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जाति न पूछो अपराधी की...

जमुई, बिहार में नाबालिग छात्रा और उसके साथी के साथ सार्वजनिक छेड़खानी का वीडियो वायरल होने के बाद आरोपियों की जाति को लेकर विवाद छिड़ गया है. पुलिस ने मुख्य आरोपी नंदन यादव को हाफ एनकाउंटर में मार गिराया और बाकी आरोपियों को गिरफ्तार किया. इस मामले के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातिगत विवाद सामने आ रहा है.

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जमुई कांड पर जातिगत विवाद शुरू हो गया है. (Photo- ITGD)
जमुई कांड पर जातिगत विवाद शुरू हो गया है. (Photo- ITGD)

बार-बार कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और अपराध की कोई जाति नहीं होती. कहने का मतलब सिर्फ इतना होता है कि अपराध व्यक्ति करता है, समुदाय नहीं. फिर भी बिहार के जमुई में नाबालिग छात्रा और उसके साथी छात्र के साथ सरेआम छेड़खानी की घटना का वीडियो वायरल होते ही चर्चा अपराध से हटकर आरोपियों की जाति पर आ गई.

पुलिस ने मुख्य आरोपी नंदन यादव का हाफ एनकाउंटर कर उसे और हरेराम यादव को गिरफ्तार किया. नामों के साथ यादव शब्द जुड़ते ही राजनीति तेज हो गई. यह बहस अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही. जाहिर है कि इसकी आंच उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी महसूस होने वाली है. 

घटना 19 सितंबर 2026 की शाम की है. दसवीं के छात्र-छात्रा कोचिंग के बाद बाइक से जा रहे थे. एक समूह ने उन्हें रोका और प्रताड़ित किया. वीडियो सोशल मीडिया पर फैलते ही बवाल मच गया. पुलिस ने पोक्सो और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं में मामला दर्ज किया.

5 आरोपी पकड़े गए, जिनमें कुछ नाबालिग भी हैं. पीड़िता के पिता ने कहा कि गिरफ्तारी काफी नहीं, न्याय चाहिए. यह सब सही है. सवाल यह है कि इसके बाद जाति की चर्चा सबसे ऊपर क्यों आ गई?

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जाति की चर्चा सबसे ऊपर क्यों?

भारतीय राजनीति में अपराध को जाति से जोड़कर वोट साधने की पुरानी रवायत रही है. बिहार में इस शर्मनाक घटना को सत्तारूढ़ पक्ष ने इसे लालू यादव और यादव राज से जोड़ने की कोशिश की है. जदयू नेताओं ने 2005 से पहले के बिहार की तुलना की. जबकि घटना वर्तमान एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई है. कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है. फिर भी आरोपियों की जाति सामने आते ही पुराने जंगल राज के नारे दोहराए जाने लगे.

किसी भी जाति के सभी लोग अपराधी नहीं हो सकती. यादव समुदाय बड़ा है. इसमें किसान, मजदूर, व्यवसायी और नौकरीपेशा लोग हैं. केंद्र में तीन से चार मिनिस्टर भी इसी जाति से हैं.यूपी और बिहार में भी कई मिनिस्टर इसी जाति से हैं.  दो या सात आरोपियों का नाम यादव होने से पूरी जाति अपराधी नहीं हो जाती. अपराध की दर किसी एक जाति तक सीमित नहीं है. बिहार में किशोर अपराध की समस्या व्यापक है. उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं के खिलाफ अपराध और कानून-व्यवस्था के मुद्दे समय-समय पर उठते रहते हैं. समस्या सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक है.

दरअसल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल दोनों का अपने-अपने राज्यों में संगठन का आधार यादव हैं. भारतीय जनता पार्टी को बिहार और यूपी में अगर सत्तारूढ़ रहना है तो यादव वोट को हासिल करना होगा. पर समाजवादी पार्टी और आरजेडी के रहते यह संभव नहीं दिखता. जाहिर है कि इसके लिए पार्टी दूसरा पैंतरा अपनाती है. गैर-यादव ओबीसी और अन्य समूहों को जोड़कर उसे यह यादव राज का भय दिखाने की कोशिश करना.

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यादव राज का भय!

यादव राज का भय इसलिए पैदा होता है क्योंकि राजनीतिक दल इसे व्यवस्थित तरीके से फैलाते हैं. बिहार में नब्बे के दशक की कुछ घटनाओं को पूरी जाति से जोड़ दिया जाता है. उसी तरह यूपी 2012 से 2017 तक की कुछ घटनाओं को बार-बार इस धारणा को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि यादव राज आएगा तो अन्य जातियों के लिए मुश्किल हो सकता है. सोशल मीडिया इसे और तेज करता है.

पुलिस सुधार, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को राजनीतिक मुद्दा बनाना कठिन हैं. जाति का कार्ड आसान है. जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में यह कार्ड 2027 में फिर खेला जाएगा. बिहार की इस घटना के जरिए मतदाताओं को याद दिलाया जाएगा कि यादव राज का मतलब अपराध, परिवारवाद और एक समुदाय का वर्चस्व है. 

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सही रास्ता यह है कि अपराध को अपराध माना जाए. आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई हो, चाहे वे किसी भी जाति के हों. पीड़िता को न्याय और सुरक्षा मिले. पर राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए पूरे समुदाय को बदनाम करना बंद करें. समाज भी जाति की जगह व्यक्ति को देखे. अगर हम अपराधी की जाति पूछना बंद नहीं करेंगे तो हर बड़ी घटना पर वही चक्र दोहराया जाएगा.

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