पितृपक्ष चल रहा है. यह समय पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय माना जाता है. इन दिनों पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है. मान्यता है कि जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करना चाहिए. अगर मृत्यु तिथि की जानकारी न हो तो अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है. आमतौर पर आपने देखा होगा कि ज्यादातर लोग दोपहर के समय ही श्राद्ध करते हैं. क्या आप जानते हैं कि पितरों का श्राद्ध दोपहर के वक्त करना क्यों श्रेष्ठ होता है.
क्यों दोपहर को किया जाता है श्राद्ध?
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, अलग-अलग समय को अलग-अलग कार्यों से जोड़ा गया है. सुबह और शाम का समय देव कार्यों के लिए उत्तम माना गया है. जबकि घोर अंधकार को आसुरी और नकारात्मक शक्तियों की सक्रियता से जोड़ा जाता है. वहीं दोपहर का समय पितरों को समर्पित माना गया है. इसलिए पितृपक्ष में लोग इसी पहर में श्राद्धकर्म करना उत्तम मानते हैं.
इसके अलावा, शास्त्रों में पितृ लोक को मृत्युलोक और देवलोक के बीच तथा चंद्रमा के ऊपर स्थित बताया गया है. दिन का मध्य समय पितरों को समर्पित होने के कारण ही उन्हें इस पहर में भोजन अर्पित किया जाता है.
सूर्य की किरणों से भोजन ग्रहण
श्राद्ध भोज दोपहर में कराने के पीछे एक अन्य लोक मान्यता भी प्रचलित है. कहते हैं कि सूर्य देव पूर्व दिशा से उदित होते हैं और दोपहर तक आकाश के मध्य में पहुंच जाते हैं. पृथ्वी लोक पर पितृ सूर्य की किरणों के माध्यम से श्राद्ध में अर्पित भोजन ग्रहण करते हैं. इसी वजह से दोपहर के समय को श्राद्ध के लिए उपयुक्त माना जाता है.
पितृपक्ष में श्राद्ध करने की सही विधि क्या है?
पितृपक्ष में तिथिनुसार श्राद्ध वाले दिन घर की दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त पूजा करें. तिल मिले जल से तर्पण दें. पिंडदान करें और कुश के आसन पर बैठकर पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराएं. इस दौरान गाय, कौवा, कुत्ता और चींटी के लिए भी अलग से भोजन निकालकर रखें, जिसे पंचबलि कहा जाता है. भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग न करें. भोजन के बाद वस्त्र और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें. अंत में पितरों से हुई किसी भूल के लिए क्षमा मांगें और शाम को दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाएं.