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लरक आइलैंड: होर्मुज स्ट्रेट का 'किलर वॉच टावर', जहां अटकी है दुनिया की सांस

ईरान युद्ध के दौरान भले सबसे ज्यादा चर्चित खार्ग आइलैंड रहा हो, जहां से ईरान का 90 फीसदी तेल निर्यात होता है. लेकिन, ईरानी फौजी तैयारी और दुनिया की तेल सप्लाय लाइन पर नजर रखने वालों से पूछिए, तो बताया जाएगा कि असली गले की हड्डी होर्मुज स्ट्रेट के सबसे संकरे इलाके पर मौजूद एक छोटा सा टापू- लरक आइलैंड है. जहां से गुजरने वाले ऑयल और गैस टैंकरों पर लगातार हमले हो रहे हैं.

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होर्मुज स्ट्रेट के सबसे संकरे इलाके में मौजूद लरक आइलैंड अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया की तेल सप्लाय के लिए खतरा बन गया है. (फोटो- ITG/AI generated)
होर्मुज स्ट्रेट के सबसे संकरे इलाके में मौजूद लरक आइलैंड अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया की तेल सप्लाय के लिए खतरा बन गया है. (फोटो- ITG/AI generated)

दुनिया के नक्शे पर फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को देखें, तो यह एक संकरी नली जैसी दिखती है. इसी नली के मुहाने पर बसा है 50 वर्ग किलोमीटर का एक छोटा सा टापू- लरक आइलैंड. यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी की गर्दन पर रखा एक चाकू है. ईरान के कब्जे वाला यह द्वीप आज दुनिया के सबसे खतरनाक 'चोक पॉइंट' के रूप में उभरा है. यहां से गुजरने वाले हर जहाज को पता है कि उसकी जिंदगी और मौत का फैसला इसी द्वीप की पहाड़ियों में छिपी ईरानी मिसाइलों के हाथ में है. पिछले एक हफ्ते में कई जहाजों पर यहां से हमले हुए हैं.

अंडे के आकार वाला लरक आइलैंड लगभग दस किमी लंबा और 5 किमी चौड़ा है. आकार भले ही छोटा हो, लेकिन इसका कद अमेरिका जैसी ताकत के लिए पहेली बना हुआ है. वो अमेरिका जिसने पूरे ईरान पर अपना फौजी दबदबा कायम कर लिया है, लेकिन इस आईलैंड की मिस्ट्री सुलझा पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा है. इस आईलैंड पर लावा से उभरी पहाड़ियां IRGC फौजियों के लिए इसे आदर्श बनाती हैं. सिवाय कुछ फौजी ठिकानों, यह आईलैंड लगभग निर्जन ही है. इसकी लोकेशन ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. क्योंकि इसी के पास 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) का सबसे संकरा समुद्री मार्ग मौजूद है.

लरक पर IRGC का 'कंट्रोल रूम' और अमेरिकी नेवी पर लगाम

ईरान ने लरक आइलैंड को एक वॉच टावर की तरह इस्तेमाल किया है. यहां से IRGC हर उस हरकत पर नजर रखती है जो खाड़ी में होती है.ईरान की 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने यहां जमीन से लेकर पाताल तक अपनी पकड़ मजबूत कर रखी है.

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अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी: सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि ईरान ने यहां की पहाड़ियों को काटकर विशाल बंकर बनाए हैं. मिसाइलों का जखीरा है, जो परमाणु हमले को भी झेल सकता है.

एंटी-शिप मिसाइलें: यहां ऐसी मिसाइलें तैनात हैं जो 300 किलोमीटर दूर चल रहे जहाज को भी ढूंढकर तबाह कर सकती हैं.

फास्ट अटैक नावें: लरक के तटों पर ईरान ने सैकड़ों छोटी और तेज रफ्तार नावें (Speedboats) तैनात कर रखी हैं. ये नावें रडार की पकड़ में नहीं आतीं और 'मधुमक्खियों के झुंड' की तरह बड़े जहाजों पर हमला करती हैं.

राडार और जैमर्स: यहां से ईरान पूरे फारस की खाड़ी के सिग्नल जाम कर सकता है, जिससे दुश्मन के जहाज रास्ता भटक सकते हैं.

शिपिंग लाइफलाइन पर कब्जा:

दुनिया का करीब 20 से 30 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट के जिस संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है. उसी पर मौजूद है लरक आइलैंड. शिपिंग गलियारे के यह इतने करीब है कि आईलैंड के वॉच टावर से एक साधारण दूरबीन से यहां से गुजरने वाले जहाजों के नाम पढ़े जा सकते हैं. ईरान जानता है कि इस द्वीप से रास्ता ब्लॉक कर दे, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो जाएगी. फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी और शेयर बाजार ढह जाएंगे. यही वजह है कि अमेरिका जैसा सुपरपावर भी लरक की तरफ देखते हुए दस बार सोचता है. यह द्वीप एक ऐसे 'टोल गेट' की तरह काम करता है, जहां फीस पैसे में नहीं, बल्कि सामरिक समझौते के रूप में चुकानी पड़ती है.

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अमेरिकी नेवी के लिए सिरदर्द:

जब भी अमेरिकी नौसेना का कोई एयरक्राफ्ट कैरियर या जंगी जहाज बहरीन या दुबई की तरफ बढ़ता है, उसे लरक के पास से गुजरना पड़ता है. ईरान यहां से अपनी जंग शुरू करता है.

धमकी भरे रेडियो मैसेज: ईरानी नौसेना लरक से अमेरिकी जहाजों को चेतावनी देती है कि वे उनकी समुद्री सीमा से दूर रहें.

ड्रोन सर्विलांस: लरक से उड़ने वाले ईरानी ड्रोन 24 घंटे अमेरिकी जहाजों के ऊपर मंडराते रहते हैं.

नेवल ड्रिल: अक्सर ईरान लरक के आसपास लाइव फायरिंग की एक्सरसाइज करता है, ताकि अमेरिकी नेवी को डराया जा सके और उनके मूवमेंट की रफ्तार कम की जा सके.

खूनी इतिहास और जहाजों की कब्रगाह

लरक आइलैंड के आसपास का समंदर शांत दिखता है, लेकिन इसके नीचे जहाजों के कंकाल दबे हैं. यह इलाका दशकों से जंग का गवाह रहा है.

टैंकर वॉर (1980-1988): 

ईरान-इराक युद्ध के दौरान लरक आइलैंड 'जहाजों की कब्रगाह' बन गया था. उस समय ईरान ने यहां से गुजरने वाले हर उस जहाज को निशाना बनाया जो इराक की मदद कर रहा था.

अमेरिकी जहाज पर हमले का बदला ईरानी जहाज डुबोकर लियाः

1988 में कुवैत से लौट रहा अमेरिकी फ्रिगेट USS Samuel B. Roberts ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री माइन्स से टकरा गया. विस्फोट से जहाज में 15 फीट चौड़ा छेद हो गया. जैसे-तैसे जहाज को फारस की खाड़ी से निकालकर अमेरिका पहुंचाया गया. उसकी मरम्मत पर तब 90 मिलियन डॉलर खर्च आया था. पूरा इंजन रूम ही रिप्लेस करना पड़ा. अमेरिका ने इस हादसे का बदला चार दिन बाद ही ले लिया. लरक आईलैंड से 200 मीटर दूर ईरानी जंगी जहाज सहंद पर हमला करके उसे डुबो दिया गया.

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सीवाइज जायंट का डूबना:

14 मई 1988 को दुनिया का सबसे बड़ा जहाज 'सीवाइज जाइंट' (Seawise Giant) लरक आइलैंड के पास ही ईरानी मिसाइलों और इराकी हमलों की चपेट में आया था. यह जहाज इतना विशाल था कि इसे दोबारा बनाना नामुमकिन था.

कंटेनर जहाजों पर हमले: हाल के वर्षों में भी लरक के पास कई इजरायली और पश्चिमी देशों के कंटेनर जहाजों पर रहस्यमयी हमले हुए हैं. कभी जहाजों पर लिम्पेट माइन्स (Limpet Mines) चिपका दी जाती हैं, तो कभी आत्मघाती ड्रोन से हमला होता है.

बारूदी लरक के ढेर पर कब तक टिकेगी शांति?

आज लरक आइलैंड सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि एक युद्ध क्षेत्र है जो कभी भी सुलग सकता है. ईरान ने इसे अपनी 'अंतिम रक्षा पंक्ति' बना लिया है. अगर कभी ईरान और अमेरिका के बीच फिर सीधी जंग होती है, तो लरक आइलैंड ही वो जगह होगी जहां से पहली मिसाइल दागी जाएगी.

दुनिया की शिपिंग लाइफलाइन को इस 50 वर्ग किमी के टुकड़े ने बंधक बना रखा है. यह दुनिया को याद दिलाता है कि ताकत सिर्फ बड़े देशों के पास नहीं होती, बल्कि सही जगह पर सही हथियार तैनात करने वाले के पास होती है. फारस की खाड़ी का यह 'खूनी टोल गेट' आज भी अपनी पहाड़ियों में कई राज और हजारों मिसाइलें छिपाए बैठा है, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था का गला घोंटने के लिए काफी हैं.

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