पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इमरान खान को तीन साल बाद रावलपिंडी की अडियाला जेल से निकालकर इस्लामाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया, ताकि उनका इलाज हो सके. हालांकि, कुछ घंटे बाद ही उनका चेकअप करके दोबारा जेल भेज दिया गया.
पहले शाहबाज शरीफ सरकार ने कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने का मन बनाया था, फिर अपना फैसला वापस ले लिया. गुरुवार को तो शहबाज शरीफ पार्लियामेंट में पीटीआई सांसदों से हाथ मिलाते भी देखे गए थे. अब कहा जा रहा है कि इमरान खान और एस्टेब्लिशमेंट (पाक आर्मी लीडरशिप) के बीच एक डील हो गई है. वैसे ही जैसे पहले जेल में बंद नवाज शरीफ को इंग्लैंड निकल जाने का रास्ता दिया गया था. पाकिस्तानी मीडिया और राजनीतिक हल्कों में चर्चा हो रही है कि अब शायद इमरान खान पाकिस्तान आर्मी, खासकर आसिम मुनीर को लेकर सॉफ्ट हो जाएंगे. इस बारे में पीटीआई के एक प्रवक्ता जुल्फिकार बुखारी ने भी इशारा किया कि पार्टी आर्मी से चली आ रही तनातनी को दूर करना चाहती है. हालांकि, अब इस बात पर शंका है कि क्या वाकई इमरान खान भी ऐसा चाहते हैं? पीटीआई समर्थक उन्हें दोबारा जेल भेजे जाने से हैरान हैं. उनका मानना था कि इमरान को कुछ दिनों के लिए तो अस्पताल में रखा ही जाएगा.
इमरान को जेल से अस्पताल में शिफ्ट किए जाने की खबर से कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. आदेश भले कोर्ट ने दिया हो, लेकिन पाकिस्तान की सियासत पर नजर रखने वाले जानते हैं कि वहां ऐसे फैसले अंततः आर्मी लीडरशिप ही लेती है. आर्मी फैसला कर लेती है, तो उसे फॉलो करना कोर्ट और पॉलिटिकल लीडरशिप के लिए लाजमी हो जाता है. इसीलिए इमरान को यदि अडियाला जेल से निकालकर इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया है, तो 25 किमी का यह रास्ता इमरान के विरोधियों को आर्मी हेडक्वार्टर से सत्ता की कुर्सी के नजदीक होने का सफर लग रहा है.
शुक्रवार रात का सच ये है कि इमरान खान जेल से अस्पताल आ गए. एक अनकहा सच ये भी है कि ऐसा आसिम मुनीर की हरी झंडी दिखाने से ही संभव हुआ. अब इसके आगे के दो पहलू हैं- इमरान से मुनीर की डील हुई, या नहीं? इमरान को दोबारा जेल भेजे जाने से मामला 50-50 हो गया है.
सबसे पहले समझिए इमरान और मुनीर के बीच हुई ‘जंग’ का बैकग्राउंड
पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां के प्रधानमंत्री अपने ‘कत्ल’ का सामान खुद जुटाते हैं. जुल्फिकार अली भुट्टो ने जिया-उल-हक को आर्मी चीफ बनाया, फिर उसी जिया ने भुट्टो का तख्तापलट करके उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया. नवाज शरीफ ने परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख अपॉइंट किया, फिर उसी मुशर्रफ ने तख्तापलट करके 9 साल राज किया. जब नवाज शरीफ को पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा. इसी तरह इमरान खान खुद आसिम मुनीर को पाकिस्तान आर्मी की खुफिया एजेंसी ISI चीफ बनाकर आर्मी हेडक्वार्टर में लेकर आए. मुनीर वहीं बैठकर इमरान की जड़ें खोद दीं.
2018 में DG-ISI बने मुनीर ने इमरान की पत्नी बुशरा बीबी के करप्शन की पड़ताल शुरू की. कहा जाता है कि जब इमरान को इसका पता चला तो उन्होंने आठ महीने में ही उन्हें उस पद से रुखसत कर दिया. बाद में बताया गया कि तब मुनीर ने इमरान के गुस्से से बचने के लिए एक डील की पेशकश की थी. मुनीर ने इमरान के करीबी और इंग्लैंड में रहने वाले पाकिस्तानी बिजनेसमैन जुल्फिकार बुखारी से संपर्क साधा. मुनीर तब बुशरा बीबी से मुलाकात करना चाहते थे, लेकिन बुशरा बीबी ने सिरे से मना कर दिया.
इस बेइज्जती को सीने में दबाए मुनीर सही वक्त का इंतजार करते रहे. जब इमरान के खिलाफ गुस्सा बढ़ा, करप्शन के मामले जोर पकड़ने लगे, तो जिस आर्मी ने उन्हें पीएम बनाया, वही ‘न्यूट्रल’ हो गई. मुनीर के लिए ये सही समय था. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. नवाज शरीफ और आसिफ जरदारी को वे एक टेबल पर लेकर आए. इमरान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और उनकी सरकार गिरा दी गई. कार्यवाहक सरकार का प्रधानमंत्री बनते ही शहबाज शरीफ ने अपने भरोसेमंद आसिम मुनीर को आर्मी चीफ बना दिया. और उसके बाद इमरान और मुनीर के बीच शुरू हुआ हिसाब बराबर करने का खेल.
इमरान और उनकी पार्टी पीटीआई ने शहबाज शरीफ सरकार और पाक आर्मी के खिलाफ आंदोलन-प्रदर्शन किए. बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया कैंपेन चलाया. और यह तनाव अपने पीक पर पहुंचा 9 मई 2023 को, जब एंटी-करप्शन फोर्सेस ने इमरान को हिरासत में ले लिया. इमरान समर्थकों ने पाकिस्तान के कई शहरों में आर्मी के खिलाफ बगावत कर दी. रावलपिंडी में सेना के हेडक्वार्टर से लेकर लाहौर कोर कमांडर के घर तक लोग घुस गए. मुनीर के आर्मी चीफ रहते जनता की जो बगावत उस दिन हुई, इतिहास में कभी नहीं हुई थी. मुनीर सबसे कमजोर आर्मी चीफ साबित हो रहे थे.
इमरान समर्थकों की उस बगावत को कुचलने के लिए मुनीर ने पीटीआई की पूरी लीडरशिप को जेल में डाल दिया. और तभी से पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में ये जंग चल रही है. इमरान खान की अपनी लोकप्रियता है. वे कई बार कह चुके हैं कि नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी जैसी डील कभी नहीं करेंगे. और उनके इस स्टैंड के चलते उनके समर्थक हमेशा शरीफ और जरदारी समेत मुनीर की सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग करते रहे हैं. फिर चाहे वह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुई पाक सेना की पिटाई हो, बलोचिस्तान, खैबर-पख्तूनखा और पीओके में हाथ से निकलते हालात हों. पाकिस्तान आर्मी के प्रवक्ता DG-ISPR अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई बार इमरान और उनकी पार्टी पीटीआई को आड़े हाथों लेते रहे हैं.
पहली बात, क्यों मुमकिन नहीं है इमरान और मुनीर के बीच डील
आज आसिम मुनीर सिर्फ पाकिस्तान आर्मी के सर्वेसर्वा ही नहीं हैं. वे एक ग्लोबल लीडर हैं. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें अपना ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ कहना शुरू किया है. ईरान जंग में अपने किरदार और हाल ही में हुए मक्का डिफेंस पैक्ट के कारण मुनीर अब पाकिस्तान के बाहर और भीतर एक जैसे मजबूत हो गए हैं. फील्ड मार्शल का ओहदा हासिल करने के अलावा वे संविधान में संशोधन करवाकर हमेशा के लिए फौज के आजीवन रहनुमा बन गए हैं. चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस- जिनके पास फौज में किसी की भी नियुक्ति, तबादला और नौकरी से निकालने का अधिकार है. आज शरीफ सरकार पूरी तरह उनके रहमोकरम पर है.
वहीं, दूसरी ओर तीन साल से जेल में इमरान खान, जो कि पिछले कई महीनों से किसी से मिल भी नहीं पाए हैं. उनका पैगाम पहुंचना तो दूर की बात. कहा जाता है कि सियासत में नेता का मैसेज ही उसका भोजन-पानी है. लेकिन इन तमाम हालात के बावजूद उनके समर्थकों का हौसला बाकी है. वो मानते हैं कि जेल में बंद इमरान आज भी शहबाज शरीफ और आसिफ जरदारी से ज्यादा ताकतवर हैं. उनका कद इतना बड़ा है कि मुनीर चाहकर भी उनके साथ वो सलूक नहीं कर पाएंगे, जो जिया ने भुट्टो के साथ किया. इमरान कभी झुकेंगे नहीं. इसलिए इमरान मुनीर से डील करके अपने लिए राहत तो जुटा सकते हैं, लेकिन ये उनकी सियासी खुदकुशी ही होगी. वो कभी भी शरीफ और जरदारी की कतार में खड़ा होना नहीं चाहेंगे.
मुनीर और इमरान, दोनों अपनी-अपनी जगह मजबूत हैं और अपनी-अपनी जगह मजबूर हैं. जो बात डील करने में सबसे बड़ा अड़ंगा लगती है, कभी-कभी वही सबसे बड़ी वजह भी लगती है.
दूसरी बात, मुनीर और इमरान के बीच क्यों हो सकती है डील
पाकिस्तान की मिलिट्री लीडरशिप आज जितनी मजबूत है, पॉलिटिकल लीडरशिप उतनी ही खस्ताहाल है. शहबाज शरीफ आज पीएम की कुर्सी पर सिर्फ इसलिए बैठे हैं, क्योंकि नवाज शरीफ नहीं बैठ सकते. लोकल गवर्नेंस के मामले में शहबाज शरीफ की सरकार पूरी तरह फेल हो गई है. कंगाली की हालत से गुजर रहे पाकिस्तान में महंगाई का बोलबाला है. बलूचिस्तान, खैबर-पख्तूनख्वा और पीओके का संकट पाकिस्तान सरकार की नाकामी के खाते में आ रहा है. मुनीर और उनकी फौज इस मामले में एक हद तक ही हस्तक्षेप कर पा रही है. जबकि वो इससे कहीं ज्यादा करना चाहती है. पूरे अख्तियार के साथ. भले इसके लिए मुनीर को राष्ट्रपति बनना पड़े.
पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान सरकार पर मुकम्मल पकड़ बनाने के लिए मुनीर ने अपने विश्वस्त और पाकिस्तान के गृहमंत्री मोहसिन नकवी के जरिए पासा फेंका है. नकवी ने बयान दिया है कि ‘पाकिस्तान में गवर्नेंस फेल हो गया है और अब देश को छोटे-छोटे सूबों में बांट देना चाहिए.’ इस बयान का दबाव न सिर्फ शरीफ सरकार पर पड़ा है, बल्कि पंजाब और सिंध की सियासत पर मोनोपॉली रखने वाले शरीफ और भुट्टो खानदानों के भीतर थरथरी डोल गई है.
मुनीर और इमरान के बीच डील हो या न हो, कम से कम इमरान का जेल से बाहर आना शरीफ और जरदारी पर दबाव बनाने के लिए काफी है. कहा जा रहा है कि पीटीआई अब मुनीर/पाक आर्मी के खिलाफ अपना हमलावर रुख छोड़ देगी. लेकिन इस बात पर अभी सवाल कायम है कि क्या इमरान भी ऐसा चाहते हैं?
इमरान और मुनीर की स्थिति अब पहले जैसी नहीं है. इमरान को जेल की कोठरी से निकलकर एक अदद खुला आसमान की जरूरत है. जबकि मुनीर को पाकिस्तान पर मुकम्मल कब्जा जमाने के लिए सभी सियासी जमातों के भीतर एक जैसी पहुंच चाहिए. निर्विरोध. लेकिन क्या ये दोनों के बीच सुलह की वजह हो सकती है?
पाकिस्तान की सत्ता को अपने मन के मुताबिक शेप देते जा रहे मुनीर वो गलती नहीं दोहराना चाहते, जो जिया ने की थी. सभी पॉलिटिकल पार्टियों को हाशिये पर धकेल देना. मुनीर चाहते हैं कि छोटे-छोटे सूबों में बंटे पाकिस्तान में पॉलिटिकल पार्टियों का वजूद कायम रहे, लेकिन रीजनल पार्टी की तरह. और देश में एकमात्र सेंट्रल पार्टी रहे- पाकिस्तान आर्मी. जिसके आजीवन अध्यक्ष हों, खुद मुनीर. पार्लियामेंट बन जाए गवर्निंग काउंसिल और वे खुद बन जाएं फेस ऑफ द नेशन.
ऐसा तभी हो सकता है, जब इमरान के नाम का कांटा उनकी राह से हट जाए. मुनीर ने इमरान को जेल से एक बार निकालकर स लिया है. अब बारी इमरान खान की है.