सोचिए... 80 साल की एक बुजुर्ग महिला, जिसे दिखाई नहीं देता. पैर इतने कमजोर कि बिना सहारे चल भी नहीं सकती. पति नहीं, बेटे नहीं... और जिंदगी चलाने का एकमात्र सहारा- सरकारी पेंशन. लेकिन वो भी पांच साल पहले बंद हो गई. इसके बाद शुरू हुआ सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने का ऐसा सिलसिला, जो तब जाकर रुका, जब दादी व्हीलचेयर पर बैठकर कलेक्टर के दरवाजे तक पहुंच गईं.
ये तस्वीर सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की नहीं... सिस्टम के आईने की भी है. व्हीलचेयर पर बैठी 80 साल की कोकु देवी हैं. राजस्थान के जालोर जिले के जेतपुरा गांव की रहने वाली. आंखों की रोशनी बहुत पहले चली गई. पेट की भूख और जिंदगी की जरूरतें अब भी मजबूर कर रही हैं.
इनकी कहानी सरकारी फाइलों में दबे एक इंसान की कहानी है. करीब पांच साल पहले बायोमेट्रिक मशीन ने उनकी उंगलियों के निशान पहचानने से इनकार कर दिया. मशीन से मैचिंग नहीं हुई तो सिस्टम ने उनकी पेंशन बंद कर दी.

परिवार का कहना है कि करीब पांच साल पहले बायोमेट्रिक सत्यापन के दौरान उनकी उंगलियों के निशान मशीन से मैच नहीं हुए. यहीं से उनकी सामाजिक सुरक्षा पेंशन बंद हो गई. इसके बाद एसडीएम ऑफिस, तहसील और संबंधित विभागों के न जाने कितने चक्कर लगाए गए.
शायद किसी ने यह नहीं सोचा कि मशीन गलती कर सकती है... लेकिन भूख नहीं. इन पांच सालों में परिवार एसडीएम दफ्तर गया... तहसील गया... विभाग के चक्कर लगाए... हर बार एक नया कागज, एक नया भरोसा, एक नई तारीख मिली. लेकिन पेंशन नहीं मिली.
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जिंदगी ने भी कोई रियायत नहीं दी. करीब 20 साल पहले पति कैंसर से चल बसे. फिर दोनों बेटों की मौत हो गई. अब घर में सिर्फ महिलाएं हैं और एक पोती. घर की रसोई, दवाइयां और रोजमर्रा का खर्च... सब कुछ उसी पेंशन के भरोसे था, जो फाइलों में कहीं अटक गई.

गुरुवार को कोकु देवी सड़क पर हथेलियां टिकाते हुए जालोर कलेक्ट्रेट पहुंचीं. वहां तैनात सुरक्षाकर्मी चेनाराम ने उन्हें सहारा दिया, व्हीलचेयर पर बैठाया और कलेक्टर ऑफिस तक ले गए. वहां जो दिखा, वो सरकारी दफ्तरों में रोज नहीं दिखता.
कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे को बुजुर्ग महिला के आने की जानकारी मिली, वे अपने चैंबर से बाहर निकल आए. गैलरी में ही उन्होंने कोकु देवी और उनके परिवार की बात सुनी. इसके बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधिकारियों को मौके पर बुलाया गया. उन्होंने गैलरी में ही दादी की पूरी बात सुनी. अधिकारियों को वहीं बुलाया और कहा कि पेंशन शुरू कराइए... दस्तावेज पूरे कराइए... और जो भी सरकारी योजनाओं का लाभ बनता है, वह भी दिलाइए. कुछ ही मिनटों में वह काम शुरू हो गया, जिसका इंतजार एक बुजुर्ग महिला पांच साल से कर रही थी.

सबसे दर्दनाक यह है कि जिस महिला की उंगलियां मशीन नहीं पहचान सकीं... उसे पहचानने में पूरे सिस्टम को पांच साल लग गए. अगर कलेक्ट्रेट पहुंचने के कुछ मिनट बाद ही समाधान निकल सकता था... तो पांच साल तक वह किस दरवाजे पर दस्तक देती रही? कितनी बार किसी बाबू ने कहा होगा कि अगले हफ्ते आ जाना... और कितनी बार वह बिना पेंशन... बिना जवाब... और बिना उम्मीद के लौट गई होगी. कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे ने बताया कि मामले का निस्तारण कर दिया गया है. अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि पेंशन जल्द शुरू कराई जाए और वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं का प्राथमिकता से समाधान किया जाए.