Mahabharat Facts: जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और धर्म कमजोर पड़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर संतुलन स्थापित करते हैं. उनके ही आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने अर्जुन के सारथी बनकर उसे उसके कर्तव्य का ज्ञान कराया और पांडवों का साथ देकर अधर्मी कौरवों का अंत करवाया.
लेकिन महाभारत के कई प्रसंग ऐसे भी हैं, जहां श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए सीधे रास्ते के बजाय नीति, छल और चतुराई का सहारा लिया. पहली नजर में ये बातें अजीब लग सकती हैं, क्योंकि शास्त्रों में छल और झूठ को गलत बताया गया है, लेकिन उस समय परिस्थितियां ऐसी थीं कि धर्म की स्थापना के लिए यह जरूरी हो गया था.
दुर्योधन और गांधारी की कथा
कौरवों की माता गांधारी को एक वरदान प्राप्त था कि वे जिस पर अपनी दृष्टि डालेंगी, उसका शरीर वज्र के समान कठोर हो जाएगा. जब युद्ध के अंत में दुर्योधन अकेला बचा, तो गांधारी ने उसे नग्न अवस्था में अपने सामने आने को कहा, ताकि वह अजेय बन सके.
रास्ते में श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को समझाया कि इस तरह मां के सामने जाना उचित नहीं है. दुर्योधन ने उनकी बात मान ली और कमर के नीचे वस्त्र पहन लिया. जब गांधारी ने उसे देखा, तो उसका पूरा शरीर तो मजबूत हो गया, लेकिन जांघें कमजोर रह गईं. बाद में भीम ने गदा युद्ध में उसी जगह वार करके दुर्योधन का वध किया.
कर्ण वध का प्रसंग
महाभारत के युद्ध में कर्ण एक महान योद्धा थे और अर्जुन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी भी. युद्ध के दौरान जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया, तो वे निहत्थे हो गए. नियम के अनुसार उस समय उन पर हमला नहीं करना चाहिए था.
लेकिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि कौरवों ने पहले ही नियमों का उल्लंघन कर अभिमन्यु की हत्या की थी. उन्होंने अर्जुन से कहा कि अब धर्म की रक्षा के लिए निर्णय लेना जरूरी है. तब अर्जुन ने कर्ण पर बाण चलाकर उसका वध किया.
जयद्रथ वध और सुदर्शन चक्र
अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली थी कि वे अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारेंगे. कौरवों ने जयद्रथ को छिपा दिया और समय निकालने की कोशिश की. तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से सूर्य को ढक दिया, जिससे ऐसा लगा कि सूर्यास्त हो गया है. कौरव सेना खुश हो गई और जयद्रथ बाहर आ गया. उसी समय श्रीकृष्ण ने चक्र हटा दिया और अर्जुन ने तुरंत जयद्रथ का वध कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली.
युधिष्ठिर से असत्य कहलवाना
गुरु द्रोणाचार्य को हराना पांडवों के लिए बहुत कठिन था. श्रीकृष्ण ने उनकी कमजोरी, उनके पुत्र अश्वत्थामा, का उपयोग करने की योजना बनाई. युद्ध में अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मार दिया गया. फिर भीम ने घोषणा की अश्वत्थामा मारा गया. द्रोणाचार्य ने सच्चाई जानने के लिए युधिष्ठिर से पूछा, जो कभी झूठ नहीं बोलते थे. युधिष्ठिर ने कहा कि, 'अश्वत्थामा मारा गया', और धीरे से जोड़ा हाथी. द्रोणाचार्य ने सिर्फ पहली बात सुनी और शोक में अपने हथियार डाल दिए, जिसके बाद उनका वध कर दिया गया.