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Opinion: जवाबदेही जब राजनीतिक सुविधा से आए, तो कमजोर पड़ने लगता है लोकतंत्र

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री की कुर्सी तभी छोड़ देनी चाहिए थी, जब न तो विपक्ष ने इस्तीफे की मांग की थी और ना ही जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट ही हो रहे थे. जब जनता जवाबदेही की मांग कर रही थी.

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धर्मेंद्र प्रधान पर कयास तेज (Photo ITG)
धर्मेंद्र प्रधान पर कयास तेज (Photo ITG)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल की चर्चा है. इस बार के कैबिनेट फेरबदल में कई मंत्रियों के विभाग बदले जाने की चर्चा है और सबसे अधिक बात हो रही शिक्षा मंत्री को लेकर. कि क्या शिक्षा मंत्री को बदला जाना चाहिए? ऐसा होगा, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर ही है. क्योंकि सरकार के नजरिये से अगर अब ऐसा होता है, तो इसका गलत संदेश जाएगा.

राजनीति, विचारधारा या पहचान हमारे विवेक को धुंधला कर दे, इससे पहले दो बातें ऐसी हैं, जिन पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए. ये सवाल नहीं, लोकतंत्र के मूल सिद्धांत हैं.

  1. पत्रकारिता का असर होना ही चाहिए.
  2. लोगों की नाराजगी देखी, सुनी और स्वीकार की जानी चाहिए.

ये दोनों जब नेगोशिएबल हो जाते हैं, उसी पल से लोकतंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ- मीडिया और नागरिक समाज कमजोर होने लगते हैं. जिस पत्रकारिता का कोई प्रभाव न हो, वह केवल एक प्रदर्शन बनकर रह जाती है और जो समाज जनता के आक्रोश को स्वीकार करने से इनकार कर दे, वहां लोकतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि महज एक औपचारिक रस्म बनकर रह जाता है.

पत्रकारिता अगर सत्ता से जवाबदेही तय नहीं करा सकती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है. इसी तरह अगर आम नागरिक की शिकायतों का अगर कोई जवाब नहीं मिलता, तो लोकतंत्र महज दिखावा भर रह जाता है. जब व्यक्तिगत राजनीति, विचारधारा और पहचान सर्वोपरि हो जाएं, लोकतांत्रिक आदर्श बिखरने लगते हैं.

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संसद के मानसून सत्र से पहले कैबिनेट फेरबदल के कयास तेज हैं. हालांकि, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं आई है. अगर कैबिनेट में फेरबदल होता है, तो क्या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाया जाएगा? यह किसी को नहीं पता. नीट (NEET) पेपर लीक और सीबीएसई के मूल्यांकन सिस्टम को लेकर उठे गंभीर सवालों के बाद बहुत से लोग मानते हैं कि ऐसा होना चाहिए.

धर्मेंद्र प्रधान का मामला

धर्मेंद्र प्रधान को अब अगर हटाया भी जाता है, तो क्या यह सिर्फ इसलिए होगा कि सरकार ने बदलाव का फैसला किया है? या फिर यह तब होना चाहिए था, जब जनता जवाबदेही की मांग कर रही थी? नैतितकता के लिहाज से देखें, तो दूसरा विकल्प ज्यादा बेहतर है. यह भी जगजाहिर है कि सियासी फैसले नैतिकता नहीं, विचारधारा और राजनीतिक सुविधा से तय होते हैं.

NEET अभ्यर्थी जब सड़कों पर उतरे, सोशल मीडिया पर कैंपेन छेड़ दिया और टीवी स्टूडियो से धांधली पर जवाब की मांग उठी, धर्मेंद्र प्रधान को तभी शिक्षा मंत्री की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए थी. सीबीएसई के छात्रों ने जब मूल्यांकन के सिस्टम से भ्रम और मानसिक तनाव की बात कही, उनको जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी. किसी मंत्री की जवाबदेही सार्थक तभी होती है, जब वह जनता के आक्रोश के प्रति हो न कि राजनीतिक सुविधा के लिए. 

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अब अगर महीनों बाद कैबिनेट फेरबदल के दौरान धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आता भी है, तो वह जवाबदेही नहीं बल्कि जनता के प्रति अनादर है. जवाबदेही जब देर से आती है, नैतिक महत्व समाप्त हो जाता है. ऐसे में लोकतंत्र का लोक यानी नागरिक समाज लोकतंत्र में सहभागी नहीं, दर्शक बनकर रह जाते हैं. हालांकि, अब इसे लेकर डिबेट का कोई मतलब नहीं रह गया है.

धर्मेंद्र प्रधान की कैबिनेट से छुट्टी तभी हो जानी चाहिए थी, जब न तो विपक्ष ने उनका इस्तीफा मांगा था और ना ही जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने ही कोई पहुंचा था. उनकी विफलता साफ थी और सवाल जनता ने उठाए थे. लोकतंत्र के मूल सिद्धांत भी जब निरपेक्ष नहीं रह जाएं, तब यह केवल किसी एक मंत्री की विफलता नहीं होती. यह उन पलों का ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाता है जब लोकतंत्र में 'जनार्दन' जनता अपनी भूमिका निभाने में विफल हो जाए.

मोहन यादव का मामला

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगीं. इनमें मोहन यादव को देश में चीता संरक्षण के सबसे प्रमुख चेहरे के तौर पर पेश किया गया. ये होर्डिंग्स लगाए जाने से ठीक पहले एक प्रमुख समाचार पत्र ने मोहन यादव के कथित भ्रष्टाचार से जुड़ी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट में मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे, उनके परिवार से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के उज्जैन और इसके आसपास करीब 137 भूखंड खरीदने की बात थी.

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मुख्यमंत्री पर लगे इन आरोपों को लेकर निष्पक्ष और व्यापक जांच होनी चाहिए थी, लेकिन इसकी बजाय उनकी पार्टी बीजेपी ने इन्हें तुरंत खारिज कर दिया. सोशल मीडिया पर भी चर्चा जांच की जगह इस बात पर शिफ्ट हो गई कि यह मध्य प्रदेश के किसी नाराज नेता की ओर से प्रायोजित 'हिट जॉब' है. आरोप सही हैं या अनर्गल, सबसे महत्वपूर्ण यह सवाल पक्षपातपूर्ण राजनीति की दरारों में कहीं खो गया.

जिस समाचार पत्र ने यह रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उसने कई फॉलोअप रिपोर्ट भी प्रकाशित किए लेकिन यह खबर पहले पन्ने से अंदर पहुंच गई. धीरे-धीरे यह खबर विमर्श से ही गायब हो गई. समाचार साइकल आगे बढ़ गया, लेकिन संस्थाएं नहीं. इस रिपोर्ट का कोई असर नहीं दिखा. न कोई जांच हुई, ना किसी की जवाबदेही तय हुई और ना ही राजनीतिक जिम्मेदारी की मांग ही उठी.

यह केवल एक खबर के गायब होने की कहानी नहीं, यह लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक पत्रकारिता की जवाबदेही तय कराने और प्रभाव पैदा करने की क्षमता की विफलता का दस्तावेज है. भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग पर होने वाली तमाम बहसें या नागरिक समाज की मजबूती को लेकर किए जाने वाले अकादमिक आकलन तब तक अर्थहीन हैं, जब तक लोकतंत्र की ये दो बुनियादी कसौटियां विफल होती रहेंगी.

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एक स्वतंत्र प्रेस तभी सार्थक है, जब उसकी रिपोर्टिंग से वास्तविक प्रभाव पड़े. एक स्वस्थ नागरिक समाज की मौजूदगी तभी मानी जाएगी, जब जनता के गुस्से को केवल सुना ही नहीं जाएगा, बल्कि उसके आधार पर कार्रवाई भी की जाएगी.

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