हर साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतरेस का त्योहार मनाया जाता है. इस साल धनतेरस 6 नवंबर को मनाया जाएगा. इस दिन धनधान्य में वृद्धि के लिए कुबेर भगवान की पूजा की जाती है. कुबेर को देवताओं के खजाने का संरक्षक और यक्षों का राजा कहा जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूर्वजन्म में कुबेर का पूर्वजन्म बेहद अलग था. उस जन्म में उनका नाम गुणनिधि था और उन्हें जुआ खेलने, चोरी करने जैसी बुरी लतें लगी हुई थीं. एक बार शिवरात्रि पर उनसे अनजाने में ऐसा पुण्य हुआ जिससे उनका जीवन ही बदल गया. आइए आपको यह कहानी विस्तार से बताते हैं.
पौराणिक कथा के अनुसार, कुबेर महाराज का पिछले जन्म में गुणनिधि नाम था. वह एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे. उनके पिता का नाम यज्ञदत्त था. उनका बचपन तो बहुत अच्छी संगति में बीता था, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ वह कुसंगति से जुड़ते चले गए. उन्हें जुआ खेलने की बुरा आदत हो गई. इसके बाद वह चोरी और दूसरे गलत कामों में भी लिप्ट होते चले गए. परिवार ने उनके बुरी आदतों के कारण उन्हें घर से निकाल दिया.
घर से निकालने के बाद गुणनिधि भूखे-प्यासे भटकने लगे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करेंगे. एक रात वे घूमते हुए भगवान शिव के मंदिर पहुंच गए. संयोगवश वो शिवरात्र की रात थी. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव अपने भक्तों पर खूब कृपा बरसाते हैं. कथा के अनुसार, मंदिर में भगवान शिव के लिए भोग रखा हुआ था. भूख से परेशान गुणनिधि ने प्रसाद चुराने का विचार किया. वे दबे पांव मंदिर में दाखिल हुए, लेकिन वहां अंधेरा था.
अनजाने में गुणनिधि से हुआ पुण्य
इसी बीच गुणनिधि ने एक ऐसा पुण्य का काम कर दिया, जिसके बारे में खुद उन्हें भी नहीं पता था. मंदिर में सिर्फ एक दीपक जल रहा था और तेज हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश कर रहे थे. तभी जाने-अनजाने गुणनिधि ने मंदिर में रखे प्रसाद को देखने के लिए अपने कपड़े का एक हिस्सा फाड़ा दीपक की लौ को हवा से बचाने के लिए उसके चारों ओर लगा दिया. इससे मंदिर में रोशनी बनी रही. इसके बाद वह भोग उठाकर भागने लगे. तभी मंदिर के लोगों की नजर उन पर पड़ गई. चोरी करते पकड़े जाने के डर से वह मंदिर से भाग खड़े हुए. लेकिन इस दौरान उनकी मृत्यु हो गई.
कैसे बने देवताओं के कोषाध्यक्ष?
कथा के अनुसार, गुणनिधि के जीवन में भले ही बुरे कर्मों की संख्या ज्यादा थी. लेकिन शिवरात्रि की रात उनसे अनजाने में कुछ पुण्य कार्य भी हुए. वह पूरे दिन भोजन नहीं कर पाए थे. इसलिए उनका व्रत भी हो गया था. उन्होंने मंदिर में दीपक की लौ को बुझने से बचाया, जिसे दीपदान के समान माना गया.
कहते हैं कि मृत्यु के बाद जब यमदूत गुणनिधि को लेने पहुंचे, तब भगवान शिव के गणों ने उन्हें रोक दिया. भगवान शिव गुणनिधि के अनजाने में किए गए दीपदान से प्रसन्न हुए और उन्हें अगले जन्म में कुबेर बनने का वरदान दिया. इस तरह गुणनिधि ने अगले जन्म में महर्षि विश्रवा के पुत्र कुबेर के रूप में जन्म लिया. आगे चलकर वे देवताओं के कोषाध्यक्ष और धन-संपत्ति के अधिपति बने.