे...

  • डूबने पर
  • अस्थमा अटैक
  • गले में रुकावट
  • गंभीर चोट
  • इससे डॉक्टरों को 15-30 मिनट मिल जाते हैं, जिसमें वे सांस की समस्या ठीक कर सकते हैं.

मुख्य रिसर्च और स्टडीज

यह आइडिया डॉ. जॉन खेयर (John Kheir) और उनकी टीम का है. पहली बड़ी स्टडी 2012 में हुई...

2012 का पेपर: "Oxygen Gas-Filled Microparticles Provide Intravenous Oxygen Delivery" – साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन जर्नल में पब्लिश (Sci Transl Med. 2012 Jun). इसमें लिपिड से बने माइक्रोपार्टिकल्स का इस्तेमाल किया गया. जानवरों पर टेस्ट में यह 15-30 मिनट तक ऑक्सीजन सप्लाई करने में सफल रही.

यह भी पढ़ें: बच्चा पैदा होता है तो पहले सांस लेता है या रोता है... समझिए साइंस

हाल की स्टडीज में सुधार हुआ है...

2024 का पेपर: "Systemically injected oxygen within rapidly dissolving microbubbles improves the outcomes of severe hypoxaemia in swine" – नेचर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग जर्नल में (Nat Biomed Eng. 2024 Nov). इसमें नई तेजी से घुलने वाली माइक्रोबबल्स का इस्तेमाल किया गया. सूअरों पर टेस्ट में यह गंभीर ऑक्सीजन की कमी में जान बचाने और ब्रेन डैमेज कम करने में सफल रही.

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बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल की वेबसाइट (नवंबर 2024) पर भी अपडेट है कि यह तकनीक प्री-क्लिनिकल स्टेज में है और सुरक्षित तरीके से ऑक्सीजन डिलीवर करती है. अभी तक ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल्स की जानकारी नहीं है – यह जानवरों पर टेस्ट की गई है.

क्यों है यह महत्वपूर्ण?

हर साल लाखों लोग सांस की समस्या से मर जाते हैं. यह इंजेक्शन एम्बुलेंस, अस्पताल या युद्धक्षेत्र में जीवन बचा सकता है. स्पेस मिशन्स में भी उपयोगी, जहां ऑक्सीजन की कमी हो. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं – सिर्फ कुछ मिनटों का ब्रिज है. 

चुनौतियां और भविष्य

अभी क्लिनिकल ट्रायल्स नहीं हुए, इसलिए इंसानों पर इस्तेमाल नहीं. साइड इफेक्ट्स का खतरा, जैसे खून की नसों में रुकावट. वैज्ञानिक इसे और सुरक्षित बना रहे हैं. यह तकनीक दिखाती है कि साइंस कैसे जीवन बचाने की नई राहें खोल रही है. लेकिन 'सांस के बिना जीवित रहना' सिर्फ कुछ मिनटों के लिए है, न कि हमेशा. 

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