इस साल शारदीय नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. हालांकि ज्योतिषाचार्य प्रवीण मिश्र ने पंचांग देखकर सही तिथि बता दी है. ज्योतिषविद का कहना है कि नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि दोनों 19 अक्टूबर दिन सोमवार को ही मान्य है. इस दिन अष्टमी और नवमी तिथि का कन्या पूजन किया जाएगा. आइए आपको कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि बताते हैं.
नवरात्र अष्टमी 2026 तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 28 मिनट पर शुरू होगी और 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर समाप्त हो जाएगी. चूंकि 18 अक्टूबर को अष्टमी तिथि सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर रही है. इसलिए अष्टमी का कन्या पूजन 19 अक्टूबर को होगा. इसी दिन नवमी का कन्या पूजन और संधि पूजा भी होगी.
अष्टमी-नवमी पर कन्या पूजन के मुहूर्त
पहला मुहूर्त (ब्रह्म मुहूर्त)- सुबह 04:52 बजे से सुबह 05:40 बजे तक
दूसरा मुहूर्त (अमृत काल) सुबह 07:28 बजे से 09:16 बजे तक
तीसरा मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त)- सुबह 11:49 AM बजे से दोपहर 12:34 बजे तक
अष्टमी तिथि पर महौगारी का पूजन
नवरात्र की अष्टमी तिथि के दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है. भक्त सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए व्रत रखते हैं और विधि-विधान से देवी की आराधना करते हैं. अष्टमी पर कन्या पूजन की भी विशेष परंपरा है. इस दिन मां महागौरी की उपासना करने से देवी का आशीर्वाद मिलता है. कुछ मान्यताओं में श्रद्धापूर्वक पूजा करने को मनचाहे विवाह की कामना से भी जोड़ा जाता है.
नवमी तिथि पर सिद्धिदात्री की पूजा
नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा की जाती है. मां सिद्धिदात्री की आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें देवी की कृपा प्राप्त होती है. मान्यता के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की विधिपूर्वक पूजा करने से सभी देवियों की उपासना का फल प्राप्त हो सकता है. इस दिन कमल पर विराजमान मां सिद्धिदात्री का ध्यान किया जाता है. देवी को सुगंधित पुष्प अर्पित करने और शहद का भोग लगाने की परंपरा भी बताई गई है. नवमी पर दुर्गा सप्तशती के साथ कवच, कीलक और अर्गला का पाठ करना शुभ माना जाता है.
देवी की कृपा के लिए कैसे करें हवन?
नवमी के दिन हवन करने की परंपरा नवरात्र के समापन से जुड़ी है. हवन के दौरान देवी का स्मरण करते हुए श्रद्धा के साथ आहुतियां दी जाती हैं. इसके लिए हवन कुंड में विधिपूर्वक लकड़ियां जलाएं. सबसे पहले घी की पांच आहुतियां अर्पित करें. इसके बाद हवन सामग्री से 108 आहुतियां दें. हवन पूरा होने पर मां दुर्गा से सुख-समृद्धि और कृपा की प्रार्थना करें.
अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन क्यों होता है?
नवरात्र में कन्या पूजन को नारी शक्ति और बालिकाओं के सम्मान से जोड़कर देखा जाता है. धार्मिक परंपरा के अनुसार, छोटी कन्याओं में देवी के स्वरूप का दर्शन करके उन्हें पूजने और भोजन कराने की परंपरा है. नवरात्र के प्रत्येक दिन कन्या पूजन किया जा सकता है, लेकिन अष्टमी और नवमी पर इसका विशेष महत्व माना जाता है.
सामान्यतः 2 से 11 वर्ष तक की कन्याओं के पूजन का विधान बताया गया है. अलग-अलग आयु की कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है. कन्या पूजन के दौरान उन्हें श्रद्धापूर्वक आमंत्रित किया जाता है. भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है. इस परंपरा का मूल भाव कन्याओं के प्रति श्रद्धा, सम्मान और सेवा की भावना है. मान्यता है कि अष्टम-नवमी पर कन्या पूजन से देवी प्रसन्न होती हैं और सुख-समृद्धि का वरदान देती हैं.