इस बार लद्दाख में सर्दी का मौसम इतना गर्म रहा कि लोग इसे 'सर्दी की मौत' कह रहे हैं. हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में जहां पहले ठंड इतनी तेज होती थी कि पानी भी जम जाता था, वहां अब तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा. भारत मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, लेह और कारगिल में इस 2025-26 सर्दी का औसत तापमान पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ने वाला रहा.
लेह में पिछले 8 सालों की औसत सर्दी का तापमान -4.3 डिग्री सेल्सियस था, लेकिन इस बार यह बढ़कर -2.3 डिग्री हो गया, यानी करीब 2 डिग्री ज्यादा गर्म. कारगिल में तो और भी ज्यादा फर्क पड़ा – पिछले 14 सालों का औसत -4.9 डिग्री था, जो इस बार -1.4 डिग्री तक पहुंच गया. यानी 3.5 डिग्री ऊपर. ये बदलाव सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि पूरे इलाके की जिंदगी को नया रूप दे रहे हैं.
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असमान बर्फबारी और बदलते संकेत
सर्दी में बर्फबारी का पैटर्न भी बिल्कुल असमान रहा. लेह में पिछले 14 सालों में औसतन 15.3 सेंटीमीटर बर्फ गिरती थी, लेकिन इस बार सिर्फ 4.2 सेंटीमीटर ही पड़ी – यानी 72 प्रतिशत कम. जनवरी में 3.3 सेंटीमीटर और फरवरी में महज 0.9 सेंटीमीटर. वहीं कारगिल में उल्टा हुआ – औसतन 17 सेंटीमीटर की जगह 42.2 सेंटीमीटर बर्फ गिरी, जो सामान्य से 248 प्रतिशत ज्यादा थी.

ज्यादातर बर्फ जनवरी में पड़ी, फरवरी में बहुत कम. लद्दाख ठंडा रेगिस्तान है और बर्फबारी ही यहां की सिंचाई, पीने का पानी, खेती और बागवानी का मुख्य आधार है. एक साल की कमी या ज्यादा को सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं कहा जा सकता, लेकिन बार-बार ऐसा होना बड़े बदलाव का संकेत है.
खेती पर पड़ रहा दबाव और फसलों का शिफ्ट
लद्दाख की खेती अब लय खो रही है. पहले निचले इलाकों में खुबानी, सेब और चेरी उगाई जाती थी, लेकिन अब ये फल ऊंचे इलाकों में शिफ्ट हो रहे हैं. शेम बेल्ट में पहले अच्छी खुबानी होती थी, लेकिन अब कीड़ों का हमला बढ़ गया है. वहीं लेह शहर के आसपास शेय, थिक्से और फ्यांग में अब बेहतर खुबानी मिल रही है. वजह है गर्म सर्दी.
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इन फलों को 0 से 7 डिग्री के बीच 500 से 1500 घंटे की ठंडक चाहिए होती है, जो अब कम हो रही है. नतीजा – फूल देर से खिलते हैं और अचानक ठंड की लहर से 50 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है.
सब्जियों में भी बदलाव आया है – पहले ग्रीनहाउस में उगाई जाने वाली गर्मियों की सब्जियां अब खुले में भी लग रही हैं, लेकिन फूल झड़ने और फल गिरने की समस्या बढ़ गई है. किसान अब हाइब्रिड और जलवायु-रोधी बीजों पर निर्भर हो रहे हैं.

कीड़ों का बढ़ता प्रकोप और पुरानी फसल चक्र में बदलाव
गर्म सर्दी ने कीड़ों को भी नया मौका दे दिया. पहले लद्दाख की तेज ठंड कीड़ों को कंट्रोल में रखती थी, लेकिन अब सर्दी हल्की पड़ने से कीड़े जल्दी निकलते हैं. उनकी संख्या बढ़ जाती है. पहले सिर्फ एफिड्स और कैबेज बटरफ्लाई की शिकायत आती थी, लेकिन अब हर दूसरे दिन किसान नए कीड़ों की रिपोर्ट करते हैं. 2016 में लेह में खुबानी के पत्ते खाने वाले कीड़े का बड़ा हमला हुआ था.
जंगली जीव और नाजुक इकोसिस्टम को खतरा
स्नो लेपर्ड कंजर्वेंसी के डायरेक्टर त्सेवांग नामगैल कहते हैं कि गर्म सर्दी से बर्फीले जानवर जैसे स्नो लेपर्ड और वाइल्ड याक पर असर पड़ रहा है. उनका शरीर तेज ठंड के लिए बना है, थोड़ी गर्मी भी तनाव देती है.
ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ग्लेशियर झीलें बन रही हैं. बाद में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है. ये बाढ़ अल्पाइन मीडोज और घास को बहा ले जाती है, जो जंगली जानवरों का चारा है. पेड़ों की लाइन ऊपर जा रही है, बर्फ की लाइन पीछे हट रही है, जिससे स्नो लेपर्ड का घर छोटा हो रहा है.
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गॉडजिला अल नीनो क्यों हो रही चर्चा?
इसी गर्म सर्दी को देखकर वैज्ञानिक अब गॉडजिला अल नीनो की चर्चा कर रहे हैं. 14 ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल्स की भविष्यवाणी है कि जून-जुलाई-अगस्त और सितंबर-अक्टूबर-नवंबर 2026 में एक बहुत बड़ा अल नीनो बनने वाला है. पूरा प्रशांत महासागर गर्म हो जाएगा, खासकर भूमध्य रेखा पर तापमान 1.5 डिग्री से ज्यादा बढ़ जाएगा. इसे गॉडजिला नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ये बेहद बड़ा और खतरनाक होगा.

इसकी वजह से गर्मी की लहरें तेज होंगी, बारिश अनियमित या बंद हो जाएगी, फसलें प्रभावित होंगी और पानी की कमी बहुत बढ़ जाएगी. लद्दाख जैसी जगहों में जहां पहले से गर्म सर्दी और बर्फ की कमी चल रही है, वहां यह और बुरा असर डालेगा. किसानों के लिए ये खाद्य सुरक्षा का खतरा है – कम फसल, महंगे दाम और सप्लाई में रुकावट.
वैज्ञानिक कहते हैं कि लद्दाख के मौजूदा बदलाव इसी बड़े पैटर्न का शुरुआती संकेत हो सकते हैं. इसलिए गॉडजिला अल नीनो की चर्चा जोरों पर है – ये सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि आने वाले सालों की पूरी जिंदगी और खेती को बदलने वाला घटनाक्रम है.
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ये सब बदलाव बताते हैं कि लद्दाख की सर्दी अब पहले जैसी नहीं रही. किसान हाइब्रिड बीज अपनाकर, समय पर बोआई करके और जलवायु के हिसाब से तैयार होकर खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन 2026 का गॉडजिला अल नीनो अगर आया तो ये चुनौतियां और बढ़ जाएंगी.