एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर सरकार की सनक एक परजीवी की तरह उसके अपने फूड सिक्योरिटी सिस्टम पर चिपक गई है. जिस धान को टैक्सपेयर के पैसे से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदा जाता है. ताकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के ज़रिए गरीबों तक पहुंचाया जा सके. उसे मिलों में कुटवाकर चावल बनाया जाता है. और फिर उस चावल को शराब बनाने वालों और डिस्टिलरियों को खरीद लागत से लगभग 40 प्रतिशत कम दाम पर बेच दिया जाता है. ताकि इथेनॉल बनाया जा सके. वित्त मंत्रालय के किसी ज्ञानी को यह अर्थशास्त्र जरूर सीखना चाहिए. पारस पत्थर है ये!
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 31 जुलाई को एक बयान जारी कर यह सफाई दी कि इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP) भारत की खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करता. मंत्रालय ने तो 2023-24 का हिसाब निकालते हुए यह तक याद दिलाया कि इथेनॉल उत्पादन में FCI के चावल का हिस्सा तो 'नगण्य' था, और सबको गर्व से बताया कि इस कार्यक्रम ने देश की 1.97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई है.
शायद सब सच होगा. लेकिन बयान ने उस एक इकलौते सवाल से चालाकी से किनारा कर लिया जो असल में मायने रखता था: खाद्य सुरक्षा योजना के तहत करदाताओं के पैसे से खरीदा गया चावल आखिर डिस्टिलरों को रियायती दर पर दिया ही क्यों जा रहा है? बही-खाते के एक तरफ विदेशी मुद्रा की बचत, दूसरी तरफ दी जा रही सब्सिडी वाली छूट को जायज नहीं ठहरा सकती. सरकार ने उस सवाल का जवाब दे दिया जो किसी ने पूछा ही नहीं था, और जो सब पूछ रहे थे, उसे गोल कर गई.
इथेनॉल का गड़बड़ाया गणित, आखिर किसको मिल रही सब्सिडी और फायदे में कौन? - जब से मैंने यह पढ़ा है, मेरा टूटा हुआ दिल उसी टूटे हुए चावल की तरह उबल रहा है, और हमारे भविष्य को रफ्तार देने के लिए फ्यूल की तरह जल रहा है. जब तक हमें बताया जा रहा था कि भट्टियों में सिर्फ गन्ना और मक्का जा रहा है, मुझे कोई फिक्र नहीं थी. लेकिन अब जब मुझे सच पता चल गया है, तो मैं फिर से अनजान नहीं बन सकता. और ‘इंडिया टुडे’ वेबसाइट पर खबरें पढ़ने की सबसे बड़ी त्रासदी यही है.
मेरी प्यारी जर्मन कार का इंजन वह चावल खा रहा है जो किसी दूर दराज के देश में किसी भूखे परिवार का पेट भर सकता था. उस देश का नाम हम सिर्फ तब लेते हैं जब हमें अपने रात के खाने को लेकर अपराधबोध महसूस करना होता है.
डॉक्टर मुझे जमाने से कह रहे हैं कि ग्लाइसेमिक इंडेक्स और न जाने किस-किस के चक्कर में चावल कम खाया करो. लेकिन पूर्वी भारत में पला-बढ़ा होने के नाते, मेरे लिए चावल नहीं तो खाना नहीं. इसलिए मैं हर दिन थोड़ा तो खाता ही हूं. और मैं यह पक्का करता हूं कि चावल अव्वल दर्जे का हो. जो कार्ब्स मुझे ऊर्जा दे, मैं चाहता हूं कि उनकी गुणवत्ता बेहतरीन हो.
अपने शरीर की तरह ही, मैं उस कार का भी पूरा ख्याल रखता हूं जो मुझे दफ्तर ले जाती और लाती है. इसलिए मैं ऐसा पेट्रोल ढूंढने निकला जिसमें इथेनॉल जरा भी न हो, या नाममात्र का हो, क्योंकि एक अच्छे अन्नदाता की तरह एक अच्छी कार बचे-खुचे जूठन से बेहतर की हकदार है.
मुझे पता था कि यह महंगा पड़ेगा, लेकिन जिस कार से आप प्यार करते हैं, उसके नखरे तो उठाने ही पड़ते हैं. मेरे घर के 30 किलोमीटर के दायरे में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला. थोड़ी और रिसर्च की, तो पता चला कि एक अकेला पंप इथेनॉल-मुक्त पेट्रोल बेचता है, लेकिन वो इतनी दूर था कि वहां जाने और वापस आने में ही मेरी टंकी खाली हो जाती. जो शायद इस पूरे कार्यक्रम का सबसे सटीक और ऑन-ब्रांड नतीजा है.
मैं साफ कर दूं, मेरी कार E20 कम्प्लायंट है. यह E20 फ्यूल पर चलेगी, बस माइलेज थोड़ा कम देगी. वैसे यह दुनिया के किसी भी इंटरनल कंबशन इंजन के लिए पहली पसंद वाला ईंधन नहीं है. कुछ गाड़ियां E10 (10% इथेनॉल) झेल जाती हैं, कुछ E20 (20% इथेनॉल) पर जिंदा बच जाती हैं, लेकिन सिर्फ 'जिंदा बचे रहना' कभी भी हमारा मानक नहीं होना चाहिए था.
हालांकि, सरकार ने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा. अपने पास के किसी भी पेट्रोल पंप पर चले जाइए. चाहे रेगुलर लें या प्रीमियम—डिस्पेंसर, आपकी टंकी में वही 20 प्रतिशत मिलावटी ईंधन ठूंस दिया जाएगा. लोकलसर्कल्स के हालिया सर्वे में पाया गया कि 10 प्रतिशत से ज्यादा माइलेज गिरने की शिकायत करने वाले वाहन मालिकों का आंकड़ा इस साल 45 प्रतिशत से बढ़कर 66 प्रतिशत हो गया है. जबकि सरकार का अपना राग यह है कि 2009 के बाद से बेचे गए E20-रेडी इंजनों में माइलेज की कोई गिरावट आनी ही नहीं चाहिए. जाहिर है, यहां कोई है जो माइलेज को अलग तरीके से नाप रहा है, और यकीनन वो वाहन मालिक नहीं हैं.
आप संवैधानिक अधिकारों के नाम पर सरकार से हमेशा नहीं लड़ सकते. क्योंकि वे अधिकार बेहद अस्पष्ट हैं. उन्हें उस अदालत में बहस करके खारिज किया जा सकता है, जिसके कानून उस संसद द्वारा बनाए, पास और संशोधित किए जाते हैं जहां सरकार का बहुमत है. ठीक वैसे ही जैसे नेताओं का उन इथेनॉल प्लांटों में बहुमत वाला शेयर होता है जिन्हें यह ब्लेंडिंग पोसती है.
इस कार्यक्रम का अर्थशास्त्र अपने आप में बैठता नहीं है, इसलिए जब गणित आपको समझाने में नाकाम हो जाता है, तो सरकार राष्ट्रवाद और विदेशी मुद्रा की कीमती बचत का सहारा लेती है. यह देशभक्ति के लिबास में लिपटी ब्लैकमेलिंग है, या जैसा कि मैं कहना पसंद करता हूं, अगर सिर्फ ब्लैकमेल से काम न चले तो यह जबरन निगलवाई गई कड़वी गोली है.
इसलिए, लाखों अन्य भारतीयों की तरह मैं भी इस मनमाने ब्लेंडिंग प्रोग्राम से समझौता कर चुका हूं और इसके आगे घुटने टेक चुका हूं. क्योंकि लोग बहुत कमजोर है, अपनी ताकतवर सरकार के आगे, जिसे वे शिद्दत से चाहते हैं. लेकिन अगर मुझे घुटने टेकने ही हैं, तो कम से कम मुझे अपनी पसंद के साथ सरेंडर करने दीजिए.
मुझे अपना इथेनॉल लंबे दाने वाले बासमती चावल से बना चाहिए, इस टूटे हुए कनकी चावल से नहीं जो अभी इस्तेमाल हो रहा है. टूटे चावल का इथेनॉल, जैसा कि नाम से ही जाहिर है, कार का दिल भी तोड़ सकता है. लंबा दाना, जैसा कि नाम से पता चलता है, शायद कार को थोड़ा लंबा चलाने में मदद कर दे.
आप पूछ सकते हैं कि इसमें क्या तर्क है? इसके जवाब में मैं उल्टा पूछता हूं कि इस पूरे इथेनॉल प्रोग्राम में ही कौन सा तर्क है? आप किसी एक सवाल का जवाब दे दीजिए, आपको दोनों के जवाब मिल जाएंगे.