scorecardresearch
 

Hindu Dharam: आज भी अनसुलझे हैं माता वैष्णो देवी से जुड़े ये रहस्य, जिन्हें जानकर उड़ जाएंगे होश!

Hindu Dharam: जम्मू-कश्मीर के त्रिकुटा पर्वत पर स्थित माता वैष्णो देवी का मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता की उत्पत्ति कैसे हुई और पंडित श्रीधर से जुड़ी इस पवित्र गुफा का क्या इतिहास है? जानिए इससे जुड़े सभी अनसुने रहस्य.

Advertisement
X
मां वैष्णो देवी का दरबार (Photo: x.com/ @Jayalko1)
मां वैष्णो देवी का दरबार (Photo: x.com/ @Jayalko1)

Hindu Dharam: आपने माता वैष्णो देवी के मंदिर के दर्शन तो किए ही होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता वैष्णो देवी की उत्पत्ति कैसे हुई और त्रिकुटा पर्वत पर स्थित उनके प्रसिद्ध मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है? आखिर माता वैष्णो देवी को तीन पिंडियों के रूप में क्यों पूजा जाता है और भैरवनाथ के दर्शन के बिना माता की यात्रा अधूरी क्यों मानी जाती है? आइए जानते हैं माता वैष्णो देवी से जुड़ी इस प्रसिद्ध पौराणिक कथा के बारे में.

तीन शक्तियों का स्वरूप हैं माता वैष्णो देवी

मान्यता है कि माता वैष्णो देवी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की सम्मिलित शक्ति का स्वरूप हैं. जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित माता वैष्णो देवी के भवन में एक पवित्र गुफा है, जहां तीन प्राकृतिक पिंडियों के रूप में देवी की पूजा की जाती है. इन तीन पिंडियों को महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है. इन्हीं तीनों शक्तियों के संयुक्त स्वरूप को माता वैष्णो देवी कहा जाता है. माता के इस पवित्र धाम से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इनमें पंडित श्रीधर और भैरवनाथ की कथा सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है.

पंडित श्रीधर के भंडारे में पहुंची थीं माता

मान्यता के अनुसार, पंडित श्रीधर जम्मू क्षेत्र में कटरा के पास हंसली गांव में रहते थे. वे बेहद धार्मिक और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे अक्सर दुखी रहते थे.

Advertisement

एक बार पंडित श्रीधर ने गांव के लोगों के लिए भंडारे का आयोजन करने का फैसला किया. गांव के लोगों ने भी उनकी मदद की, लेकिन जितनी सामग्री जुटी थी, उससे इतने लोगों का भोजन कराना मुश्किल लग रहा था. भंडारे से एक रात पहले पंडित श्रीधर इसी चिंता में पूरी रात सो नहीं पाए. अगले दिन उन्होंने स्नान किया और अपनी कुटिया में पूजा-अर्चना करने लगे. धीरे-धीरे गांव के लोग भंडारे में पहुंचने लगे. पंडित श्रीधर अभी भी परेशान थे कि इतने लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था कैसे होगी.

तभी वहां एक बेहद सुंदर और तेजस्वी कन्या दिखाई दी. उसका नाम वैष्णवी बताया जाता है. उसने भंडारे की सारी व्यवस्था संभाल ली और देखते ही देखते सभी लोगों को भोजन करा दिया. भंडारा पूरी तरह संपन्न हो गया. गांव के लोग उस कन्या की प्रशंसा करने लगे, लेकिन भंडारा खत्म होने के बाद वह कन्या अचानक वहां से गायब हो गई.

सपने में मिला गुफा का संकेत

कहा जाता है कि एक दिन वही कन्या पंडित श्रीधर के सपने में आई. उसने उन्हें एक पवित्र गुफा के बारे में बताया. साथ ही पंडित श्रीधर को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी दिया था. इसके बाद पंडित श्रीधर समझ गए कि भंडारे में आई वह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थी, बल्कि स्वयं माता वैष्णो देवी थीं. मान्यता है कि इसके बाद पंडित श्रीधर ने उस पवित्र गुफा की खोज की. तभी से इस स्थान से माता वैष्णो देवी की भक्ति और दर्शन की परंपरा आगे बढ़ती गई.

Advertisement

भैरवनाथ ने किया था माता का पीछा

अब बात करते हैं माता वैष्णो देवी और भैरवनाथ से जुड़ी प्रसिद्ध कथा की.मान्यता है कि पंडित श्रीधर द्वारा आयोजित भंडारे में गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्य भैरवनाथ भी पहुंचे थे. जब बालिका वैष्णवी ने भैरवनाथ को भोजन परोसा तो उन्होंने मांसाहारी भोजन की मांग की. वैष्णवी ने विनम्रता से कहा कि यह एक ब्राह्मण के घर का भंडारा है, इसलिए यहां केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन ही उपलब्ध है. लेकिन भैरवनाथ अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने वैष्णवी को पकड़ने का प्रयास किया. तब वैष्णवी वहां से निकलकर त्रिकुटा पर्वत की ओर चली गईं. भैरवनाथ भी उनके पीछे-पीछे त्रिकुटा पर्वत तक पहुंच गए.

माता ने उत्पन्न की बाणगंगा

मान्यता के अनुसार, त्रिकुटा पर्वत की यात्रा के दौरान माता वैष्णो देवी की रक्षा के लिए हनुमान जी भी उनके साथ थे. रास्ते में हनुमान जी को प्यास लगी. तब माता ने अपने धनुष से धरती पर बाण चलाया, जिससे एक जलधारा प्रकट हुई. कहा जाता है कि माता ने इसी जलधारा में अपने केश धोए थे. इसी वजह से इस स्थान को बाणगंगा कहा जाता है. श्रद्धालुओं में मान्यता है कि बाणगंगा में स्नान करने से मनुष्य के पाप दूर होते हैं और यात्रा की पवित्रता बढ़ती है.

Advertisement

अर्धकुंवारी गुफा में माता ने की तपस्या

इसके बाद माता वैष्णो देवी एक गुफा में चली गईं और वहां तपस्या करने लगीं. मान्यता है कि हनुमान जी ने इस दौरान गुफा के बाहर रहकर उनकी रक्षा की. भैरवनाथ पीछा करते हुए यहां भी पहुंच गए. इसी दौरान एक साधु ने उन्हें समझाया कि जिस कन्या का वे पीछा कर रहे हैं, वह कोई साधारण बालिका नहीं बल्कि स्वयं देवी का स्वरूप हैं. लेकिन भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. कहा जाता है कि माता वैष्णो देवी गुफा से एक दूसरे मार्ग से बाहर निकलीं. इसी स्थान को अर्धकुंवारी या अर्धकुमारी कहा जाता है.

माता ने लिया देवी का स्वरूप

गुफा से बाहर निकलने के बाद माता वैष्णो देवी ने अपना दिव्य स्वरूप धारण किया और भैरवनाथ को वहां से चले जाने के लिए कहा. लेकिन भैरवनाथ ने उनका पीछा करना नहीं छोड़ा. इसके बाद माता फिर गुफा के भीतर चली गईं. मान्यता है कि इसी दौरान हनुमान जी और भैरवनाथ के बीच युद्ध हुआ. जब यह युद्ध लंबा खिंचने लगा, तब माता वैष्णो देवी ने स्वयं बाहर आकर भैरवनाथ का वध कर दिया. कहा जाता है कि भैरवनाथ का सिर जिस स्थान पर जाकर गिरा, वह स्थान आज भैरव घाटी के नाम से जाना जाता है. इसी क्षेत्र में भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है.

Advertisement

माता ने भैरवनाथ को दिया वरदान

भैरवनाथ को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने माता वैष्णो देवी से क्षमा मांगी. मान्यता है कि माता ने भैरवनाथ को क्षमा करते हुए उन्हें वरदान दिया कि जो भक्त माता के दर्शन करने आएगा, उसकी यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक वह भैरवनाथ के दर्शन नहीं कर लेता. इसी मान्यता के कारण आज भी माता वैष्णो देवी के भवन में दर्शन करने के बाद श्रद्धालु भैरवनाथ मंदिर की ओर जाते हैं.

इस तरह माता वैष्णो देवी की यात्रा केवल एक मंदिर के दर्शन तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि इससे जुड़ी बाणगंगा, अर्धकुंवारी, भवन और भैरव घाटी जैसे कई पवित्र पड़ावों से होकर गुजरती है. यही वजह है कि माता वैष्णो देवी की यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक विश्वास से जुड़ी एक विशेष तीर्थयात्रा मानी जाती है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement