जयपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज एसएमएस में किडनी मरीज एक कमरे में लगे ताले के फेर में फंसे हुए हैं. नेफ्रोलोजी विभाग के यूनिट हेड के रिटायर होने के बाद 31 मई से 11 मरीजों फाइल नहीं मिलने से किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहा है. हालांकि कहा जा रहा है कि सरकारी अस्पताल के डाक्टर फाइल कमरे में बंद होने का बहाना बनाकर प्राइवेट अस्पतालों में काम कर रहे हैं. पूरे राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में केवल 6 सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट ही काम कर रहे हैं.
इस प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे तीमारदार अस्पताल के ठीक सामने बनी 'मोदी धर्मशाला' के कमरों में महीनों से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.
केस 1 (कमरा नंबर 121): चूरू के रामनिवास अपने बेटे नवीन के ट्रांसप्लांट के लिए पिछले 6 महीने से यहां डेरा डाले हुए हैं. नवीन को हर तीसरे दिन डायलिसिस की जरूरत पड़ती है. उसकी मां किडनी देने के लिए तैयार है और 15 दिनों से फिटनेस सर्टिफिकेट लेकर घूम रही है, लेकिन डॉक्टर बंद फाइल का बहाना बना रहे हैं.
केस 2 (कमरा नंबर 126): बांसवाड़ा के जयंतीलाल अपनी 48 वर्षीय पत्नी अनीता को लेकर 10 मार्च से इस धर्मशाला में रह रहे हैं. अनीता का हर दूसरे दिन डायलिसिस होता है, लेकिन डॉक्टरों के पास एक ही रटा-रटाया जवाब है कि फाइल कमरे में बंद है.
केस 3: बानसूर के महेंद्र अपने बेटे कोमल को दिसंबर 2025 से लेकर यहां आए हुए हैं. एनओसी (NOC) और पुलिस वेरिफिकेशन सब कुछ हो चुका है, लेकिन डॉक्टरों की बेरुखी के चलते इलाज नहीं हो रहा. कोमल का ब्लड प्रेशर हाई रहने के कारण उसे लगातार उल्टियां हो रही हैं और उसका वजन 58 किलो से घटकर महज 45 किलो रह गया है.
एक डॉक्टर के रिटायरमेंट से ठप हुआ पूरा सिस्टम
पूरे विवाद की जड़ में डॉक्टर धनंजय अग्रवाल का वह कमरा है, जो राजस्थान के सबसे बेहतरीन नेफ्रोलॉजिस्ट माने जाते हैं. 31 मई 2026 को उनके रिटायरमेंट से पहले सारे ट्रांसप्लांट उन्हीं की देखरेख में होते थे. लेकिन उनके जाने के बाद वर्तमान प्रभारी डॉक्टरों ने यह कहते हुए मरीजों का इलाज करने या ऑपरेशन थियेटर में ले जाने से मना कर दिया कि केस फाइलें डॉक्टर धनंजय के कमरे में बंद हैं और उसकी चाबी उनके पास नहीं है.
जब इस संबंध में इलाज करने वाले डॉक्टर संजीव शर्मा से बात की गई तो उनका बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया सामने आया. उन्होंने कहा, "मेरा काम फाइलें ढूंढना नहीं है. मेरे पास टेबल पर फाइल नहीं आई, तो हमने ट्रांसप्लांट का केस नहीं किया. हम सिर्फ बाकी मरीजों का रूटीन डायलिसिस कर रहे हैं."
वहीं, छुट्टी से लौटे नेफ्रोलॉजी विभाग के HOD डॉ. विनय मल्होत्रा ने इस पूरे मामले पर लीपापोती करते हुए कहा कि कमरा खुलवाने की बात थी जो जल्द खुल जाएगा और चाबी यहीं थी. उन्होंने यह भी माना कि अगर डॉक्टर चाहते तो नई फाइल बनाकर या ऑनलाइन पोर्टल पर मौजूद डेटा के आधार पर भी इलाज शुरू कर सकते थे, क्योंकि सभी फाइलें डिजिटल रूप से सुरक्षित रहती हैं.
'आजतक' की पड़ताल
'आजतक' की इन्वेस्टिगेटिव पड़ताल में इस लापरवाही के पीछे का एक बड़ा और कड़वा सच सामने आया है. दरअसल, पूरे राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में इस समय केवल 6 सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट ही कार्यरत हैं. कम संख्या होने के कारण इन डॉक्टरों की प्राइवेट कॉर्पोरेट अस्पतालों में भारी डिमांड है. देखें VIDEO:-
पड़ताल के मुताबिक, ये डॉक्टर सरकारी अस्पताल में अपनी हाजिरी लगाने और खानापूर्ति करने के लिए महज एक से दो घंटे ही आते हैं और अपना बाकी का पूरा कीमती समय निजी अस्पतालों में किडनी ट्रांसप्लांट करने में बिताते हैं. चूंकि सरकारी अस्पतालों में मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत मुफ्त डायलिसिस और इलाज होता है, इसलिए डॉक्टर काम के बोझ और मुफ्त इलाज से बचने के लिए फाइलों के बंद होने का यह फर्जी बहाना बना रहे हैं.