किताब के पन्नों के चारों तरफ खाली जगह आपने भी देखी होगी, लेकिन क्या कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? स्कूल की किताब हो, मैगजीन हो या फिर कोई मोटी-सी नॉलेज की किताब, उसके पन्नों पर लिखे शब्द आमतौर पर किनारों तक नहीं जाते. चारों तरफ थोड़ी जगह खाली छोड़ी जाती है. पहली नजर में यह जगह बेकार लग सकती है. कई बार तो मन में यह सवाल भी आता है कि जब इस जगह पर कुछ और लिखा जा सकता है, तो इसे खाली क्यों छोड़ दिया जाता है? इसका जवाब सिर्फ पढ़ने में आसानी से जुड़ा नहीं है.
किताबों के पन्नों पर खाली जगह छोड़ने की परंपरा पुराने जमाने की लिखावट, पढ़ने वालों की आदतों और किताबों को तैयार करने के तरीके से भी है. दिलचस्प बात यह है कि आज की छपी हुई किताबों में भी सदियों पुरानी यह परंपरा दिखाई देती है.
दिलचस्प बात यह है कि पुराने समय में किताब के किनारे सिर्फ खाली जगह नहीं हुआ करते थे. वहां लोग अपनी बातें लिखते थे, मुश्किल शब्दों के मतलब समझाते थे और कभी-कभी ऐसे चित्र भी बनाते थे, जिन्हें देखकर आज भी हैरानी होती है. यानी किताब पढ़ने वाले लोग सिर्फ लेखक की बातें नहीं पढ़ते थे, बल्कि पन्नों के किनारे अपनी कहानी भी छोड़ जाते थे.
जब किताब के किनारे बन जाते थे पाठक की अपनी डायरी
आज किसी किताब में कोई बात पसंद आ जाए, तो हम उसे मोबाइल में नोट कर लेते हैं या पेंसिल से अंडरलाइन कर देते हैं. लेकिन पुराने समय में लोगों के पास न मोबाइल था और न डिजिटल नोट्स बनाने की सुविधा. तब किताब के किनारे ही उनके लिए नोटबुक की तरह काम करते थे. यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के सेंटर फॉर रेनेसां एंड रिफॉर्मेशन स्टडीज की वेबसाइट पर मौजूद मनुस्क्रिप्ट और प्रिंट बुक (Manuscript and Print Book) प्रदर्शनी में किताबों के किनारों पर लिखी टिप्पणियों की परंपरा के बारे में जानकारी दी गई है. पुराने समय में रीडर इन जगहों पर मुश्किल शब्दों का अर्थ लिखते थे, किसी जरूरी लाइन को समझाते थे या पढ़ते समय मन में आए सवाल दर्ज कर देते थे.
ऐसे नोट्स और टिप्पणियों को अंग्रेजी में मार्जिनलिया (Marginalia) कहा जाता है. इनसे आज इतिहासकारों को यह समझने में भी मदद मिलती है कि सदियों पहले लोग किताबों को कैसे पढ़ते थे और उनमें लिखी बातों को किस तरह समझते थे. सोचिए, आज आपके हाथ में कोई सैकड़ों साल पुरानी किताब आए और उसके किनारे किसी अनजान पाठक की लिखी टिप्पणी मिल जाए. वह टिप्पणी आपको उस दौर के किसी ऐसे व्यक्ति की सोच से जोड़ सकती है, जिसके बारे में आप कुछ नहीं जानते.
किताबों में उंगली के चित्र क्यों बनाए जाते थे?
पुरानी किताबों के किनारों पर सिर्फ शब्द ही नहीं मिलते, बल्कि कई बार हाथ से बनी उंगली जैसी आकृतियां भी दिखाई देती हैं. इन आकृतियों में उंगली किसी खास लाइन या वाक्य की तरफ इशारा करती है. इन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे कोई पाठक हमें बता रहा हो कि किताब का यह हिस्सा जरूर पढ़ना चाहिए. ऐसी आकृतियों को मेनिक्युल्स (Manicules) कहा जाता है. पुराने समय में इनका इस्तेमाल किसी खास जानकारी पर ध्यान दिलाने के लिए किया जाता था.
आज हम जरूरी जानकारी के आगे स्टार लगा देते हैं, हाईलाइटर से लाइन रंग देते हैं या मोबाइल में स्क्रीनशॉट ले लेते हैं. उस दौर में हाथ से बनाई गई ऐसी आकृतियां भी कुछ इसी तरह काम आती थीं. फर्क सिर्फ इतना था कि उस समय यह काम कागज पर हाथ से किया जाता था. यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो की प्रदर्शनी में किताबों के किनारों पर मिलने वाली ऐसी टिप्पणियों और निशानों को पुरानी किताबों की पढ़ने की परंपरा से जोड़कर समझाया गया है.
जब हाथ से बनती थीं किताबें, तो खाली जगह छोड़ना क्यों जरूरी था?
आज किताब तैयार करने के लिए कंप्यूटर पर लिखावट का आकार, पन्ने की लंबाई और किनारों की जगह तय की जा सकती है. लेकिन पुराने समय में किताबें तैयार करना काफी मेहनत का काम था. पन्नों पर लिखावट हाथ से की जाती थी और हर प्रति तैयार करने में समय लगता था. ऐसे में किताब के पन्ने पर सिर्फ शब्द लिखना ही जरूरी नहीं था. यह भी ध्यान रखना पड़ता था कि लिखावट कहां से शुरू होगी, कहां खत्म होगी और पन्ने के किनारे कितनी जगह छोड़ी जाएगी.
पुरानी हैंड रिटन किताबों में मार्जिन पाठकों की टिप्पणियों और चित्रों के लिए भी काम आते थे. बाद में जब यूरोप में छपाई का चलन बढ़ा, तब भी हस्तलिखित किताबों की कई परंपराओं का असर शुरुआती छपी किताबों पर दिखाई दिया. आज की किताबों में दिखाई देने वाली खाली जगह को केवल आधुनिक डिजाइन का हिस्सा समझना सही नहीं होगा. इसका रिश्ता किताबों के पुराने रूप और उन्हें पढ़ने के तरीकों से भी है.
क्या चूहे भी किताबों के खाली मार्जिन की कहानी से जुड़े हैं?
किताबों के मार्जिन के बारे में एक दिलचस्प सवाल यह भी है कि क्या पुराने समय में कागज को चूहों से बचाने के लिए किनारे खाली छोड़े जाते थे? पुराने डॉक्यूमेंट्स को चूहों से नुकसान पहुंचने के उदाहरण जरूर मिलते हैं. लीडेन यूनिवर्सिटी के डिजिटल संग्रह में ह्यूगो ग्रोटियस से जुड़ी एक ऐतिहासिक पांडुलिपि के पन्नों पर चूहों से हुए नुकसान का जिक्र है. उसके निचले किनारों पर कुतरने के निशान दिखाई देते हैं.
इससे पता चलता है कि पुराने समय में पांडुलिपियों को चूहों से नुकसान पहुंचता था. लेकिन कहानी का दिलचस्प हिस्सा यह है कि किसी दस्तावेज के किनारे कुतरे हुए मिलने से यह साबित नहीं होता कि मार्जिन की शुरुआत चूहों या दीमकों से बचने के लिए हुई थी. लीडेन यूनिवर्सिटी का यह उदाहरण नुकसान के निशानों के बारे में जानकारी देता है, मार्जिन शुरू करने की वजह के बारे में नहीं.
आज भी किताबों में खाली जगह क्यों रखी जाती है?
अब सवाल आता है कि जब आज किताबें मशीनों और कंप्यूटर की मदद से तैयार होती हैं, तो मार्जिन की जरूरत क्यों बनी हुई है? इसका जवाब काफी आसान है. अगर पन्ने पर लिखावट बिल्कुल किनारे तक पहुंच जाए, तो पन्ना भरा हुआ और पढ़ने में असुविधाजनक लग सकता है. इसके अलावा, किताब की बाइंडिंग के पास भी जगह रखना जरूरी होता है. अगर लिखावट बिल्कुल अंदर तक पहुंच जाए, तो किताब खोलकर पढ़ते समय कुछ शब्द बाइंडिंग के पास छिप सकते हैं.
छपाई के बाद पन्नों को सही आकार में काटने के दौरान भी किनारों पर पर्याप्त जगह की जरूरत पड़ सकती है. किताब के प्रकार के हिसाब से मार्जिन का आकार बदल सकता है. कुछ किताबों में नोट्स लिखने के लिए ज्यादा जगह रखी जाती है, जबकि दूसरी किताबों में डिजाइन और पन्नों की जरूरत के मुताबिक इसे तय किया जाता है.
खाली जगह की अपनी कहानी भी होती है
किताबों के पन्नों पर छोड़ी गई खाली जगह पहली नजर में भले ही मामूली लगे, लेकिन इसका इतिहास काफी दिलचस्प है. पुराने समय में यही जगह पाठकों के नोट्स, सवालों, टिप्पणियों और हाथ से बनाए गए चित्रों को संभालती थी. आज भी मार्जिन किताब के डिजाइन और उसे पढ़ने के अनुभव का अहम हिस्सा है. अगली बार जब आप कोई पुरानी किताब खोलें, तो सिर्फ उसके शब्दों पर ही नहीं, किनारों पर भी नजर डालिएगा. हो सकता है वहां कोई पुराना नोट, हाथ से बनाया गया निशान या ऐसी टिप्पणी मिल जाए, जो आपको किताब के लेखक के अलावा उसके किसी पुराने पाठक की सोच से भी रूबरू करा दे.