दिवाली के बाद घर में जले हुए दीयों के बचे हिस्से का आप क्या करते हैं? ज्यादातर लोग उन्हें समेटकर फेंक देते होंगे. लेकिन जयपुर में एक गौशाला ऐसे दीपक तैयार कर रही है, जिनके जलने के बाद बचे अवशेष से गमले में पौधा उगाने की कोशिश की जा सकती है. इन दीपकों में तुलसी, अश्वगंधा और किनोवा जैसे पौधों के बीज डाले जा रहे हैं.
दीपक देसी गाय के गोबर से बन रहे हैं. इनकी कहानी में एक साथ कई चीजें शामिल हैं. दिवाली की परंपरा, पर्यावरण संरक्षण की कोशिश, गौशालाओं की आमदनी बढ़ाने की कोशिश और महिलाओं को रोजगार देने की पहल.
जयपुर की श्री पिंजरापोल गौशाला में इन दिनों गोमय दीपक बनाने का काम तेजी से चल रहा है. गौशाला प्रबंधन के मुताबिक, अब तक करीब 10 लाख दीपक तैयार किए जा चुके हैं और तैयार दीपक बिक चुके हैं. इस साल टारगेट 25 लाख दीपक बनाने का है. मांग देश के अलग-अलग राज्यों से आ रही है और इनकी खेप मॉरीशस तक भेजी गई है.
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गौशाला में पहुंचिए, तो महिलाएं दीपक बनाने के काम में जुटी दिखाई देती हैं. कोई महिला मैटेरियल तैयार कर रही है, तो कोई सांचे की मदद से दीपक का आकार दे रही है. यहां एक साथ 10 से 15 महिलाएं काम करती हैं.
हर महिला रोजाना करीब 800 से 1,000 दीपक तैयार कर रही है. इस हिसाब से गौशाला में हर दिन लगभग 10 से 12 हजार दीपक बनाए जा रहे हैं. कई स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़ी महिलाओं को भी इस पहल में शामिल किया गया है. उन्हें दीपक बनाने के सांचे दिए गए हैं.
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कहानी सिर्फ गोबर से दीया बनाने की नहीं है. कोशिश यह भी है कि महिलाओं को ऐसा काम मिले, जिसे वे ट्रेनिंग लेकर अपने स्तर पर कर सकें. साथ ही, गौशाला के गोबर को इस्तेमाल में आने वाले प्रोडक्ट में बदलकर उससे आमदनी का रास्ता बनाया जाए.
गोबर, काली मिट्टी और जटामांसी से बन रहे दीपक
आखिर ये दीपक बनते कैसे हैं? गौशाला प्रबंधन के मुताबिक, इन्हें बनाने में देसी गाय के गोबर का पाउडर, काली मिट्टी, ग्वार गम, जटामांसी और बाइंडिंग के लिए मैदा इस्तेमाल किया जाता है. कुछ दीपकों में तुलसी, अश्वगंधा और किनोवा के बीज भी डाले जा रहे हैं.
यही बीज इन दीपकों को खास बनाते हैं. सामान्य दीये का काम रोशनी देना है. इन दीपकों के मामले में कोशिश है कि जलने के बाद बचा अवशेष भी किसी काम आ सके. उसे मिट्टी या गमले में डालने पर अनुकूल परिस्थितियों में बीज अंकुरित हो सकते हैं. अवशेष को पौधों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. बीजों के अंकुरण के लिए उनकी स्थिति, मिट्टी, पानी और दूसरे अनुकूल हालात का होना जरूरी है.

इन दीपकों की कीमत 3 से 10 रुपये के बीच बताई गई है. गौशाला के मुताबिक, इन्हें इस्तेमाल करने से पहले सामान्य मिट्टी के दीयों की तरह पानी में भिगोकर सुखाने की जरूरत नहीं होती. इन दीपकों को जलाने पर घर में हवन जैसा एहसास होने की भी बात कही जा रही है. कीमत कम रखने और बड़ी संख्या में उत्पादन करने की कोशिश के पीछे एक बिजनेस मॉडल भी है. अगर ऐसे प्रोडक्ट्स की मांग बनी रहती है, तो गोबर से बने दूसरे प्रोडक्ट के लिए भी बाजार तैयार हो सकता है.
पिछले साल राम मंदिर भेजे गए करीब 5 लाख दीपक
जयपुर में बन रहे ये दीपक सिर्फ लोकल मार्केट के लिए नहीं हैं. अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता का कहना है कि इन दीयों की डिमांड मांग उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों से आ रही है. बीते साल अयोध्या के राम मंदिर में करीब पांच लाख दीपक भेजे गए थे. इस बार भी राम मंदिर सहित देशभर में लाखों दीपक पहुंचाने की तैयारी है. इनकी एक बड़ी खेप मॉरीशस भी भेजी गई है. हालांकि, इस साल 25 लाख दीपक बनाने का टारगेट पूरा होता है या नहीं, यह उत्पादन और मांग पर निर्भर करेगा. फिलहाल करीब 10 लाख दीपक तैयार हो चुके हैं और बिक भी चुके हैं.
4,000 गौशालाओं का नेटवर्क, महिलाओं को जोड़ने की कोशिश
अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद की अंतरराष्ट्रीय सहसंयोजक मोनिका गुप्ता कहती हैं कि इस पहल के जरिए महिलाओं को ट्रेनिंग देकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है. परिषद से जुड़ी करीब 4000 गौशालाओं के नेटवर्क के जरिए गोबर आधारित प्रोडक्ट तैयार करने और बिक्री की प्लानिंग है. मकसद यह है कि गौशालाएं गोबर का इस्तेमाल सिर्फ पारंपरिक कामों तक सीमित न रखें, बल्कि बाजार में बिकने वाले प्रोडक्ट भी तैयार करें.

यह मॉडल सफल होता है, तो इससे गौशालाओं की आमदनी बढ़ाने के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के नए मौके भी मिल सकते हैं. लेकिन इसके लिए लगातार मांग, प्रोडक्ट की क्वीलिटी, माफिक दाम और बिक्री की व्यवस्था बनाए रखना जरूरी होगा.
दिवाली की रोशनी से आगे की कहानी
दिवाली पर दीया जलाना एक परंपरा है. जयपुर की इस पहल में उसी परंपरा को एक नए प्रयोग से जोड़ने की कोशिश हो रही है. गोबर से दीपक तैयार करना, महिलाओं को काम से जोड़ना और कुछ दीपकों में बीज डालकर उनके अवशेष का दोबारा इस्तेमाल करने की संभावना तलाशना, इस कहानी के अलग-अलग पहलू हैं.
अगर बीज वाले दीपकों का प्रयोग सही तरीके से काम करता है, तो दिवाली के बाद उनके बचे हिस्से से पौधे उगाने का विकल्प भी मिल सकता है. और अगर गोबर से बने उत्पादों का बाजार बढ़ता है, तो गौशालाओं के लिए आमदनी का एक नया जरिया तैयार हो सकता है. फिलहाल जयपुर की श्री पिंजरापोल गौशाला में तैयारियां चल रही हैं. टारगेट 25 लाख दीपकों का है.