तीर्थराज प्रयागराज केवल संगम और प्राचीन शिव मंदिरों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है. यह नागों के राजा वासुकी नाग के मंदिर के लिए भी जाना जाता है. गंगा तट पर दारागंज क्षेत्र में स्थित इस मंदिर में पूरे वर्ष श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. जबकि सावन, नाग पंचमी, माघ मेला और कुंभ के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं. धार्मिक मान्यता है कि यहां श्रद्धा से पूजा करने से कालसर्प दोष और जीवन की अनेक बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती है.
समुद्र मंथन के बाद वासुकी नाग की हालात
पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया था, तब नागराज वासुकी को मंदराचल पर्वत पर रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया. ऐसी मान्यता है कि लंबे समय तक मंथन होने से नागराज वासुकी घायल और बुरी तरह लहूलुहान हो गए थे. तब भगवान विष्णु ने उन्हें प्रयागराज आकर विश्राम करने का आदेश दिया था. कहा जाता है कि त्रिवेणी संगम की पवित्र भूमि पर विश्राम करने से उनके घाव भर गए और पीड़ा से मुक्ति मिली. इसके बाद देवताओं के आग्रह पर वासुकी यहीं पर विराजमान हो गए. तभी से इस स्थान को नाग वासुकी मंदिर के नाम से जाना जाता है.
मान्यता है कि नागराज वासुकी ने यहां निवास करने से पहले शर्त रखी थी कि संगम स्नान के बाद श्रद्धालु उनके दर्शन अवश्य करेंगे. तभी यह तीर्थयात्रा पूर्ण मानी जाएगी. यही कारण है कि आज भी प्रयागराज आने वाले लाखों श्रद्धालु संगम स्नान के बाद नाग वासुकी मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं. यहां भगवान की मूर्ति नहीं, बल्कि नागराज वासुकी की प्रतिमा है जिसमें फन फैलाए भगवान के रूप में नाग वासुकी विराजमान हैं.
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, वो यहां विशेष पूजा-अर्चना और अभिषेक करने आते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि नाग वासुकी भगवान की कृपा से जीवन की तमाम बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है. यह धार्मिक आस्था और परंपरा पर आधारित मान्यता है.
प्रयागराज का नाग वासुकी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और पौराणिक परंपराओं का अद्भुत संगम है. संगम स्नान के बाद नागराज वासुकी के दर्शन की परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है. विशेष रूप से सावन, नाग पंचमी, माघ मेला और कुंभ के दौरान यह मंदिर भक्ति और श्रद्धा से सराबोर दिखाई देता है. बिना यहां आए श्रद्धालुओं की यात्रा अधूरी मानी जाती है.