शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ आकाश में चमकता है. ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावना और संवेदनाओं का कारक माना गया है. वहीं, कामना और आकर्षण का संबंध शुक्र व मंगल जैसे ग्रहों से भी जोड़ा जाता है. ऐसे में शरद पूर्णिमा की चांदनी के बीच भगवान श्रीकृष्ण द्वारा महारास रचाने की कथा एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है. महारास में प्रेम था. आकर्षण था और समर्पण था. लेकिन सांसारिक अर्थों में कामना या भोग की भावना नहीं थी. श्रीकृष्ण की यह लीला बताती है कि सच्चा प्रेम शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से जुड़ा होता है.
चंद्रमा की पूर्णता और मन की भावनाएं
ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है. शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ दिखाई देता है. इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है. इस दिन चंद्रमा की उजली चांदनी प्रकृति को एक अलग ही सौंदर्य प्रदान करती है. ऐसी मान्यताओं के बीच यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि मन और भावनाओं का प्रतीक चंद्रमा पूर्णता पर हो तो श्रीकृष्ण ने इसी रात महारास क्यों रचाया?
इसका आध्यात्मिक उत्तर श्रीकृष्ण की लीला के भाव में छिपा है. मन में उत्पन्न होने वाला आकर्षण यदि केवल शारीरिक सुख और स्वार्थ तक सीमित रहे तो वह कामना बन जाता है. लेकिन जब प्रेम में अहंकार समाप्त हो जाए, अपना सुख गौण हो जाए और प्रिय के प्रति पूर्ण समर्पण हो, तब वही प्रेम भक्ति का रूप ले लेता है.
जब कृष्ण के आगे बेबस हुए कामदेव
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित रासलीला को कृष्ण भक्ति परंपरा में दिव्य प्रेम का प्रतीक माना गया है. कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कामदेव को चुनौती दी थी कि वे शरद पूर्णिमा की रात अपनी समस्त शक्तियों के साथ आएं और गोपियों के साथ महारास रचा रहे कृष्ण का मन विचलित करके दिखाएं. लेकिन कामदेव ने इसके लिए एक शर्त रखी. उन्होंने कृष्ण से कहा कि अश्विन महीने की पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण को वृंदावन के सुंदर जंगलों में आना होगा. उनके साथ ऐसी गोपियां होनी चाहिए, जो स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुंदर हों. कृष्ण ने यह चुनौती स्वीकार कर ली.
शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर वृंदावन की गोपियां उनकी ओर खिंची चली आईं. कृष्ण ने अपे हजारों रूप धरकर गोपियों के साथ महारास रचाया. लेकिन क्षण भर भी उनके मन पर वासना हावी नहीं हुई. कामदेवता ने कृष्ण का ध्यान भटकाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वह कृष्ण के भीतर वासना का भाव पैदा नहीं कर पाया.
इस तरह महारास में श्रीकृष्ण ने यह संदेश दिया कि प्रेम का सर्वोच्च स्वरूप अधिकार जताने में नहीं, बल्कि स्वयं को समर्पित करने में है. गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग भक्ति की पराकाष्ठा के रूप में देखा जाता है. यहां प्रेम में पाने की लालसा से अधिक अपने आराध्य के प्रति पूर्ण निष्ठा का भाव है. इसलिए महारास को केवल नृत्य या लौकिक प्रेम की घटना मानना उसके आध्यात्मिक अर्थ को सीमित करना होगा.
कामना से ऊपर उठकर भक्ति का संदेश
इस दृष्टि से शरद पूर्णिमा का महारास केवल चंद्रमा की सुंदरता और कृष्ण की बांसुरी का प्रसंग नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को कामना से प्रेम और प्रेम से भक्ति की ओर ले जाने वाला आध्यात्मिक संदेश है. यही महारास की विशेषता है, प्रेम की पूर्णता है. इसमें स्वार्थ नहीं, समर्पण है. अधिकार नहीं, अनुराग है और भोग नहीं, भक्ति है.