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मांझी, राजभर, मीणा, निषाद को सुनिए… ये है अगड़े-दलितों के खिलाफ ‘वंचित-दलितों’ की लामबंदी

राजस्थान में किरोड़ी लाल मीणा के आक्रामक बयानों के बाद जीतन राम मांझी और ओपी राजभर की मांगों ने आरक्षण व्यवस्था के भीतर एक नई जंग छेड़ दी है. सुप्रीम कोर्ट के देविंदर सिंह फैसले से उपजे इस विवाद पर भाजपा और कांग्रेस की साधी चुप्पी के बीच, अब सवाल उठ रहा है कि क्या आरक्षण का लाभार्थी तबका ही वंचित दलितों का हक रोकने की नई दीवार बन गया है?

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संविधान में जिस आरक्षण का प्रावधान हुआ था, अब बहस उसके आगे तक पहुंच गई है.
संविधान में जिस आरक्षण का प्रावधान हुआ था, अब बहस उसके आगे तक पहुंच गई है.

राजस्थान की राजनीति के कद्दावर नेता और कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के एक बयान से आरक्षण में क्रीमी लेयर और सब-कोटा सिस्टम की बहस को आसानी से समझा जा सकता है. राजस्थान में मीणा समुदाय को जनजाति का दर्जा प्राप्त है, लेकिन दौसा के नांगल प्यारीवास स्थित 'मीणा हाईकोर्ट' के मंच से हुंकार भरते हुए किरोड़ी लाल मीणा ने साफ लहजे में कहा कि “क्रीमीलेयर की बात पर मैं सुप्रीम कोर्ट की भावना के साथ हूं. मैं डॉक्टर भी बन गया. मेरा भाई IRS और IAS भी बन गया. मैं मंत्री भी बन गया. लेकिन मेरे गांव में एक व्यक्ति करीब 30 साल से पहाड़ खोदकर मजदूरी करके पेट पाल रहा है. उसके बेटे भी उसी घर में, उसी काम में लगे हैं. वो आगे नहीं बढ़ पाया. अब ऐसे वंचित व्यक्ति को भी मौका मिलना चाहिए.”

किरोड़ी लाल मीणा अकेले नहीं हैं. इस मुद्दे पर बिहार से हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी और उत्तर प्रदेश से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश (ओपी) राजभर के सुर भी बहुत मुखर हैं. मांझी लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि आरक्षण का बड़ा हिस्सा केवल दलित समाज की कुछ चुनिंदा और साधन संपन्न जातियां ही डकार रही हैं, जबकि मुसहर और भुइयां जैसी अत्यंत पिछड़ी जातियां आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही हैं. वहीं ओपी राजभर का कहना है कि चाहे ओबीसी कोटा हो या एससी आरक्षण, जब तक इसका त्रिस्तरीय बंटवारा करके 'अति-पिछड़ों' और 'अत्यंत पिछड़ों' को अलग से हिस्सा नहीं दिया जाएगा, तब तक अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास मुमकिन नहीं है.

आरक्षण की इस बहस को आगे बढ़ाते हुए यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद कहते हैं कि आरक्षण की व्यवस्था कम्युनिटी के आधार पर की गई थी, ना कि आर्थिक आधार पर. लेकिन, बाद में देखा गया कि पढ़े-लिखों को रोजगार नहीं मिल पा रहा था. और अनपढ़ के लिए सीट रिजर्व थी. अब जरूरी है कि बदलते समय के साथ जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर सांसद, विधायक और बड़े पद पर पहुंच गए हैं, वे स्वेच्छा से आरक्षण को छोड़ दें.

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सत्ताधारी एनडीए के ही एक अन्य सदस्य लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया चिराग पासवान कह चुके हैं कि दलितों में किसी भी तरह के बंटवारे का वे विरोध करेंगे. आरक्षण की व्यवस्था संविधान में सामाजिक आधार पर की गई थी, ना कि आर्थिक या कोई अन्य आधार के कारण. हालांकि, बाद में पासवान ने यह भी जोड़ा कि मैं जहां अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अधिकारों और हितों का संरक्षण करूंगा, तो वहीं सामान्य वर्ग एवं ऊंची जाति से आने वाले लोगों की आवाज को भी मजबूती से उठाऊंगा. इसी बीच उन्हीं की पार्टी की यूपी इकाई के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य महेश कुमार पांडेय ने ये कहते इस्तीफा दे दिया कि यूजीसी रेगुलेशंस और सवर्णों के खिलाफ बयानबाजी से वे सहमत नहीं हैं.

जमीनी हकीकत

इन नेताओं के बयान उस जमीनी हकीकत पर मुहर लगाते हैं जो सालों से अलग-अलग सर्वे और शोध रिपोर्टों में सामने आती रही है. केंद्र सरकार द्वारा गठित रोहिणी आयोग की शुरुआती केस स्टडीज और सोशल स्टडीज़ से यह कड़वी बात खुलकर सामने आई कि रिजर्व कैटेगरी में शामिल कुल जातियों में से मात्र 10 से 15 प्रतिशत दबंग और जागरूक जातियां ही 80 प्रतिशत से ज्यादा सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों के दाखिलों पर कब्जा जमाए बैठी हैं. देश की लगभग 60 से 65 प्रतिशत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी आज भी ऐसी है, जिसकी एक पीढ़ी भी अब तक आरक्षण का सीधा फायदा नहीं उठा सकी है.

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सुप्रीम कोर्ट की पैरवी

इसी असंतुलन को दुरुस्त करने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया. 1 अगस्त 2024 को 'पंजाब सरकार बनाम देविंदर सिंह' के लैंडमार्क केस में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 जजों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से एक बड़ा फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि राज्यों के पास यह अधिकार है कि वे एससी/एसटी वर्ग के भीतर 'सब-कैटेगरी' बना सकें ताकि सबसे अधिक पिछड़े और वंचित समूहों को अलग से कोटा दिया जा सके. साथ ही अदालत ने एससी/एसटी के भीतर 'क्रीमी लेयर' को पहचानकर उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करने की भी पुरजोर वकालत की.

दो बड़ी पार्टियों की चुप्पी

लेकिन इस फैसले के बाद देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों BJP और कांग्रेस ने बेहद सतर्क और सावधानी भरी चुप्पी साध ली है. दोनों ही पार्टियां इस मुद्दे पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं, क्योंकि कोई भी दल दलित-आदिवासी समुदाय को दो फाड़ करने या उनके किसी एक बड़े तबके को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता. अगर भाजपा या कांग्रेस सब-कोटा और क्रीमी लेयर का खुला समर्थन करती हैं, तो उनसे दलितों का वह दबंग और संगठित वर्ग छिटक जाएगा जो क्रीमी लेयर का विरोध कर रहा है. वहीं अगर वे इसका विरोध करती हैं, तो अति-दलित और अति-पिछड़ा वोट बैंक उनके हाथ से निकल जाएगा. यही वजह है कि दोनों पार्टियां राजनीतिक नुकसान के डर से चुप्पी की आड़ ले रही हैं.

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और, एक विरोधाभास

इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति को एक अजीबोगरीब और विरोधाभासी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. जब देश के संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया जा रहा था, तब इस व्यवस्था के विरोधी एक ख़ास सवर्ण तबके ने यह दलील दी थी कि 'आरक्षण हिंदू समुदाय को जातियों में बांटने की खतरनाक कोशिश है.' उस समय सामाजिक विश्लेषकों ने साफ कहा था कि यह सवर्ण तबका समाज में अपना पुराना वर्चस्व और एकाधिकार बनाए रखने के लिए ही 'एकजुटता' का यह मुखौटा पहन रहा है.

लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट और दिलचस्प नजर आ रही है. आज जब सुप्रीम कोर्ट और मांझी-राजभर जैसे नेता आरक्षण के भीतर 'सब-कोटा' देकर उन दलितों तक हक पहुंचाने की बात कर रहे हैं जिन्हें 75 सालों में कुछ नहीं मिला, तो आरक्षण का ही एक 'लाभार्थी तबका' (जो आरक्षण का फायदा उठाकर सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका है) इसे 'दलितों को बांटने की साजिश' बता रहा है.

सवाल यह है कि जो दलील कल तक वर्चस्ववादी सवर्ण तबका अपनी सत्ता बचाने के लिए देता था, वही दलील आज आरक्षण का फायदा पा चुका दलित तबका अपने ही वंचित भाइयों का हक रोकने के लिए दे रहा है- अब इसे आखिर क्या कहा जाएगा? क्या यह सामाजिक न्याय की जीत है या फिर आरक्षण के भीतर ही उपजी एक नई एलीट क्लास की अपनी सहूलियत?

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