भारतीय राजनीति में भोजन कभी सिर्फ भोजन नहीं रहा. वह पहचान भी रहा है, प्रतीक भी और कई बार सार्वजनिक नैतिकता की परीक्षा भी. लेकिन सोशल मीडिया के दौर में खाने की एक प्लेट अब निजी पसंद नहीं रह गई है. वह राजनीतिक संदेश की तरह पढ़ी जाती है. सवाल यह नहीं रह गया कि आपने क्या खाया, बल्कि यह है कि आपने किस समय, किस जगह और किस परिस्थिति में खाया. ताजा विवाद विजेता दहिया को लेकर है.
CJP ने उन्हें प्रवक्ता पद से हटाने के साथ-साथ उनकी सभी आधिकारिक जिम्मेदारियां भी वापस ले लीं. वजह बना एक वायरल वीडियो, जिसमें वह बर्गर खाते दिखाई दिए. वीडियो उस समय सामने आया, जब आंदोलनकारी पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे थे. पार्टी ने उनके व्यवहार को आंदोलन के मूल्यों के विपरीत और असंवेदनशील बताया. बर्गर खाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है. भूख लगने पर इंसान खाना खाता है और आंदोलन में शामिल लोग भी इससे अलग नहीं होते. लेकिन सार्वजनिक जीवन में हर दृश्य अपने संदर्भ से बड़ा हो जाता है. यही इस विवाद की असली जड़ है.
बर्गर समस्या नहीं बना. समस्या यह बनी कि उसे किस क्षण और किस अर्थ में देखा गया. विजेता दहिया ने सफाई दी कि वह आंदोलन में शामिल थे, मार्च में गए थे और मार्च खत्म होने के बाद घर जाकर नहाने के लिए निकले थे. उन्होंने कहा कि वह दो रातों से सोए नहीं थे और भूखे थे. बाद में उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने बर्गर खाया ही नहीं, क्योंकि उसमें रिफाइंड फ्लोर और ट्रांस फैट था. लेकिन तब तक वीडियो अपना काम कर चुका था. वह भोजन का दृश्य नहीं रहा था, वह राजनीतिक प्रमाण बन चुका था.
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आज डिजिटल राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है. किसी व्यक्ति का पूरा काम, उसकी पूरी भूमिका और उसका पूरा संदर्भ अक्सर एक छोटे-से वीडियो क्लिप में सिमट जाता है. जो बात जमीन पर घंटों में घटती है, वह स्क्रीन पर कुछ सेकंड में फैसला सुना देती है.
दहिया ने यह भी कहा कि उन्होंने अब तक आंदोलन और CJP के लिए काम किया. जब पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके के कचौड़ी खाने के वीडियो को लेकर आलोचना हुई थी, तब उन्होंने उनका बचाव किया था. उनके मुताबिक, उन्होंने दिपके के खिलाफ चल रहे प्रचार का जवाब दिया था. अब उनका सवाल था कि जब उन्होंने कचौड़ी के मामले में दिपके का बचाव किया, तो उनके बर्गर के मामले में उन्हें अकेला क्यों छोड़ दिया गया.
यहीं से यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के खाने का नहीं रह जाता. यह आंदोलन के भीतर अनुशासन, छवि और नैतिक अपेक्षाओं का सवाल बन जाता है. सार्वजनिक भूमिका में रहने वाले व्यक्ति से लोग सिर्फ बयान नहीं, प्रतीकात्मक उपस्थिति भी चाहते हैं. अगर आंदोलनकारी पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे हों और उसी समय आंदोलन से जुड़ा कोई प्रमुख चेहरा आराम से खाते हुए दिखाई दे, तो असहजता पैदा होना स्वाभाविक है. सवाल यह नहीं कि असहजता क्यों हुई. सवाल यह है कि क्या उसका जवाब इतना कठोर होना चाहिए था.
भारतीय आंदोलनों में भोजन हमेशा सामूहिकता का हिस्सा रहा है. लंगर, पैकेट, पूरी-सब्जी, चाय और पानी केवल पेट भरने के साधन नहीं रहे. वे यह बताने के तरीके भी रहे हैं कि संघर्ष अकेले नहीं लड़ा जा रहा. भोजन आंदोलन के खिलाफ नहीं, अक्सर उसके साथ खड़ा होता रहा है लेकिन अब तस्वीर बदल गई है. आंदोलन की वास्तविकता और उसकी डिजिटल छवि एक-दूसरे से अलग नहीं रह गई हैं. पहले किसी नेता या प्रवक्ता की उपस्थिति का असर उसके भाषण और उसके काम से तय होता था. अब उसके हाथ में पकड़ी चीज भी संदेश बन जाती है.
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एक बर्गर, एक कचौड़ी या एक प्लेट बिरयानी अब सिर्फ खाने की चीजें नहीं हैं. वे राजनीतिक व्याख्या के साधन बन चुके हैं. यही सोशल मीडिया का नया राजनीतिक न्यायशास्त्र है. अदालत बाद में बैठती है, टाइमलाइन पहले फैसला सुना देती है. इस फैसले में अक्सर संदर्भ की जगह प्रतीक ले लेता है. कोई बिरयानी खा रहा है तो उसकी निष्ठा पर सवाल. कोई कचौड़ी खा रहा है तो उसकी गंभीरता पर सवाल. कोई बर्गर खा रहा है तो उसकी संवेदनशीलता पर सवाल. खाने की थाली अब निजी नहीं रही. वह सार्वजनिक बयान बन गई है.
इसलिए विजेता दहिया का मामला सिर्फ उनकी गलती या सफाई का मामला नहीं है. यह उस बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत है, जहां आंदोलन की सफलता केवल जमीन पर मौजूद लोगों से नहीं, बल्कि कैमरे में दिख रही छवि से भी तय होती है. जनता नेताओं और प्रवक्ताओं से सिर्फ बयान नहीं, प्रतीकात्मक अनुशासन भी चाहती है. लेकिन प्रतीकात्मक अनुशासन और नैतिक दंड के बीच की रेखा बहुत पतली होती है. अगर हर असंगति पर तुरंत पद छिनने लगे, तो आंदोलन विचारों से ज्यादा छवियों का अनुशासन बन जाएगा.
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विजेता दहिया के मामले में यह सवाल उठना उचित है कि क्या उन्हें उस समय और उस जगह पर इस तरह दिखाई देना चाहिए था. सार्वजनिक भूमिका में आने के बाद व्यक्ति अपने निजी व्यवहार को पूरी तरह निजी नहीं रख सकता. खासकर तब, जब वह खुद आंदोलन का प्रमुख चेहरा हो. लेकिन आलोचना पूरे संदर्भ में होनी चाहिए, सिर्फ वायरल वीडियो के आधार पर नहीं. अगर समस्या अनुपस्थिति थी, तो अनुपस्थिति पर बात होनी चाहिए थी. अगर समस्या समय था, तो समय पर सवाल उठना चाहिए था. अगर समस्या बयान था, तो बयान पर कार्रवाई होनी चाहिए थी. लेकिन अगर पूरा मामला सिर्फ बर्गर तक सिमट जाए, तो यह आंदोलन की नैतिकता से ज्यादा उसकी डिजिटल अतिसंवेदनशीलता का संकेत बन जाता है.
आज बर्गर विजेता दहिया का है. कल कचौड़ी किसी और की होगी. परसों पूरी-सब्जी किसी तीसरे की. अगर राजनीति इसी दिशा में चलती रही, तो आंदोलन का अगला बड़ा सवाल शायद यह नहीं होगा कि सरकार से मांग क्या है, बल्कि यह होगा कि धरने पर आज खाने में क्या है. और यही हमारे समय की सबसे विचित्र राजनीतिक विडंबना है. जिस देश में करोड़ों लोग रोज यह सोचकर उठते हैं कि आज खाना मिलेगा या नहीं, वहां राजनीति कभी-कभी इस बात पर लड़ रही होती है कि आंदोलन के दौरान किसी ने बर्गर क्यों खाया.