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Garud Puran: मृत्यु के बाद शव को क्यों बांधा जाता है? जानें अंतिम यात्रा का रहस्य

Garud Puran: हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जिनमें शव को अर्थी पर बांधना भी शामिल है. क्या यह केवल एक व्यावहारिक जरूरत है या इसके पीछे कोई धार्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ भी छिपा है? आइए जानते हैं गरुड़ पुराण और शास्त्रों के अनुसार इसकी असली वजह.

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गरुड़ पुराण (Photo: ITG)
गरुड़ पुराण (Photo: ITG)

Garud Puran: जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके शरीर को स्नान कराया जाता है, नए या साफ वस्त्र पहनाए जाते हैं और फिर उसे अर्थी पर रखा जाता है. इसके बाद शव को सुरक्षित रूप से बांधकर चार या उससे अधिक लोग कंधा देते हुए श्मशान की ओर ले जाते हैं. लेकिन कभी आपने खुद से यह सवाल किया है कि आखिर मृत शरीर को बांधा क्यों जाता है? क्या यह सिर्फ इसलिए होता है कि शव अर्थी से नीचे न गिरे? या फिर इस परंपरा के पीछे कोई धार्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ भी जुड़ा हुआ है?

आखिर शव को बांधने की परंपरा का वास्तविक कारण क्या है?

- पहला कारण

मृत्यु के बाद शरीर की मांसपेशियों और जोड़ों में वह सक्रिय नियंत्रण नहीं रहता जो जीवित व्यक्ति में होता है. इसलिए शव को अर्थी पर रखते समय उसे स्थिर रखना जरूरी होता है. अर्थी को उठाकर जब कई लोग चलते हैं तो रास्ते में शरीर के हिलने या अपनी स्थिति बदलने की संभावना हो सकती है. इसलिए कई परंपराओं में शव को अर्थी से सुरक्षित रूप से बांधा जाता है.

यानी शव को बांधने का एक प्रमुख कारण पूरी तरह व्यावहारिक है, अंतिम यात्रा के दौरान शरीर को सुरक्षित और स्थिर रखना.

लेकिन क्या इसका कोई आध्यात्मिक अर्थ भी है? यहीं से इस परंपरा का दूसरा पहलू सामने आता है.

हिंदू धर्म में शरीर को नश्वर माना गया है, जबकि आत्मा को शरीर से अलग और निरंतर यात्रा करने वाला तत्व माना जाता है. इसी विचार के कारण अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया को शरीर के साथ मोह से धीरे-धीरे अलग होने के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है. शव को अर्थी पर बांधना इसी व्यापक अंतिम संस्कार परंपरा का एक प्रतीकात्मक हिस्सा माना जा सकता है.

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इसका अर्थ यह नहीं है कि रस्सी आत्मा को बांधती है. किसी भौतिक रस्सी से आत्मा को बांधने की बात को शास्त्रीय तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता है. दरअसल. बंधन शरीर का है, आत्मा का नहीं, यह बात हिंदू दर्शन में शरीर और आत्मा के बीच किए जाने वाले अंतर से जुड़ी दार्शनिक व्याख्या है.

क्या शव बांधने से आत्मा की गति रुकती है?

नहीं, ऐसा नहीं है. यह धारणा है कि शव को बांधने से आत्मा शरीर में फंस जाती है या उसकी आगे की गति रुक जाती है, इसे प्रमाणित शास्त्रीय नियम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है. अंतिम संस्कार का उद्देश्य ही मृत शरीर को सम्मानपूर्वक उसके अंतिम संस्कार तक पहुंचाना और फिर उसे निर्धारित विधि से पंचतत्वों में विलीन करना है.

धार्मिक परंपराओं में मृत्यु को शरीर और आत्मा के संबंध के अंत या परिवर्तन के रूप में अलग-अलग तरह से समझाया गया है. हिंदू मृत्यु संस्कारों में मृतक के लिए किए जाने वाले कर्मों के साथ जीवित परिवार के शोक और स्वीकार की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण मानी जाती है.

चार लोग ही शव को कंधा क्यों देते हैं?

यह भी एक ऐसी बात है जिसे लोग अक्सर रहस्य से जोड़ देते हैं. दरअसल, चार कंधे कोई सार्वभौमिक शास्त्रीय संख्या नहीं हैं. अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में अंतिम यात्रा की परंपराएं अलग हो सकती हैं.

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चार लोगों द्वारा अर्थी उठाने की परंपरा मुख्य रूप से व्यावहारिक भी है. अर्थी के चारों कोनों पर व्यक्ति होने से भार को संभालना आसान होता है और शव को स्थिर तरीके से ले जाया जा सकता है. बाद में इसके साथ कई प्रतीकात्मक व्याख्याएं भी जुड़ गईं.

इनमें से एक लोकप्रिय व्याख्या यह है कि जीवन के अंत में व्यक्ति कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो, उसे दूसरों के कंधों का सहारा लेना ही पड़ता है. इसे मृत्यु के सामने मनुष्य की समानता के प्रतीक के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन इसे किसी एक प्राचीन शास्त्र का निश्चित नियम बताना सही नहीं होगा.

अंतिम यात्रा इतनी जल्दी श्मशान क्यों ले जायी जाती है?

मृत्यु के बाद शव को लंबे समय तक घर में रखने के बजाय अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने की परंपरा कई हिंदू समुदायों में रही है. इसके पीछे धार्मिक कारणों के साथ व्यावहारिक कारण भी हैं.

मृत्यु के बाद शरीर में प्राकृतिक जैविक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं. इसलिए अंतिम संस्कार को समय पर पूरा करना स्वास्थ्य और स्वच्छता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. धार्मिक दृष्टि से भी शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाना मृतक की यात्रा के अगले चरण की शुरुआत माना जाता है. इसी वजह से अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक प्रक्रिया भी है.

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पीछे मुड़कर देखने की परंपरा का क्या अर्थ है?

कई परिवारों और क्षेत्रों में अंतिम यात्रा के दौरान पीछे मुड़कर न देखने की परंपरा मिलती है. लेकिन, इसे भी सभी हिंदुओं पर लागू होने वाला एक समान शास्त्रीय नियम नहीं कहा जा सकता है. इस परंपरा की एक प्रतीकात्मक व्याख्या यह है कि जो व्यक्ति जा चुका है, उसके भौतिक शरीर के साथ मोह को धीरे-धीरे छोड़ना जरूरी है.

पीछे न देखना मानो यह संदेश देता है कि अब जीवित लोगों को अपने जीवन और जिम्मेदारियों की ओर लौटना है. इसका मतलब यह नहीं कि मृत व्यक्ति को भूल जाना चाहिए. बल्कि उसकी यादों, संस्कारों और अच्छे कर्मों को अपने जीवन में आगे बढ़ाना ही इस परंपरा की एक मानवीय व्याख्या हो सकती है.

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