गुजरात के सूरत शहर के पांडेसरा क्षेत्र में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपति ने गंभीर आरोप लगाते हुए जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है. इस घटना के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है. पीड़ित दंपति श्यामभाई कपूरजी गहलोत (73) और उनकी पत्नी मधुबेन गहलोत (68) पांडेसरा स्थित गुजरात हाउसिंग बोर्ड, जलाराम नगर के निवासी हैं.
दंपति का कहना है कि उन्हें सूरत महानगरपालिका के उधना साउथ जोन के कार्यकारी इंजीनियर और कुछ स्थानीय राजनीतिक नेताओं द्वारा शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है. दंपति का दावा है कि साल 2016 में हुए एक भीषण सड़क हादसे में उनके परिवार के 9 सदस्यों की मौत हो गई थी, जिसके बाद से वो पूरी तरह अकेले जीवन बिता रहे हैं.
उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में उन्होंने बमरोली ग्राम पंचायत क्षेत्र में प्लॉट नंबर 95, 96, 107 और 110 में कुल 12 छोटी दुकानें खरीदी थीं. साल 2008 में यह क्षेत्र सूरत नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आ गया, जिसके बाद वो नियमित टैक्स भरते रहे.
इच्छामृत्यु की गुहार से हिला प्रशासन
दंपति के अनुसार वर्ष 2021 में उधना ज़ोन के तत्कालीन कार्यकारी इंजीनियर ने बिना किसी पूर्व नोटिस के उनकी 12 दुकानों को सील कर दिया. इसके खिलाफ उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर की. करीब साढ़े 5 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद और फायर विभाग की रिपोर्ट के आधार पर 31 जनवरी 2026 को दुकानों की सील खोल दी गई.
दंपति का कहना है कि हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद जब उन्होंने अपनी दुकानें दोबारा शुरू कीं, तो 30 मई 2026 को फिर से उधना साउथ जोन के वर्तमान कार्यकारी इंजीनियर के आदेश पर बिना किसी नोटिस या कारण के सभी दुकानों को दोबारा सील कर दिया गया.
दंपति ने आरोप लगाया कि उन पर एक स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति से मिलने का दबाव बनाया जा रहा है और उनसे आर्थिक लेनदेन की मांग की जा रही है. उनका कहना है कि इस उम्र में लगातार कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ते-लड़ते वे मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं.
श्यामभाई गहलोत ने बताया कि 2016 के सड़क हादसे में उनका पूरा परिवार खत्म हो गया था और अब सिर्फ वो और उनकी पत्नी ही बचे हैं. उन्होंने कहा कि उनके पास अब जीने की कोई इच्छा नहीं बची है, इसलिए उन्होंने कलेक्टर से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है.
बिना नोटिस बार-बार कार्रवाई का आरोप
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें लगातार मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है, कई बार बिना नोटिस के कार्रवाई की गई और उन्हें कार्यालयों में मिलने तक नहीं दिया जाता. फिलहाल इस पूरे मामले ने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सूरत महानगरपालिका और संबंधित अधिकारियों की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.