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क्या क्षेत्रीय दलों की आइडियोलॉजी में ही लोचा है? TMC और AAP उसी की कीमत चुका रहे हैं!

देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की विचारधारा पर राहुल गांधी हमलावर देखे गए हैं. राहुल गांधी तो मानते ही नहीं कि क्षेत्रीय दलों के पास कोई विचारधारा भी होती है. टीडीपी नेता नारा लोकेश का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस और AAP जैसे क्षेत्रीय दलों का सत्ता पाने के बाद विचारधारा की परवाह न करना, उनको भारी पड़ रहा है.

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तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)

ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे फिलहाल एक जैसे संकट से जूझ रहे हैं. कुछ दिन पहले अरविंद केजरीवाल को भी करीब करीब वैसा ही झटका लगा था. ऐसे ही झटके पहले शरद पवार और चिराग पासवान को भी लगे थे. चिराग पासवान तो कुछ समय बाद उबर भी गए, लेकिन बाकियों का बहुत बुरा हाल है, और संकट से जूझ रहे नेताओं को उबरने का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है. 

टीडीपी नेता और चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश ने तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के अपनी आइडियोलॉजी से समझौते को बर्बादी का कारण बताया है. क्षेत्रीय दलों की आइडियोलॉजी पर नारा लोकेश की राय कांग्रेस नेता राहुल गांधी से बिल्कुल अलग है. नारा लोकेश का कहना है कि सत्ता में आने के बाद विचारधारा छोड़ देने के कारण ही तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दलों को मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.

आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) भी क्षेत्रीय दल ही है, और 2019 आम आदमी पार्टी की तरह अपने दो तिहाई राज्यसभा सांसदों को गंवाने का दर्द झेला है. और, संकट से उबरने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने भी आखिरकार चिराग पासवान वाला ही रास्ता अख्तियार किया.

विचारधारा और सत्ता की राजनीति

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2018 में आंध्र प्रदेश के लिए स्पेशल स्टेटस के मुद्दे पर चंद्रबाबू नायडू एनडीए से अलग हो गए थे. और, साल भर बाद टीडीपी के 6 में से 4 सांसद बीजेपी में शामिल हो गए थे. 2019 के आम चुनाव के दौरान चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस के साथ मिलकर विपक्ष को एकजुट करने की जोरदार कोशिश भी की थी, लेकिन राहुल गांधी और ममता बनर्जी के आपसी टकराव के कारण थक हार कर बैठ गए. बाद में, 2024 के चुनाव से पहले बीजेपी से हाथ मिला लिए, और चिराग पासवान की ही तरह सत्ता की राजनीति में वापसी हो गई. यह बात अलग है कि दोनों की बर्बादी की वजह भी बीजेपी ही थी. 

टीडीपी के कार्यकारी अध्यक्ष नारा लोकेश मानते हैं कि उनकी पार्टी ने भी बहुत राजनीतिक उतार-चढ़ाव झेले, लेकिन उबरने में विचारधारा ही काम आई. नारा लोकेश कहते हैं, टीडीपी मुश्किलों से इसलिए उबर पाई क्योंकि जीत और हार दोनों ही परिस्थितियों में अपनी विचारधारा के साथ साथ कार्यकर्ताओं से जुड़ाव कायम रखा.

आंध्र प्रदेश सरकार में आईटी मंत्री नारा लोकेश ऐसी धारणाओं को खारिज करते हैं, जिनमें बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल क्षेत्रीय दलों के बर्बाद हो जाने के दावे किए जाते हैं. नारा लोकेश का कहना है, गठबंधन अपने सहयोगी दलों को अपनी राय रखने का पूरा मौका देता है. और, नीतिगत मामलों पर मतभेद होने पर उनकी चर्चा एनडीए के भीतर की जाती है. उनका कहना है, एनडीए को हमारा समर्थन हमेशा बिना किसी शर्त के रहा है... हमारे नेता और टीडीपी का मानना है कि भारत को स्थिर नेतृत्व की जरूरत है. 

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टीडीपी नेता का मानना है कि टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. नारा लोकेश का मानना है कि पश्चिम बंगाल में एक दशक से ज्यादा सत्ता में रहने के कारण तृणमूल कांग्रेस नेताओं में 'आत्मसंतोष' आ गया था, और वे बेफिक्र और बेपरवाह हो गए थे. 

नारा लोकेश का कहना है, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी, दोनों ही उन सिद्धांतों से दूर हो गई हैं जिनके आधार पर उनकी स्थापना हुई थी. कहते हैं, जब मैं अपने आसपास हो रही घटनाओं को देखता हूं, तो संदेश बिल्कुल साफ होता है कि हमें अपनी विचारधारा पर कायम रहना चाहिए. क्षेत्रीय पार्टी के रूप में हमें अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़ा रहना चाहिए और उस प्रतिबद्धता को और मजबूत करना चाहिए, जो राजनीतिक दल चुनाव जीतने और बार-बार सत्ता में आने के बाद अपनी विचारधारा से भटक जाते हैं, और उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.

क्षेत्रीय दलों की राजनीति और विचारधारा

कांग्रेस नेता राहुल गांधी विचारधारा के मामले में क्षेत्रीय दलों पर काफी हमलावर देखे जाते हैं. क्षेत्रीय दलों को लेकर नारा लोकेश और राहुल गांधी का नजरिया बिल्कुल अलग दिखाई देता है. नारा लोकेश की राय में क्षेत्रीय दलों के पास भी विचारधारा होती है, लेकिन राहुल गांधी का कहना है कि क्षेत्रीय दलों के पास अपनी कोई विचारधारा नहीं होती. राहुल गांधी की बातों से लगता है कि सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी ही विचारधारा की राजनीति करते हैं, बाकी कोई क्षेत्रीय दल नहीं. राहुल गांधी बार बार यही दोहराते हैं कि कांग्रेस के पास ही विचारधारा है, और सिर्फ कांग्रेस ही बीजेपी की विचारधारा से लड़ सकती है. यह बात अलग है बगैर क्षेत्रीय दलों की मदद से बीजेपी से लड़ पाना कांग्रेस के लिए भी हद से ज्यादा मुश्किल हो गया है. 

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भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी को समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के प्रति काफी हमलावर देखा गया था. लेकिन, 2024 के आम चुनाव में अगर अमेठी में कांग्रेस की वापसी हुई, और रायबरेली का गढ़ कायम रहा, तो समाजवादी पार्टी की ही बड़ी भूमिका थी, मानना पड़ेगा. भारत जोड़ो यात्रा से पहले राहुल गांधी ने कांग्रेस के उदयपुर चिंतन शिविर में जब राहुल गांधी ने क्षेत्रीय दलों को विचारधारा के बहाने निशाना बनाया तो जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी. 

राहुल गांधी के बारे में नारा लोकेश कहते हैं, राहुल गांधी की एक बात मुझे पसंद है कि उन्होंने पैदल यात्रा की... मैं भी पदयात्रा कर चुका हूं, इसलिए मैं इसे समझता हूं. लेकिन, सिर्फ चलना ही काफी नहीं है... उस दौरान मिली सीख को अपने भीतर उतारना भी जरूरी है. जब भी मैं किसी दुविधा में होता हूं, तो अपनी पदयात्रा को याद करता हूं.

राहुल गांधी ने कहा था, क्षेत्रीय दलों की अपनी जगह है, लेकिन वे बीजेपी को नहीं हरा सकते... क्योंकि उनके पास विचारधारा का अभाव है.

1. आम आदमी पार्टी: अरविंद केजरीवाल आंदोलन के जरिए राजनीति में आए. राजनीति में आने के लिए आम आदमी पार्टी बनाई. अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए पहले आंदोलन और फिर राजनीति का रास्ता अख्तियार किया. 2013 में पहली बार दिल्ली में सरकार बनाई, और 2025 की चुनावी हार के बाद सत्ता से बाहर हो गए. 

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अरविंद केजरीवाल को पहली बार जीत कांग्रेस शासन में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ मिली थी, और चुनाव बाद आम आदमी पार्टी की पहली सरकार ही कांग्रेस के सपोर्ट से बन पाई. आरोप तो ऐसे भी लगते रहे हैं कि आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में आरएसएस का हाथ रहा है. 

डेढ़ महीने बाद ही अरविंद केजरीवाल लोकपाल कानून बना पाने में असमर्थ बताते हुए इस्तीफा दे दिए. लेकिन, 2024 में भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने के बाद भी अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने रहे, इस्तीफा नहीं दिया. आम आदमी पार्टी की स्थापना में शामिल कुछ लोगों के लेफ्ट आइडियोलॉजी प्रभावित होने की बातें भी होती हैं, लेकिन यह भी देखा जा चुका है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को भूलकर अरविंद केजरीवाल चुनावों में रुपये की कीमत बढ़ाने के लिए नोटों पर लक्ष्मी-गणेश की तस्वीरें लगाए जाने की बात करते हैं. 

2. तृणमूल कांग्रेस: टीएमसी तो कांग्रेस से ही निकली थी, लेकिन उसका सारा जोर वोट बैंक पर फोकस रहा है. ममता बनर्जी राम मंदिर उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करती हैं, प्रयागराज महाकुंभ को 'मृत्युकुंभ' बताती हैं, तो मुख्यमंत्री रहते पश्चिम बंगाल में 250 करोड़ रुपये की लागत से जगन्नाथ मंदिर भी बनवा देती हैं. बंगाली संस्कृति के चलते ही सही दुर्गापूजा में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं, कालीबाड़ी और बेलूर मठ भी जाती रही हैं. 

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कांग्रेस ममता बनर्जी की विचारधारा को यह बोलकर भी खारिज कर देती है कि एनडीए में उनका बीजेपी के साथ गठबंधन रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार में ममता बनर्जी रेल मंत्री रह चुकी हैं. और, बाद में कांग्रेस के साथ भी रहीं. पश्चिम बंगाल की लड़ाई भी तो ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ ही लड़ी थी. 

क्या नारा लोकेश को लग रहा है कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ने के बाद भी कांग्रेस की विचारधारा को अपनाए रखा था, लेकिन बाद में सत्ता की खातिर सब कुछ छोड़कर वोट बैंक की राजनीति में लग गईं? और, बर्बादी की वजह तृणमूल कांग्रेस का असली मकसद से भटक जाना है?

3. समाजवादी पार्टी: यूपी में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी हाल फिलहाल पीडीए की राजनीति कर रही है. कुछ दिन पहले मालूम चला कि मायावती की तरह अब समाजवादी पार्टी की नजर भी ब्राह्मण वोट बैंक पर है. अखिलेश यादव और उनके साथी समाजवादी होने का दावा करते हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि उनकी राजनीति भी जाति विशेष के वोट बैंक तक सीमित नजर आ रही है.

अक्सर ऐसी चर्चा होती है कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव तो पिछड़ों के नेता हुआ करते थे, लेकिन अखिलेश यादव पर तो सिर्फ यादव समाज के नेता होने जैसे आरोप लगने लगे हैं. वैसे राहुल गांधी का दावा अपनी जगह है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सच तो यही है कि बीजेपी से समाजवादी पार्टी ही लड़ रही है. 

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4. शिवसेना (यूबीटी): क्षेत्रीय दलों की सत्ता की राजनीति और आइडियोलॉजी की बात करें, तो नारा लोकेश की बातें उद्धव ठाकरे की राजनीति में ज्यादा फिट बैठती हैं. उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्व वाली आइडियोलॉजी छोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाराष्ट्र में सरकार बनाई, और बीजेपी सहित तमाम राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर आ गए. नतीजा यह हुआ कि सत्ता तो सत्ता, संगठन भी गंवा बैठे. और, बर्बादी का आलम यह है कि चार साल बाद भी उद्धव ठाकरे को पहले जैसा ही झटका लगा है.

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