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वोटर्स की लॉटरी... कौन हैं बंगाल के 139 ‘खुशनसीब’, जो मतदाता होने की अग्निपरीक्षा पास कर पाए

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में वोट डाल रहे 139 मतदाताओं का जिक्र खास हो गया है. ये 34 लाख वोटरों में से वे चुनिंदा लोग हैं, जिनका नाम SIR के कारण वोटर लिस्ट से कट गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनल ने इन्हें वोट देने के योग्य पाया है. ऐसी अगली सूची दूसरे फेज के मतदान से दो दिन पहले आएगी.

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पूर्व मेदिनीपुर में वोट देने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे वोटर. (Photo: PTI)
पूर्व मेदिनीपुर में वोट देने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे वोटर. (Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान से पहले सिर्फ 139 खुशनसीब लोग ऐसे हैं, जिनका नाम वोटर लिस्ट में फिर से जुड़ गया है. SIR के कारण वोटर लिस्ट से नाम डिलीट हो जाने के बाद 34 लाख लोगों ने ट्रिब्यूनल के सामने अपील की थी. 19 जजों का ये ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बना है. 

13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया था कि जिन लोगों को मतदान से दो दिन पहले तक ट्रिब्यूनल की तरफ से योग्य घोषित किया जाए, उन्हें बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट डालने दिया जाए. ऐसा दोनों चरणों के मतदान के लिए होना है. ये 139 लोग 23 अप्रैल के पहले चरण के चुनाव में वोट डालने के योग्य बताए गए हैं, और बाकियों के नाम 29 अप्रैल की वोटिंग के दो दिन पहले सामने आएंगे. 

पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल ने बताया था, 'ये सभी 139 लोग गुरुवार (23 अप्रैल) को वोट डाल सकते हैं... उनके पोलिंग बूथ और रिटर्निंग अफसरों को जानकारी दे दी गई है... जिन 139 लोगों के नाम मंजूर हुए हैं, उनमें 88 साल के सुप्रबुद्ध सेन भी शामिल हैं... वो नंदलाल बोस के नाती हैं, जिन्होंने मूल संविधान की पांडुलिपि में चित्र बनाए थे.' हालांकि, बताया जा रहा है कि खराब सेहत की वजह से सुप्रबुद्ध सेन के वोट डालने की संभावना कम ही है. मुश्किल यह है कि वो घर से वोट डालने की समय-सीमा से भी चूक गए हैं.

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बंगाल में वोटर बने रहने का संघर्ष

इंजामुल इस्लाम का नाम भी 139 लोगों में शुमार है, लेकिन वह बिल्कुल खुश नहीं हैं. तृणमूल कांग्रेस के नेता इंजामुल इस्लाम मुर्शिदाबाद जिले की धुलियान नगरपालिका के चेयरमैन हैं. पहले चरण के मतदान से पहले ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद इंजामुल इस्लाम का नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल कर लिया गया. 

धुलियान शमशेरगंज विधानसभा क्षेत्र में आता है, जहां SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सबसे ज्यादा 74,775 नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में इंजामुल इस्लाम बेहद नाराज और माफी मांगते नजर आ रहे हैं. माफी, असल में, इंजामुल इस्लाम अपने समर्थकों को टीएमसी कार्यकर्ताओं से मांग रहे हैं. 

इंजामुल इस्लाम कहते हैं, सार्वजनिक सभाओं और रैलियों में मैं कहता फिरता था कि अगर सप्लीमेंट्री लिस्ट में किसी का नाम सबसे आखिर में आएगा, तो वह मेरा होगा... अब मेरे पार्टी कार्यकर्ता भी मुझसे सवाल कर रहे हैं... यह शर्मनाक है... अगर शमशेरगंज के लोग चाहें, तो मैं वोट डालने नहीं जाऊंगा. मैं यह नहीं चाहता था... इससे मेरा राजनीतिक करियर खराब हो सकता है... मैं चाहता हूं कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनके नाम पहले मतदाता सूची में वापस आएं.

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बहरामपुर के YMA ग्राउंड में चुनाव सामग्री लेने पहुंचे अली अकबर की कहानी भी मिलती जुलती ही है. बेहद गुस्से में, और निराश अली अकबर बताते हैं, यह क्रूर विडंबना है कि कल मैं मतदान अधिकारी के तौर पर काम करूंगा, लेकिन मेरी पत्नी वोट नहीं दे पाएगी... उसका मामला अब भी ट्रिब्यूनल में अटका पड़ा है, क्योंकि उसका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था.

इंडिया टुडे टीवी से बातचीत में मोहम्मद अमीनुल इस्लाम ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. अमीनुल इस्लाम को यकीन है कि उनका नाम वोटर लिस्ट में फिर से शामिल कर लिया जाएगा. अमीनुल इस्लाम मालदा जिले के रुतुआ विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं - और 400 किलोमीटर का सफर तय कर जोखा पहुंचे हैं, जहां एक बड़ी इमारत में 19 जजों के ट्रिब्यूनल का दफ्तर बनाया गया है.

पेशे से शिक्षक अमीनुल इस्लाम दो बार चुनाव ड्यूटी भी कर चुके हैं. बताते हैं, एक बार लोकसभा और एक बार पंचायत चुनाव में. अमीनुल इस्लाम बताते हैं कि इस बार भी उनकी चुनाव ड्यूटी लगी है, लेकिन वोटर लिस्ट में उनका नाम नहीं है. अमीनुल इस्लाम के मुताबिक, उनके माता-पिता का नाम वोटर लिस्ट में है, लेकिन उनका और उनकी बहन का नाम कट गया है. कहते हैं, बीएलओ और ईआरओ से पूछा तो कह रहे हैं कि मालूम नहीं ये कैसे हो गया.  
कोलकाता हाई कोर्ट के वकील तारिक कासिमुद्दीन की टीम ने वोटर लिस्ट से हटा दिए गए करीब 300 मतदाताओं की अपील दाखिल कराने में मदद की है. तारिक कासिमुद्दीन के मुताबिक, कई अपील करने वालों के पास पासपोर्ट थे. कहते हैं, हमने जो देखा है, वह यह है कि कुछ मामलों में बूथ लेवल अधिकारियों ने मतदाताओं को सही सलाह नहीं दी. उनसे कहा कि सिर्फ एक दस्तावेज काफी है. इससे उन्हें अपना दावा साबित करने का मौका नहीं मिला.

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बहरामपुर के होटल में काम करने वाले जहांगीर शेख ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि उनकी पत्नी तुहना नसरीन राजधोरपारा ग्राम पंचायत की सदस्य और सीपीआई(एम) की नेता हैं. जहांगीर शेख के चाचा हैदर अली बूथ लेवल अधिकारी हैं, लेकिन उनका नाम भी वोटर लिस्ट में नहीं है. कहते हैं, कौन सा वोट? दूसरों के लिए गुरुवार को वोट है... मेरे पास पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र है, फिर भी जांच के बाद मेरा और मेरी पत्नी का नाम हटा दिया गया.

वोट अधिकार से ज्यादा नागरिकता खोने का डर

आईआईएम कोलकाता की प्रोफेसर नंदिता रॉय का नाम भी वोटर लिस्ट से बाहर हो गया है. पहले आईआईएम लखनऊ में पढ़ा चुकीं नंदिता रॉय इंडिया टुडे टीवी से बातचीत में कहती हैं, एसआईआर ठीक है. प्रॉसेस ठीक है डेमॉक्रेसी के लिए. क्योंकि कई लोग ऐसे हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.

निराश और हताश तो नंदिता रॉय भी हैं, क्योंकि वोटर लिस्ट से नाम हट जाने के बाद आगे क्या होगा, नहीं मालूम. कोर्ट जाने का रास्ता तो अब भी खुला है, लेकिन तब तक क्या होगा. सब अनिश्चित सा है. फिर भी, चेहरे पर ऐसा भाव न आए, बातचीत में ऐसी कोशिश करती हैं. 

लेकिन, सभी के पास नंदिता की तरह धैर्य नहीं है. ऐसे लोग हद से ज्यादा डरे हुए नजर आते हैं. भविष्य की चिंता में लोग दूर दूर से ट्रिब्यूनल के पास पहुंच रहे हैं, और अंदर बुलाए जाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. वहां भी सबकी सुनवाई होगी ही, जरूरी नहीं है. 

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रिपोर्ट के मुताबिक, 23 अप्रैल के पहले चरण के लिए सप्लीमेंट्री सूची जारी करने की घोषणा करते वक्त चुनाव आयोग ने न तो उन लोगों की सूची दी जिनके नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल किए जा चुके हैं, और न ही यह बताया कि ट्रिब्यूनल ने कितने आवेदनों पर विचार किया है. सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि करीब 650 मामले देखने के बाद ट्रिब्यूनल ने पहले फेज के लिए योग्य वोटर को मंजूरी दी है. ये भी मालूम हुआ है कि 139 के अलावा करीब 650 मामलों में से कुछ और लोग भी वोट देने के योग्य हो सकते हैं. क्योंकि उनके नाम पहले की एक सप्लीमेंट्री सूची में मंजूर किए जा चुके थे. लेकिन, उनकी कुछ फिक्र थी, इसलिए ट्रिब्यूनल में अप्लाई कर दिया था. 

जांच की प्रक्रिया में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के चलते 27.10 लाख नाम हटाए जाने थे. ट्रिब्यूनलों की प्रक्रिया शुरू होने में काफी समय लग गया. चुनाव आयोग ने पहले बताया था कि ट्रिब्यूनल 34 लाख आवेदनों पर सुनवाई कर रहे थे.

यह पूछे जाने पर कि वोटर लिस्ट से नाम कट जाने पर सबसे बड़ा डर क्या है, रबीउल मलिक इंडिया टुडे टीवी से कहते हैं, 'डर इस बात को लेकर है... अगर ये वाला वोट नहीं देंगे... बाद में कुछ बोलेंगे... कहेंगे तुम यहां के नागरिक नहीं हो... तब हम लोग कहां जाएंगे.'

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रबीउल मलिक का कहना है कि वह भारत के नागरिक हैं. सब तो प्रूफ है. पत्नी का पासपोर्ट दिखाते हैं. कहते हैं, आधार कार्ड और पैन कार्ड सब कुछ है. 

रबीउल मलिक की ही तरह 68 साल के अहमद हुसैन भी 400 किलोमीटर दूर से ट्रिब्यूनल के पास पहुंचे हैं. इस उम्मीद से कि शायद सुनवाई हो जाए, और फिर से उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो जाए. जब वोटर लिस्ट में नाम न होने के असर के बारे में पूछा जाता है, तो कहने लगते हैं - 'वो तो बोलते हैं, होम मिनिस्टर... निकाल देंगे... निकाल देंगे हर रोज बोलते हैं... वो अमित शाह जी बोलते रहे हैं कि जिसका नाम लिस्ट में नहीं रहेगा, उसको निकाल देंगे. इसी डर में हम आए हैं यहां.'

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