Sharad Purnima Vrat Katha 2026: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का खास महत्व है. पंचांग के अनुसार, यह पर्व आश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इसे कोजागरी पूर्णिमा, शरद पूनम और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं. चांदनी को अमृत के समान माना जाता है, इसलिए शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा है. शरद पूर्णिमा पर चंद्र देव की पूजा करने के साथ व्रत रखने का भी विधान है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने और व्रत रखने से चंद्र देव की कृपा प्राप्त होती है. वहीं, इस पर्व पर व्रत कथा पढ़ना या सुनना भी शुभ माना जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा से जुड़ी पौराणिक व्रत कथा.
शरद पूर्णिमा व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक धनी व्यापारी रहता था. उसकी दो बेटियां थीं. दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, लेकिन उनके व्रत करने के तरीके में अंतर था. बड़ी बेटी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत करती थी. वह चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन ग्रहण करती थी. वहीं, छोटी बेटी व्रत के नियमों का ठीक से पालन नहीं करती थी और बीच में ही उपवास तोड़ देती थी.
समय बीतने के साथ दोनों बहनों का विवाह हो गया. कुछ समय बाद बड़ी बेटी के घर संतान का जन्म हुआ. उसके बच्चे स्वस्थ रहे और परिवार में खुशियां छा गईं. दूसरी ओर, छोटी बेटी को संतान सुख नहीं मिल पा रहा था. उसके यहां जब भी बच्चे का जन्म होता, कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो जाती थी. बार-बार ऐसी घटना होने से छोटी बेटी बेहद दुखी रहने लगी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है.
संत की सलाह पर रखा पूर्णिमा का व्रत
अपनी परेशानी का कारण जानने और उसका समाधान पाने के लिए एक दिन छोटी बहन एक संत के पास गई. उसने उन्हें अपने जीवन में बार-बार आ रहे दुखों के बारे में बताया. उसकी बात सुनकर संत ने कहा कि वह पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा से नहीं करती थी और व्रत के नियमों का भी सही ढंग से पालन नहीं करती थी. संत ने उसे सलाह दी कि वह सच्चे मन से उपवास रखे और चंद्र देव की विधि-विधान से पूजा करे.
बच्चे की मृत्यु से फिर टूटा दुखों का पहाड़
संत की सलाह मानकर छोटी बहन ने अगली शरद पूर्णिमा पर पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखा और चंद्र देव की पूजा-अर्चना की. कुछ समय बाद उसके घर एक बच्चे का जन्म हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से नवजात की मृत्यु हो गई. इस घटना से वह पूरी तरह टूट गई. इसी बीच उसे अपनी बड़ी बहन का ख्याल आया, जिसके बच्चों को वह चंद्र देव की कृपा से स्वस्थ और सुरक्षित मानती थी. इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन से मदद लेने का विचार किया.
बड़ी बहन के स्पर्श से जीवित हुआ बच्चा
पौराणिक कथा के अनुसार, छोटी बहन ने एक उपाय सोचा. उसने अपने मृत बच्चे को कपड़े से ढककर पलंग पर लिटा दिया और बड़ी बहन को अपने घर बुलाया. जब बड़ी बहन वहां पहुंची और पलंग पर बैठने लगी, तो अनजाने में उसके कपड़ों का स्पर्श बच्चे से हो गया. तभी बच्चा रोने लगा. उसकी आवाज सुनकर बड़ी बहन चौंक गई. उसने छोटी बहन से पूछा कि उसने बच्चे को इस तरह पलंग पर क्यों लिटाया है.
चंद्र देव की कृपा से लौटी बच्चे की सांसें
छोटी बहन ने बड़ी बहन को पूरी बात बताई. उसने कहा कि बच्चे की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी, लेकिन उसके स्पर्श से उसमें दोबारा जीवन लौट आया. छोटी बहन ने इस घटना को चंद्र देव की कृपा और पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से जोड़कर देखा. उसे विश्वास हो गया कि सच्ची श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है.