बीस साल बाद मायावती फिर से पुराने अंदाज में बीएसपी को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रही हैं. फिर से वही दलित-ब्राह्मण गठजोड़. बिल्कुल वही गठजोड़ जिसकी यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए लिखी जाने वाली कामयाबी की मिसाल दी जाती रही है.
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ भी सत्ता में वापसी की कोशिश की थी, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला. 2012 और 2017 में तो सफलता नहीं ही मिली, 2022 में बीएसपी महज 1 सीट पर सिमट कर रह गई.
सोशल इंजीनियरिंग की तरह ही मायावती का सपा-बसपा चुनावी गठबंधन भी सफल रहा. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी जीरो बैलेंस पर पहुंच चुकी थी. 2019 के आम चुनाव में मायावती ने लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड को किनारे रखते हुए अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाया, लेकिन चुनाव बाद वो गठबंधन भी तोड़ दिया. बीएसपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में 10 सांसद चुने गए थे.
ऐसे में जबकि समाजवादी पार्टी के साथ साथ कांग्रेस भी ब्राह्मण वोटर को अपनी तरफ खींचने के लिए प्रयासरत है, मायावती अपना ही कारगर नुस्खा फिर से आजमाने जा रही हैं - और फिर से बीस साल पुरानी कामयाबी दोहराए जाने की संभावना जता रही हैं.
2027 के लिए बीएसपी की तैयारी
मायावती के निशाने पर पहले तो सिर्फ कांग्रेस ही हुआ करती थी, लेकिन 2019 के सपा-बसपा गठबंधन टूटने के बाद से समाजवादी पार्टी दुश्मन नंबर 1 बन चुकी है. सोशल साइट X पर अपना पुराना एक्सपेरिमेंट दोहराए जाने की बात कंफर्म करते हुए मायावती ने लिखा है, बीएसपी के ब्राह्मणों को प्राथमिकता दिए जाने की बात से 'समाजवादी पार्टी में उनकी नींद उड़ा देने वाली बेचैनी देखने को मिल रही है.'
2007 में दलित और ब्राह्मण वोटर के गठजोड़ से मायावती ने बीएसपी की अकेले सरकार बनाई थी. उसी बात को आगे बढ़ाते हुए मायावती ने लिखा है, 'जो कि सन 2007 की तरह ब्राह्मण समाज के योगदान से बीएसपी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जैसा ही इस बार के आगामी चुनाव परिणाम के रिपीट होने की संभावना के तहत स्वाभाविक ही प्रतीत होता है.'
मायावती का दावा है कि बीएसपी के अलावा यूपी में ब्राह्मण समाज का हितैषी कोई नहीं है. मायावती का कहना है, 'यूपी जैसे विशाल आबादी वाले प्रदेश में अपरकास्ट में से खासकर ब्राह्मण समाज का हित बीएसपी में ही सुरक्षित है. अपनी 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धान्त, नीयत और नीति को बहुजन समाज पार्टी ने पहले पार्टी स्तर पर अमल करके, और फिर सरकार बनने पर भी उन्हें भरपूर आदर-सम्मान के साथ-साथ, उन्हें हर स्तर पर पूरी-पूरी भागीदारी देकर यह साबित भी कर दिया है, जबकि दूसरी पार्टियों की सरकारों में इस वर्ग के लोग अपने आपको काफी उपेक्षित, असुरक्षित और ठगा हुआ भी महसूस कर रहे हैं.
यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने लगे हाथ चुनावी वादा भी कर दिया है. कहती हैं, बीएसपी की सरकार बनने पर उन्हें (ब्राह्मण समाज) पहले की तरह ही हर स्तर पर भरपूर आदर-सम्मान जरूर दिया जाएगा, जो इनकी वास्तविक चिंता और दूसरी पार्टियों से मुह मोड़ने का कारण है.
ब्राह्मण के साथ साथ मायावती ने सवर्ण समाज से कहा है, अपरकास्ट में से क्षत्रिय, वैश्य आदि और अन्य समाज के लोगों को भी बीएसपी से जोड़ने की तैयारी है. 'जिसकी जितनी तैयारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के आधार पर चुनाव में उम्मीदवार भी जरूर बनाया जाएगा, जिसकी तैयारी हर स्तर पर लगातार जारी है.
ब्राह्मण समाज पर मेहरबान मायावती
मायावती काफी दिनों ब्राह्मण समाज के प्रति फिक्र जता रही हैं. वैसे ऐसी फिक्र 2022 के आम चुनाव से पहले भी महसूस की गई थी. जब समाजवादी पार्टी में भगवान परशुराम की मूर्ति बनवाने की प्रतियोगिता जैसी देखी गई थी. परशुराम की मूर्ति लगाए जाने को लेकर समाजवादी पार्टी के नेताओं के बयानों पर रिएक्ट करते हुए मायावती ने कहा था, 'अगर समाजवादी पार्टी को परशुराम की प्रतिमा लगानी ही थी, तो अपने शासन काल के दौरान ही लगा देते. बसपा किसी भी मामले में सपा की तरह कहती नहीं है, करके भी दिखाती है. बसपा की सरकार बनने पर सपा की तुलना में परशुरामजी की भव्य मूर्ति लगाई जाएगी.'
1. जनवरी, 2026 में अपने जन्मदिन के मौके पर मायावती ने यूपी के लोगों को याद दिलाने की कोशिश की कि बीएसपी की सरकारों के दौरान ब्राह्मण समाज को राजनीति में कितनी अहमियत और प्रतिनिधित्व मिला करता था. मायावती का यह भी आरोप था कि मौजूदा बीजेपी शासन में भी यूपी में ब्राह्मण समाज की उपेक्षा हो रही है.
2. मई, 2026 में लखनऊ में एक ब्राह्मण युवा बीजेपी नेता पर जानलेवा हमले का मामला उठाते हुए मायावती ने कहा था, इस घटना से हर तरफ एक बार फिर कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं. साथ ही, इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गयी है कि यूपी में ब्राह्मण समाज केवल उपेक्षित ही नहीं, बल्कि काफी असुरक्षित भी है.
3. विभिन्न राजनीतिक दलों के ब्राह्मण विधायकों की चिंता का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा था, उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा ही नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के ब्राह्मण विधायक भी लखनऊ में एक साथ आए थे, और समुदाय की उपेक्षा तथा उनके खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर चिंता जताई थी.
किसके साथ जाएगा यूपी का ब्राह्मण वोटर
2025 में एक बार लखनऊ में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर हड़कंप मच गया था. यहां तक कि यूपी बीजेपी अध्यक्ष को दोबारा वैसा हरगिज न होने, और अनुशासन बनाए रखने जैसी हिदायत भी जारी करनी पड़ी थी. और, ब्राह्मण विधायकों की बैठक के होस्ट को भी सफाई देनी पड़ी थी.
हाल ही में, राहुल गांधी के जन्मदिन के मौके पर यूपी राहुल गांधी के एक पोस्टर की भी खासी चर्चा रही. बनारस में यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का एक ऐसा पोस्टर बनाया था, जिसमें उनके एक हाथ में संविधान की कॉपी और दूसरे हाथ में फरसा देखने को मिला था. असल में, यह भी ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश मानी गई.
जिस तरह से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी आने वाले यूपी चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मायावती का दांव थोड़ा अलग लगता है. अखिलेश यादव 2024 के चुनाव में पीडीए फॉर्मूले का सफल प्रयोग कर चुके हैं, और राहुल गांधी ओबीसी को हक दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, बीएसपी ने अपना अलग दांव खेलने की तैयारी की है.
देश में जाति जनगणना भी तो पिछड़े वर्ग के लोगों को ही ध्यान में रखकर कराई जा रही है. जाहिर है, बीजेपी का ध्यान भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की तरह पिछड़े वोटर पर है. ऐसे में मायावती अपने खास दलित वोटर के साथ ब्राह्मण वर्ग को जोड़ने में जुट गई हैं - 2007 की सफलता भले ही असंभव लग रही हो, लेकिन संभावनाओं को खारिज भी तो नहीं किया जा सकता.