ईरान युद्ध ने पहले ही भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ दी है. इस युद्ध में सबसे ज्यादा CO2 घरों, स्कूलों और अन्य इमारतों के नष्ट होने से निकला है. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे इस संघर्ष के पहले दो हफ्तों यानी 28 फरवरी से 14 मार्च 2026 तक युद्ध ने इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकाली हैं कि इससे पूरी दुनिया का कार्बन बजट बहुत तेजी से खत्म हो रहा है.
एक नई रिपोर्ट के अनुसार इन 14 दिनों में युद्ध पक्षों ने लगभग 56 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में छोड़ दी हैं. अगर यही दर पूरे एक साल तक जारी रही तो यह उत्सर्जन दुनिया के 84 सबसे कम प्रदूषण फैलाने वाले देशों के पूरे साल के कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर हो जाएगा.
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इतना ही नहीं, ये आंकड़े आइसलैंड के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन से भी ज्यादा हैं क्योंकि 2024 में आइसलैंड ने कुल 47 लाख टन CO2 निकाला था. यह विश्लेषण क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट नामक संस्था द्वारा किया गया है और 21 मार्च को प्रकाशित किया गया है.

14 दिनों में CO2 का सबसे बड़ा सोर्स गिरने वाली इमारतें
शोधकर्ताओं ने बताया कि युद्ध के पहले 14 दिनों में सबसे बड़ा स्रोत इमारतों का गिरना रहा है. ईरान के रेड क्रिसेंट सोसाइटी के आंकड़ों के अनुसार नीचे दी गई इमारतें नष्ट हो चुकी हैं.
इन इमारतों के मलबे हटाने और युद्ध के बाद इन्हें दोबारा बनाने में लगभग 27 लाख टन CO2 निकलेगा जो मालदीव देश के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन के बराबर है. रिसर्चर पैट्रिक बिगर ने कहा कि हर मिसाइल हमला हमारी धरती को और गर्म और अस्थिर बनाता है. इससे कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं होता.
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दूसरा सबसे बड़ा स्रोत ऑयल स्टोरेज फैसिलटी, रिफाइनरियों और तेल टैंकरों पर हुए हमले रहे हैं. शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार इस दौरान में 25 लाख से 59 लाख बैरल तेल जल गया जिससे 21 लाख टन CO2 और अन्य ग्रीनहाउस गैसें फैलीं. यह माल्टा देश के सालभर के CO2 उत्सर्जन के लगभग बराबर है.

फाइटर जेट, जहाज के ईंधन भी फैला रहे प्रदूषण
लड़ाई के दौरान विमानों, जहाजों और सहायता कार्यों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन रहा. अमेरिका और इजरायल ने इन 14 दिनों में ईरान में 6000 से ज्यादा टारगेट पर हमले किए जो लगभग 2500 तीन घंटे के फ्लाइट के बराबर है. इन सबमें कुल 15 करोड़ से 27 करोड़ लीटर ईंधन लगा जिससे करीब 5.83 लाख टन CO2 निकली. यह मात्रा ग्रीनलैंड के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन के बराबर बताई गई है.
नष्ट हुए विमानों, जहाजों और मिसाइल लॉन्चरों को दोबारा बनाने से होने वाला उत्सर्जन है. इस दौरान अमेरिका ने तीन F-15 फाइटर जेट और एक KC-135 रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट खोया जबकि ईरान ने 28 विमान, 21 जहाज और करीब 300 मिसाइल लॉन्चर गंवाए. इन सभी को नया बनाने में करीब 1.90 लाख टन CO2 निकलेगा जो टोंगा देश के सालभर के उत्सर्जन के बराबर है.
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मिसाइलों और ड्रोनों का निर्माण भी इसी में शामिल है. अमेरिका और इजरायल ने 9000 मिसाइलें दागीं जबकि ईरान ने 1000 मिसाइलें और 2000 ड्रोन लॉन्च किए. इन हथियारों को दोबारा बनाने में करीब 61,000 टन CO2 निकलेगा जो एक छोटे सीमेंट प्लांट के सालभर के उत्सर्जन के बराबर है.

जंग पहुंचा चौथे हफ्ते में, अब भी प्रदूषण जारी है
अब युद्ध अपने चौथे हफ्ते में पहुंच चुका है इसलिए वास्तविक उत्सर्जन इस रिपोर्ट से कहीं ज्यादा हो चुका है. रिसर्च करने वाले फ्रेड ओतु-लारबी ने चेतावनी दी है कि ऑयल फैसिलिटी पर हमलों की तेज रफ्तार के कारण उत्सर्जन और भी तेजी से बढ़ रहा है. युद्ध के सही जलवायु लागत को कोई नहीं जानता.
युद्ध के बाद के प्रभाव लड़ाई से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं क्योंकि ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक करने से तेल और खाद की कमी पैदा हो गई है. इससे कई देश एनर्जी सिक्योरिटी के लिए और ज्यादा तेल निकालने लगेंगे जिससे नई ड्रिलिंग, नए LNG टर्मिनल और नई फॉसिल ईंधन सुविधाएं बनेंगी. इनसे भी कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगा.
पैट्रिक बिगर ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से हर अमेरिकी ऊर्जा संकट के बाद नई ड्रिलिंग और नई फॉसिल ईंधन इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हुआ है. इस युद्ध के कारण अगली पीढ़ी भी कार्बन पर निर्भर हो सकती है. हमें ऐसे युद्धों का खर्चा समझना चाहिए क्योंकि हर मिसाइल हमला हमारी पृथ्वी को और गर्म और अस्थिर बना रहा है. रिपोर्टः अनन्या सिंह