राजस्थान के भिवाड़ी में पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर ठगी करने वाले एक संगठित गिरोह का भंडाफोड़ किया है. यह गिरोह भिवाड़ी की एक पॉश सोसायटी के फ्लैट से हाईटेक कॉल सेंटर संचालित कर अमेरिका, कनाडा समेत 10 से ज्यादा देशों के नागरिकों को निशाना बना रहा था. आरोपी खुद को FBI, अमेरिकी न्याय विभाग और अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट, फर्जी गिरफ्तारी वारंट और सेटलमेंट नोटिस का डर दिखाते थे.
पुलिस ने इस मामले में तीन शातिर आरोपियों को गिरफ्तार किया है. खास बात यह है कि तीनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और लंबे समय से इस अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क से जुड़े हुए थे. शुरुआती जांच में सामने आया है कि इनके खातों में एक लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक की रकम ट्रांसफर हो चुकी है. ठगी की रकम क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भारत लाई जाती थी.
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जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि कॉल करने से पहले आरोपी अंग्रेजी में तैयार स्क्रिप्ट के जरिए अभ्यास करते थे, ताकि बातचीत के दौरान उनकी भाषा और लहजे पर किसी को शक न हो. इसके बाद विदेशी नागरिकों को फोन कर उन्हें कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर लाखों डॉलर की ठगी को अंजाम दिया जाता था.
पॉश सोसायटी के फ्लैट को बनाया हाईटेक ऑपरेशन सेंटर
पुलिस अधीक्षक बृजेश उपाध्याय ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मोहित गुप्ता (35) निवासी द्वारका, दिल्ली, राहुल सिंह (34) निवासी करावल नगर, दिल्ली और जैम्स अनिल मंडल (35) निवासी कोलकाता, पश्चिम बंगाल के रूप में हुई है.
आरोपियों के कब्जे से साइबर ठगी में इस्तेमाल किए जा रहे 7 लैपटॉप, 4 मोबाइल फोन और एक स्कॉर्पियो-एन कार बरामद की गई है. जांच में पता चला कि आरोपी वीपीएन, वर्चुअल नंबर और हाई-स्पीड इंटरनेट का इस्तेमाल कर अपनी लोकेशन विदेश की दिखाते थे.
पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने आशियाना टाउन स्थित दो फ्लैटों की दीवार तोड़कर उन्हें एक बड़े ऑपरेशन सेंटर में बदल दिया था. यहां हाई-स्पीड इंटरनेट, राउटर, यूपीएस, हेडफोन और कई लैपटॉप की मदद से पूरा कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था.
FBI अधिकारी बनकर देते थे डिजिटल अरेस्ट की धमकी
जांच में सामने आया कि आरोपी खुद को अमेरिका की FBI, न्याय विभाग, साइबर सुरक्षा एजेंसियों या अन्य सरकारी विभागों का अधिकारी बताकर विदेशी नागरिकों को फोन करते थे. बातचीत के दौरान उन्हें बताया जाता था कि उनका नाम चाइल्ड पोर्नोग्राफी, साइबर हैकिंग, क्रेडिट कार्ड डेटा लीक या किसी गंभीर अपराध में सामने आया है.
इसके बाद पीड़ितों को ईमेल और ऑनलाइन माध्यम से फर्जी गिरफ्तारी वारंट, सेटलमेंट नोटिस और अन्य कानूनी दस्तावेज भेजे जाते थे. आरोपी लोगों को "डिजिटल अरेस्ट" में होने का डर दिखाकर उनसे भारी रकम वसूलते थे. गिरोह का सबसे बड़ा निशाना वरिष्ठ नागरिक और तकनीकी जानकारी से कम परिचित लोग थे.
पूछताछ में करीब एक लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 96 लाख रुपये की साइबर ठगी का अनुमान सामने आया है. पुलिस इस रकम से जुड़े डिजिटल और बैंकिंग साक्ष्य जुटाने में लगी है.
क्रिप्टोकरेंसी से मंगाते थे पैसा, अंग्रेजी स्क्रिप्ट से करते थे प्रैक्टिस
पुलिस के अनुसार आरोपी ठगी से हासिल विदेशी मुद्रा को ऑनलाइन क्रिप्टोकरेंसी में बदलते थे. इसके बाद अलग-अलग खातों के जरिए रकम भारत लाकर भारतीय मुद्रा में परिवर्तित की जाती थी. अपनी पहचान छिपाने के लिए वीपीएन, वर्चुअल विदेशी नंबर और कई तकनीकी एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया जाता था.
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों के कंप्यूटर और मोबाइल में मौजूद डेटा डिलीट कर दिया जाता था और जरूरत पड़ने पर ही उसे रिकवर किया जाता था. हर तरह की ठगी के लिए डेस्कटॉप और नोटपैड में अलग-अलग अंग्रेजी स्क्रिप्ट तैयार रखी जाती थीं. कॉल करने से पहले आरोपी इन स्क्रिप्ट की प्रैक्टिस करते थे, ताकि खुद को असली अधिकारी साबित कर सकें.
भिवाड़ी थाने में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं और आईटी एक्ट की धारा 66C एवं 66D के तहत मामला दर्ज किया गया है. पुलिस अब आरोपियों का आपराधिक रिकॉर्ड खंगाल रही है और यह भी जांच कर रही है कि इस गिरोह से और कौन-कौन लोग जुड़े हुए हैं.