मजबूत अल-नीनो के बीच इस साल भारत में मॉनसून कमजोर रहा. जून से सितंबर के बीच देश में सामान्य से 12.6 फीसदी कम बारिश हुई. इस दौरान 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 868.6 मिलीमीटर होती है. इसके साथ ही 2026 का मॉनसून 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर मॉनसून रहा. कम बारिश का असर खेती और पानी पर पड़ा है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में हालात ज्यादा खराब हैं. अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक यहां करीब 80 फीसदी फसलें खराब हो गई हैं और कई जलाशयों में सिर्फ करीब 12 फीसदी पानी बचा है.
इस बार मॉनसून की कहानी सिर्फ कम बारिश की नहीं है. बारिश कब और कहां हुई, इसका भी बड़ा असर पड़ा. जून में बारिश काफी कम हुई. इस दौरान कम दबाव वाले मौसम सिस्टम भी कम बने. इससे कई इलाकों में मॉनसून को ज्यादा ताकत नहीं मिल सकी. बाद में बंगाल की खाड़ी में कुछ कम दबाव वाले सिस्टम बने, जिससे कई जगह बारिश हुई. ओडिशा इसका बड़ा उदाहरण रहा. यहां इन सिस्टम की वजह से रिकॉर्ड बारिश हुई. यानी अल-नीनो के असर के बावजूद देश के हर हिस्से में बारिश की स्थिति एक जैसी नहीं रही.
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जून में ही कमजोर रही बारिश
इस साल मॉनसून की शुरुआत कमजोर रही. जून में देश में सामान्य से करीब 35 फीसदी कम बारिश हुई. कई राज्यों में बारिश काफी कम रही. इसका एक कारण बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले सिस्टम की कमी भी रहा. कम दबाव वाले सिस्टम मॉनसून के लिए काफी जरूरी होते हैं. ये समुद्र से नमी लेकर देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचाते हैं. जब ऐसे सिस्टम कम बनते हैं तो कई इलाकों में बारिश भी कम हो जाती है. जून में यही देखने को मिला.

जुलाई में बारिश की स्थिति कुछ बेहतर हुई. इस महीने देश में सामान्य से करीब 1 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. इससे मॉनसून की शुरुआती कमी कुछ कम हुई. लेकिन अगस्त और सितंबर में फिर बारिश कम रही. इसका असर पूरे मॉनसून सीजन के आंकड़े पर पड़ा.
जून से सितंबर के बीच देश में कुल 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई. सामान्य बारिश 868.6 मिलीमीटर मानी जाती है. यानी करीब 109 मिलीमीटर बारिश कम हुई. इसी वजह से 2026 का मॉनसून 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर मॉनसून रहा.
कम दबाव वाले सिस्टम से कई जगह मिली राहत
अल-नीनो के कारण इस साल मॉनसून कमजोर रहने की आशंका पहले से थी. लेकिन मौसम के दौरान बने कम दबाव वाले सिस्टम ने कुछ इलाकों में बारिश की कमी को कम किया. बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव वाले सिस्टम पूर्वी और मध्य भारत की तरफ बढ़ते हैं. इनसे कई राज्यों में अच्छी बारिश होती है. इस साल भी ऐसे सिस्टम बनने के बाद कुछ इलाकों में बारिश बढ़ी.
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ओडिशा इस मामले में सबसे बड़ा अपवाद रहा. बंगाल की खाड़ी में कई कम दबाव वाले सिस्टम बनने से ओडिशा में अच्छी बारिश हुई. यहां कई जगह रिकॉर्ड बारिश दर्ज की गई. इससे राज्य में अल-नीनो का असर दूसरे इलाकों के मुकाबले कम दिखाई दिया. इससे यह भी साफ हुआ कि अल-नीनो के बावजूद पूरे देश में बारिश एक जैसी नहीं रही. कुछ जगह कम बारिश हुई तो कुछ राज्यों में मौसम सिस्टम की वजह से ज्यादा बारिश भी हुई.

बारिश की कमी का खेती पर असर
मॉनसून के चार महीनों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से कम रही. कुछ इलाकों में लगातार बारिश की कमी बनी रही. इसका सीधा असर खरीफ की फसलों पर पड़ा. जहां समय पर बारिश नहीं हुई, वहां खेतों में नमी कम हो गई. सोयाबीन, कपास, अरहर और दूसरी फसलों की बढ़त पर असर पड़ा. लंबे समय तक बारिश नहीं होने से कई जगह फसलें सूखने लगीं. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है. यहां लंबे समय से कम बारिश के कारण खेतों में खड़ी फसलों को भारी नुकसान हुआ है.
महाराष्ट्र में सूखे की बड़ी मार
मराठवाड़ा के लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव जैसे जिलों में हालात काफी खराब हैं. इन इलाकों में जून से सितंबर के बीच सामान्य 679.5 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी. लेकिन इस दौरान सिर्फ 424.5 मिलीमीटर बारिश हुई. कम बारिश का सीधा असर खेतों पर पड़ा. कई जगह सोयाबीन पीली पड़ गई. कपास की बढ़त रुक गई और अरहर सूखने लगी. गन्ने की फसल को भी नुकसान हुआ.
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इन इलाकों में करीब 80 फीसदी फसलें खराब हो चुकी हैं. किसानों ने फसल उगाने के लिए बीज, खाद, मजदूरी और दूसरी चीजों पर पैसा लगाया था. अब फसल खराब होने के बाद उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खत्म हो गया है. मुश्किल यह भी है कि खराब फसल को खेत से हटाने में भी पैसा लगेगा. यानी जिस फसल से कमाई की उम्मीद थी, उसे हटाने के लिए भी किसानों को खर्च करना पड़ रहा है.
फसल पर खर्च, अब हटाने का भी खर्च
लातूर के सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे, उन्होंने आठ एकड़ में सोयाबीन, अरहर और ज्वार की फसल लगाई थी. इस पर करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए. अब फसल खराब हो गई है. खेत को दोबारा तैयार करने के लिए सूखी फसल हटानी होगी. इसके लिए करीब पांच हजार रुपये प्रति एकड़ तक खर्च आने की बात सामने आई है. गन्ने की फसल भी कई जगह सूख रही है. सामान्य तौर पर 20 से 25 फुट तक बढ़ने वाला गन्ना इस बार कई खेतों में सिर्फ 10 से 12 फुट तक ही पहुंच पाया. इसके बाद फसल सूखने लगी.

जलाशयों में भी घटा पानी
कम बारिश का असर सिर्फ फसलों पर नहीं पड़ा. जलाशयों और दूसरे पानी के स्रोतों में भी पानी कम हो गया. लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसतन करीब 12.5 फीसदी पानी ही बचा है. पानी का स्तर कम होने से खेती के साथ पीने के पानी और पशुओं के लिए पानी की चिंता भी बढ़ गई है. अगर आगे भी अच्छी बारिश नहीं होती है तो किसानों के सामने अगली फसल के लिए पानी की समस्या और बढ़ सकती है. इसके साथ ही बीज, खाद और सिंचाई के लिए दोबारा पैसा जुटाना भी मुश्किल होगा.
265 तालुकों में सूखा घोषित
महाराष्ट्र में हालात को देखते हुए राज्य सरकार ने 26 सितंबर को 358 में से 265 तालुकों में सूखा घोषित किया. यानी राज्य के करीब 74 फीसदी तालुकों को सूखे की स्थिति में रखा गया है. इन इलाकों में फसल के नुकसान का आकलन किया जा रहा है. इसके साथ ही पानी और चारे की जरूरत को पूरा करने के लिए राहत के कदम उठाए जा रहे हैं. किसानों और स्थानीय लोगों ने मौजूदा हालात की तुलना 1972 के बड़े सूखे से की है. मराठवाड़ा में इस बार सूखे की स्थिति काफी गंभीर है.
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किसानों के सामने अब अगली फसल की चिंता
कमजोर मॉनसून का असर अब सिर्फ खरीफ की फसल तक नहीं है. जिन किसानों की फसल खराब हो गई है, उनके सामने अगली फसल की तैयारी की चुनौती भी है. उन्हें फिर से बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई पर पैसा लगाना होगा. लेकिन मौजूदा फसल से कमाई नहीं हुई है. ऐसे में अगली खेती के लिए पैसा जुटाना आसान नहीं होगा.
इस पूरे मॉनसून सीजन में अल-नीनो का असर, जून में कम बारिश, कम दबाव वाले सिस्टम की कमी और बारिश का असमान बंटवारा बड़ी वजहें रहीं. ओडिशा में कम दबाव वाले सिस्टम ने अच्छी बारिश कराई, लेकिन महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में कम बारिश लंबे सूखे में बदल गई. यहां अब फसल के साथ पानी और अगली खेती का संकट भी किसानों के सामने है. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति