आज देशभर में धनतेरस का त्योहार मनाया जा रहा है. यह पर्व सिर्फ धन और समृद्धि की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन परिवार की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए भी विशेष पूजा की जाती है. धन त्रयोदशी पर माता लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर देवता के साथ मृत्यु के देवता यमराज के नाम पर भी दीपक जलाया जाता है. इसे यम दीपक, यम दीपम या यम दीपदान कहा जाता है. मान्यता है कि धनतेरस की शाम यमराज के नाम का दीपक जलाने से परिवार में खुशहाली आती है और अकाल मृत्यु का भय कम होता है.
कितने बजे जलाएं यम का दीपक?
इस साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह करीब 9:30 बजे से लेकर 7 नवंबर को सुबह करीब 11:45 बजे तक रहेगी. ऐसे में धनतेरस का पर्व 6 नवंबर को मनाया जाएगा. इस दिन यम का दीपक जलाने का मुहूर्त शाम 5 बजकर 33 मिनट से 6 बजकर 51 मिनट तक रहेगा.
धनतेरस पर यम दीपक जलाने की विधि
धनतेरस की शाम सबसे पहले माता लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि की विधि-विधान से पूजा करें. इसके बाद यमराज के नाम से एक चौमुखा दीपक तैयार करें. दीपक में सरसों या तिल का तेल डालें और चार बत्तियां लगाएं. दीपक के नीचे थोड़े से अक्षत यानी साबुत चावल रखें. इसे घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखें. दीपक जलाने के बाद हाथ जोड़कर यमराज का ध्यान करें. परिवार के सभी सदस्यों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना करें.
यम दीपक जलाते समय बोलें ये मंत्र
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
धनतेरस पर क्यों जलाते हैं यम दीपक?
धनतेरस पर यम का दीपक जलाने के पीछे राजा हेम के पुत्र से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार, राजा हेम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग बताया गया था. इस भविष्यवाणी के चलते परिवार चिंतित था. जब राजकुमार का विवाह हुआ तो उनकी पत्नी को भी इस अनहोनी के बारे में पता चल गया. ऐसे में नवविवाहिता ने अपने पति की जान बचाने के लिए विवाह के चौथे दिन रातभर जागने का निश्चय किया. उसने घर के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और अन्य कीमती वस्तुएं रखकर पूरे घर को दीपों से रोशन कर दिया.
मान्यता है कि जब यमराज के दूत राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे तो दीपों की रोशनी और आभूषणों की चमक से उनका ध्यान भंग हो गया. उधर राजकुमार की पत्नी पूरी रात अपने पति को जगाए रखने के लिए गीत और कहानियां सुनाती रही. इस तरह रात बीत गई और राजकुमार की जान बच गई. कहते हैं कि तभी से धनतेरस की रात यमराज के नाम पर दीपदान करने की परंपरा शुरू हुई. धार्मिक विश्वास है कि इस दिन यम दीपक जलाने से परिवार के सदस्यों पर अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और उनकी लंबी आयु की कामना पूरी होती है.