करवा चौथ का त्योहार आने वाला है. इस साल करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर दिन गुरुवार को रखा जाएगा. इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. कथा सुनती हैं. और फिर रात को चांद देखकर ही व्रत खोलती हैं. करवा चौथ के इतिहास को महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है. कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इस व्रत के बारे में बताया था. कृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने यह व्रत किया और उनके दांपत्य जीवन का संकट दूर हुआ. आइए महाभारत का यह किस्सा आपको विस्तार से बताते हैं.
एक बार अर्जुन देवताओं का प्रसन्न करने और शक्तिशाली शस्त्रों को प्राप्त करने के लिए पर्वत पर तपस्या करने लगे. अर्जुन की कठोर तपस्या देख द्रौपदी चिंतित हो गईं. अर्जुन की अनुपस्थिति में द्रौपदी खुद को परेशानियों से घिरा महसूस करने लगीं. तब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया. उन्हें अपनी समस्या बताई और उनसे समाधान पूछा. तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्क चतुर्थी यानी करवा चौथ व्रत की कथा सुनाई. श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि इस व्रत को पति की सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की खुशहाली की कामना से किया जाता है.
श्रीकृष्ण ने बताया करवा चौथ का महत्व
द्रौपदी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें करवा चौथ व्रत के महत्व के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि एक बार माता पार्वती ने भी भगवान शिव से ऐसा ही सवाल किया था. तब शिवजी ने उन्हें कर्क चतुर्थी व्रत रखने के बारे में बताया. मान्यता के अनुसार, यह व्रत वैवाहिक जीवन की बाधाओं को दूर करने और पति के कल्याण की कामना से किया जाता है. इससे स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है. तब द्रौपदी ने कृष्ण की बात मानकर करवा चौथ का व्रत किया. द्रौपदी ने पूर्ण विधि विधान से यह व्रत किया था. उन्होंने करवा माता और भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा की. भगवान श्रीकृष्ण से व्रत की कथा सुनी और संध्याकाल में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया.
करवा चौथ की पूजा में किन बातों का रखें ध्यान?
करवा चौथ के दिन सुबह स्नान करके पूजा की जगह को साफ करें. सरगी खाने के बाद भगवान का स्मरण करें और निर्जला व्रत का संकल्प लें. शाम को मिट्टी की वेदी बनाकर देवी-देवताओं की स्थापना करें. इसके बाद करवे रखकर धूप, दीप, रोली, चंदन और सिंदूर से पूजा करें. चांद निकलने से पहले व्रत कथा सुनें या पढ़ें. चंद्रोदय के बाद छलनी से चंद्रमा के दर्शन करें और उन्हें अर्घ्य दें. इसके बाद व्रत खोलें. फिर बहू अपनी सास को मिठाई, फल, मेवे और रुपये भेंट करती है और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है.
कुछ परंपराओं में पूजा के बाद सुहाग की सामग्री भेंट करने का विधान भी है. इसमें सिंदूर, चूड़ियां, शीशा, कंघी, रिबन और रुपए जैसी वस्तुएं रखी जाती हैं. महिलाएं अपनी सास या किसी बड़ी सुहागिन स्त्री के पैर छूकर उन्हें भेंट देती हैं. पूजा की सामग्री और विधि परिवार तथा क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.